भारत भूमि पर शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जब श्रीराम भक्त हनुमान जी की दिव्य कथा, उनके असीम बल, ज्ञान और निरभिमानी स्वरूप की महिमा न गाई जाती हो। सूर्य को निगलने की कथा, भूलोक में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की सेवा और पाताललोक में अहिरावण का वध करके राम- लक्ष्मण को वापस लाने संबंधी प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि उनकी व्याप्ति तीनों लोकों में है। वे अतुलित बल के धाम होते हुए भी इतने अभिमान-शून्य हैं कि स्वयं को केवल राम जी के दूत से इतर कुछ भी मानने को तैयार नहीं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दस हज़ार हाथियों का बल एक दिग्गज में, दस हज़ार दिग्गजों का बल एक ऐरावत में, दस हज़ार ऐरावत का बल एक इंद्र में और दस हज़ार इंद्रों का सामर्थ्य हनुमान जी की केवल एक उंगली में समाहित है। तभी वे समुद्र-लंघन से लेकर लंका दहन तक में ऐसा विस्मयकारी पराक्रम दिखा पाए।
लेकिन हनुमान जयंती का यौगिक महत्व केवल इन कथाओं तक सीमित नहीं, बल्कि यह सबसे पहले प्राण शक्ति के जागरण से जुड़ा है। योगशास्त्र कहता है कि शरीर में प्रवाहित होने वाली प्राण ऊर्जा ही जीवन का मूल आधार है। हनुमान जी को “पवनपुत्र” कहा गया है, जो सीधे-सीधे प्राण वायु के प्रतीक हैं। जब साधक प्राणायाम, विशेषकर भस्त्रिका और अनुलोम-विलोम का अभ्यास करता है, तो वह उसी पवन तत्व को संतुलित करता है, जिसकी चरम अभिव्यक्ति हनुमान में दिखाई देती है। इस दृष्टि से हनुमान जयंती प्राण साधना को सशक्त करने का श्रेष्ठ अवसर बन जाती है।
यौगिक दृष्टिकोण से विचार करें तो हनुमान जी का समुद्र-लंघन केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि इसी प्राण शक्ति के माध्यम से मानवीय क्षमताओं के विस्तार का शाश्वत घोषणापत्र है। इस गूढ़ सत्य को योग विज्ञान के प्रमुख आसन ‘हनुमानासन’ के माध्यम से समझा जा सकता है। सूक्ष्मता से देखने पर ज्ञात होता है कि यह आसन उसी महान समुद्र-लंघन का दैहिक प्रतिरूप है। हनुमान जी ने जिस प्रकार एक पैर महेंद्र पर्वत पर जमाकर दूसरा लंका की ओर बढ़ाया था, हनुमानासन में शरीर की भंगिमा ठीक वैसी ही होती है। इसमें एक पैर पीछे की ओर खिंचा होता है और दूसरा आगे की ओर प्रसारित रहता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह मुद्रा हमारे मानसिक द्वंद्व के संतुलन का जीवंत प्रतीक है। पीछे की ओर फैला पैर हमारे अतीत का प्रतिनिधित्व करता है और आगे बढ़ा हुआ पैर भविष्य की ओर संकेत है। इन दोनों छोरों के बीच जो केंद्र है, जहाँ साधक की रीढ़ और धड़ बिल्कुल सीधा और स्थिर रहता है, वही वर्तमान का क्षण है। हनुमानासन के निरंतर अभ्यास का प्रतिफल यह होता है कि अतीत के बोझ और भविष्य की चिंताओं के मध्य हमें अपने केंद्र यानी वर्तमान में स्थिर रहने की कला आ जाती है। यह वही ‘समत्व’ है जिसकी चर्चा भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में की है।
शारीरिक स्तर पर हनुमानासन के दौरान ‘सोआस’ मांसपेशी का गहरा विस्तार होता है। धड़ को पैरों से जोड़ने वाली यह मांसपेशी चलने, दौड़ने और संतुलन बनाने का मुख्य आधार है। इसे शरीर का केंद्र या ‘भावनाओं का भंडार’ भी कहा जाता है, क्योंकि तनाव और भय की स्थिति में यह सबसे पहले सिकुड़ती है। इस आसन के अभ्यास से अवचेतन में वर्षों से संचित भय मुक्त होने लगते हैं। यह एक प्रकार का ‘कैथार्सिस’ या भावनात्मक शुद्धिकरण है। जब शरीर से भय रूपी ऊर्जा का निष्कासन होता है, तब साधक के भीतर एक सौम्य साहस और अदम्य इच्छाशक्ति का संचार होता है। योगियों का मत है कि हनुमान जी की शक्ति का रहस्य भी यही निर्भयता थी, जो राम-नाम के अटूट विश्वास से उपजी थी।
