भारतीय संस्कृति में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह आत्मा के परमात्मा से मिलन और अहंकार के विसर्जन का एक महान अनुष्ठान है। ब्रज की पावन रज में जब अबीर-गुलाल की बौछार होती है, तो वह केवल बाहरी चकाचौंध नहीं होती, बल्कि उसके भीतर भक्ति का एक ऐसा अनहद नाद छिपा होता है, जो साधक को भीतर तक झंकृत कर देता है।
भक्तशिरोमणि सूरदास से जुड़ी एक अर्थपूर्ण लोककथा से इस बात को समझा जा सकता है। रंगोत्सव का समय था। कुछ भक्तों को विनोदवश विचार आया कि क्यों न सूरदास जी रंग दिया जाए। लिहाजा, वे उनके पास गए और बड़े उत्साह से बोले, “बाबा, आज तो हम आपको भी अबीर और गुलाल के रंगों में रंग देंगे।” सूरदास की नेत्र ज्योति भले ही न थी। पर अंतर्दृष्टि साक्षात ईश्वर के दर्शन करती थी। उन्होंने मंद-मंद मुस्काते हुए उत्तर दिया, “यदि रंगना ही है तो मुझे उस रंग में रंग दो जो जन्म-जन्मांतर तक मिट ही न सके। अमिट रहे।“
भक्तगण सूरदास के इस कथन के गूढ़ार्थ को समझ नहीं पाए। उन्होंने यह सोचते हुए सूरदास पर गुलाल डाल दिया कि बाबा तो देख नहीं सकते, उन्हें कहाँ पता चलेगा कि यह रंग पक्का है या कच्चा। परंतु, जैसे ही गुलाल तन पर पड़ा, सूरदास अलौकिक भाव में डूब गए। उनके कंठ से पद फूट पड़ा— “आजु हरि रंग डारो री, मन तन भीज्यो प्रेम रस, और न चाहत कछु और।” सूरदास के स्वर में ऐसी तन्मयता और समर्पण था कि देखते ही देखते वहाँ का पूरा वातावरण ही बदल गया। जो लोग रंग डालने आए थे, वे स्वयं उस स्वर और भाव के रंग में रंगते गए। बाहरी प्रदर्शन के बदले आंतरिक परिमार्जन का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
भारतीय मनीषा में होली कभी भी एक आत्माविहीन उत्सव नहीं रही है। यह पर्व सदैव आत्म-शुद्धि और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने का एक पावन अवसर रहा है। इतिहास गवाह है कि सूरदास, रसखान, संत कबीर और मीराबाई जैसे महापुरुषों के पदों में होली केवल एक लोक-उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति के उस चरम आनंद का प्रकटीकरण है, जहाँ भक्त अपना सर्वस्व ईश्वर के चरणों में अर्पित कर देता है। इन कवियों ने होली को प्रेम की उस पराकाष्ठा के रूप में देखा है, जहाँ ‘मैं’ और ‘तू’ का भेद मिट जाता है। यह अहंकार के विसर्जन का महापर्व है, जिसमें मनुष्य अपनी संकीर्णताओं को जलाकर शुद्ध चैतन्य के रूप में निखरता है।
परंतु समय के साथ इस त्योहार के स्वरूप में विकृतियाँ भी आईं। विशेषकर मुगलकाल के दौरान होली का चित्रण अक्सर नायक-नायिका की छेड़छाड़ और श्रृंगारिक उद्दीपन के रूप में अधिक होने लगा। आधुनिक युग तक आते-आते यह रूप और भी अधिक विकृत हो गया है। आज बाज़ारवाद और उपभोक्ता संस्कृति ने इस पावन पर्व को एक तमाशे में बदल दिया है। वह प्रेम और समर्पण, जो राधा-कृष्ण की लीलाओं या भक्त प्रह्लाद की कथा का आधार था, कहीं पीछे छूट गया है। अब होली में सात्विक आनंद के स्थान पर हुल्लड़बाजी, नशाखोरी और शोर-शराबे का बोलवाला अधिक दिखाई देता है। यह स्थिति हमें उस मूल आध्यात्मिक उद्देश्य से दूर ले जाती है, जिसके लिए हमारे ऋषियों ने इस उत्सव की संरचना की थी।