हनुमान जयंती का दूसरा गूढ़ पक्ष है – मन और इन्द्रियों पर विजय। हनुमान जी का मन पूर्णतः राम में स्थित था। योग में इसे “चित्तवृत्ति निरोध” कहा गया है, अर्थात मन की चंचलता का स्थिर होना। जब मन एक ही लक्ष्य पर टिक जाता है, तब साधक में असंभव को संभव करने की शक्ति आ जाती है। समुद्र लांघना हो या पर्वत उठाना—ये सभी प्रतीक हैं उस मन की, जो एकाग्र होकर सीमाओं को पार कर जाता है। यह एक ऐसा आसन है जो अहंकार के विसर्जन के लिए अत्यंत प्रभावी माना गया है। तभी योग गुरु इसे बलपूर्वक न करने की हिदायत देते हैं। इस आसन की पूर्णता के लिए ‘कर्ता भाव’ का त्याग अनिवार्य है। यह मुद्रा हमें समर्पण की उस पराकाष्ठा तक ले जाती है, जहाँ श्रीहनुमान जी ने स्वयं को श्रीराम के चरणों में अर्पित कर दिया था। जब हम इस खिंचाव में उतरते हैं, तब अपनी सीमाओं का वास्तविक बोध होता है और इसी बोध से सच्ची विनम्रता का जन्म होता है। उन्होंने कभी अपनी शक्ति का श्रेय स्वयं को नहीं दिया, बल्कि हर कार्य को राम की कृपा माना।
कुंडलिनी योग के परिप्रेक्ष्य में हनुमानासन हमारे निचले चक्रों—मूलाधार और स्वाधिष्ठान—को सक्रिय करता है। मूलाधार चक्र हमारी सुरक्षा और पृथ्वी तत्व से जुड़ा है, जबकि स्वाधिष्ठान चक्र भावनाओं और सृजनात्मकता का केंद्र है। अक्सर हमारी आध्यात्मिक चेतना इन्हीं निचले केंद्रों में उलझी रहती है। इस आसन के अभ्यास से इन चक्रों में प्राण ऊर्जा का वेग बढ़ता है और ऊर्जा ऊर्ध्वगामी होने लगती है। हनुमान जी की ऊर्जा, उनका उत्साह और उनकी असीम शक्ति इस बात की ओर इशारा करते हैं कि उनके भीतर की सुप्त शक्ति पूर्णतः जागृत थी। योग में जब कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार से उठकर सहस्रार तक पहुँचती है, तब साधक में निर्भयता, सेवा भाव, और आत्मज्ञान जैसे दिव्य गुण प्रकट होते हैं। हनुमान जी इसी जागृत चेतना के जीवंत उदाहरण हैं। जिस प्रकार श्रीहनुमान जी ने पृथ्वी को छोड़कर आकाश मार्ग से छलांग लगाई थी, वैसे ही एक साधक अपनी भारी और जड़ प्रवृत्तियों को त्यागकर उच्च चेतना के आकाश में उड़ान भरने की ओर अग्रसर होता है।
इस अभ्यास के दौरान ‘साक्षी भाव’ का विशेष महत्त्व है। जब शरीर पूर्ण खिंचाव की अवस्था में होता है, तब हल्का दर्द या तनाव महसूस होना स्वाभाविक है। ऐसे में मन को विचलित होने से बचाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। साक्षी भाव से मन स्थिर रहता है और यदि आसन के समय ‘हं’ बीज मंत्र का मानसिक जप किया जाए, तो वायु तत्व से गहरा जुड़ाव होता है। इससे साधक को शरीर में हल्कापन और भारहीनता का अनुभव होने लगता है। इस अवस्था में सामान्य श्वास-प्रश्वास गहन प्राण-शक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिससे शरीर की प्रत्येक कोशिका में भक्ति और शक्ति का संचार होता है। यह हनुमान जी की वायु-पुत्र प्रकृति के साथ एकाकार होने जैसा है।
हनुमानासन का प्रत्येक क्षण साधक को अपनी आत्मा के समीप ले जाता है, जहाँ शांति, शक्ति और भक्ति का संगम होता है। आधुनिक युग की आपाधापी में हम अक्सर अपनी आंतरिक शक्तियों को विस्मृत कर देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हनुमान जी श्रापवश अपनी सामर्थ्य भूल गए थे। हनुमानासन का नियमित अभ्यास हमारे भीतर के उस सोए हुए ‘हनुमान तत्व’ को जाग्रत करने की एक पवित्र प्रक्रिया है, वह तत्व है, जो हमें निर्भय बनाता है, सेवा में लगाता है और परम सत्य से जोड़ता है। लंका की दूरी भौतिक थी, परंतु उसे लांघने का संकल्प पूर्णतः आध्यात्मिक था। हनुमानासन हमें दैनिक जीवन की विषमताओं और मानसिक तनावों के ‘समुद्र’ को लांघने का साहस देता है। हनुमान जयंती केवल एक तिथि नहीं, बल्कि चेतना के जागरण का महापर्व है, जिसे हमें आत्म-रूपांतरण के अवसर के रूप में स्वीकार करना चाहिए। यह दिन हमें यह स्मरण कराता है कि योग केवल आसनों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन की एक पूर्ण साधना है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