होलिका दहन को ही ले लें। इसके आध्यात्मिक मायने बड़े महत्व के हैं। हिरण्यकश्यप केवल एक पौराणिक पात्र नहीं है, बल्कि वह हमारे भीतर के उस प्रचंड अहंकार का प्रतीक है, जो स्वयं को ही सब कुछ मानकर ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देने लगता है। वह सत्ता और शक्ति के मद में इतना अंधा हो जाता है कि उसे प्रेम, दया और आनंद का अस्तित्व ही खटकने लगता है। इसके विपरीत, प्रह्लाद प्रेम, आनंद और सकारात्मक ऊर्जा के जीवंत स्वरूप हैं। जब अहंकार रूपी हिरण्यकश्यप प्रह्लाद की अडिग श्रद्धा को डिगा नहीं पाता, तो वह विध्वंस का मार्ग चुनता है। प्रह्लाद की सुरक्षा का वास्तविक रहस्य उनकी निर्दोषता और अटूट विश्वास में छिपा था। उन्हें अग्नि, जल या पर्वत कोई हानि इसलिए नहीं पहुँचा सके, क्योंकि उनके भीतर अपने दमनकारी पिता के प्रति भी कोई द्वेष या दुर्भावना नहीं थी। उनकी भक्ति की शक्ति ईसा मसीह की उस क्षमाशीलता के समान थी, जो सूली पर चढ़ाने वालों के लिए भी प्रार्थना करती है।
होलिका का जलना इस बात का प्रमाण है कि षड्यंत्र और नकारात्मकता के साथ ईश्वर का वरदान भी फलित नहीं होता। दूसरी तरफ, जब मनुष्य संशय से मुक्त होकर अपने आत्म-स्वरूप में स्थित हो जाता है, तो संसार की कोई भी नकारात्मक शक्ति उसे जला नहीं सकती। यह एक ऐसा आध्यात्मिक प्रकाश है जो हमारे भीतर की अशुद्धियों को भस्म कर हमें कुंदन की तरह चमका देता है। होली का यह पर्व राधा-कृष्ण के प्रेम संदेशों के साथ अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। कृष्ण का रंग काला या नीला होना और राधा जी का गौर वर्ण होना, एक सुंदर दार्शनिक संकेत है। जब श्रीकृष्ण राधा जी को अपने रंग में रंग देते हैं, तो वह वास्तव में जीव का ईश्वर में पूर्णतः लीन हो जाना है। यह मिलन द्वैत से अद्वैत की ओर की यात्रा है।
भारत की विविधता इस उत्सव को और भी भव्य बनाती है। जहाँ हर कुछ कोस पर भाषा और भोजन बदल जाता है, वहाँ होली के विविध रंग हमारे सांस्कृतिक वैभव को ही दर्शाते हैं। बरसाने की लट्ठमार होली में जहाँ एक ओर गोपियों का प्रेममयी अधिकार दिखता है, वहीं वाराणसी की मसान होली जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य से हमारा साक्षात्कार कराती है। पुष्कर की अनोखी परंपराएं हों या राजसी ठाठ-बाट के शाही जुलूस, ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि स्वरूप भले ही अलग हों, परंतु उनके भीतर बहने वाली सांस्कृतिक चेतना एक ही है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमें इन परंपराओं की मूल भावना को आत्मसात करते हुए उन्हें विकृत होने से बचाना होगा। हमें यह समझना होगा कि बिना आध्यात्मिक मर्म के कोई भी उत्सव केवल एक प्राणहीन शरीर की भांति रह जाता है। सभी पाठकों को होली की शुभकामनाएं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

