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Author: Kishore Kumar
Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com
प्राचीन विद्या मंदिरों का अक्स एक योग मंदिर
बिहार की पावन भूमि और मुंगेर में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर अवस्थित बिहार योग विद्यालय आधुनिक युग में ऋषि संस्कृति के पुनर्जागरण का महान केंद्र है। यह अपनी किस्म का इकलौता केंद्र है, जो पूरी तरह संन्यासियों द्वारा संचालित है। बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने यौगिक क्रांति के लिए जो संकल्प लिया था, उसकी पूर्णता का यह साक्षात गवाह है। जब इस योग विद्यालय की स्थापना की गई थी, तो उसके पीछे की अवधारणा यह थी कि योग को एक विज्ञान, एक जीवनशैली, एक विश्वास और मानवता की संस्कृति के रूप में मानव समाज…
स्वामी विवेकानंद : काल से परे एक जीवंत चेतना
भारत माता ने आज के दिन स्वामी विवेकानंद के रुप में एक ऐसे सपूत को जन्म दिया था, जिन्होंने अल्पायु में ही प्रसुप्त भारतीय चेतना को झकझोरने के लिए सनातन धर्म को कर्मकांडों से निकालकर एक जीवंत, व्यावहारिक और राष्ट्र-निर्माण की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। परिणाम हुआ कि इस व्यावहारिक वेदांत के कारण भारतीय दर्शन को पुनर्जीवन मिला और सनातन धर्म आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का आधार बन गया। इससे विश्व पटल पर भारत का गौरव बढ़ा।जन्मजात संन्यासी स्वामी विवेकानंद इस निष्कर्ष पर थे कि प्रत्येक राष्ट्र का विश्व के लिए एक संदेश होता है, एक प्रेरणा होती है। जब…
आध्यात्मिक संजीवनी है योगी कथामृत
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को शिक्षा देते हैं कि कर्मफल की आसक्ति से व्यक्ति दुखी होता है। इसलिए कि भौतिकता आत्मा की अमरता को भुला देती है और पुनर्जन्म के चक्र में फंसाए रखती है। आधुनिक युग के मानव के पास जन्म-चक्र की परवाह नहीं। उसके तो रातो-रात येन-केन-प्रकारेन तमाम तरह के भौतिक हित पूरे हो जाने चाहिए। यही भौतिक लालसा मानसिक समस्याओं से दो-चार होने को मजबूर करती है। आधुनिक युग की इस सबसे बड़ी समस्या के कारण जीवन संकट में है। ऐसे में परमहंस योगानंद की शिक्षाओं की आज भी बनी हुई है।परमहंस योगानंद की शिक्षाओं में मानव…
राष्ट्र का संदेश बने नववर्ष का संकल्प
भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपरा में ‘समय’ को केवल एक कैलेंडर की गणना नहीं, बल्कि ‘काल पुरुष’ के रूप में देखा जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में काल (समय) को जीवन की क्षणभंगुरता, विश्व के संहारक तथा चक्रीय प्रकृति का प्रतीक बताया गया है। इस लिहाज से योग और अध्यात्म के गहरे धरातल पर नववर्ष का आगमन केवल तिथि का परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना के नवीनीकरण का एक महापर्व है। ब्रह्मांडीय व्यवस्था के साथ लयबद्ध होने का महान अवसर है। यौगिक अनुशासन में ‘संकल्प’ का बहुत महत्व है। इसलिए, नववर्ष अपनी संकल्प शक्ति को दृढ़ करके मानसिक विकारों (काम, क्रोध, मद, लोभ)…
बिगड़े पाचन तंत्र के लिए यौगिक उपाय
सर्दियों में पेट की समस्याएं बढ़ जाना आम बात है। इसके कई वैज्ञानिक और जीवनशैली से जुड़े कारण होते हैं। शरीर का तापमान गिरने से लेकर खान-पान में बदलाव तक, सब कुछ हमारे पाचन तंत्र पर असर डालता है। ठंड के मौसम में शरीर अपनी ऊर्जा का उपयोग शरीर को गर्म रखने में अधिक करता है। इससे मेटाबॉलिज्म और पाचन क्रिया धीमी हो जाती है। जब खाना धीरे पचता है, तो पेट में भारीपन, गैस और ब्लोटिंग (पेट फूलना) जैसी समस्याएं होने लगती हैं। प्यास कम लगने के कारण शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाने और शारीरिक सक्रियता…
भावना जैसी भी हो, उत्तर तथास्तु!
तथास्तु! यानी, जैसा तुम चाहते हो, वैसा ही हो। प्राचीन काल में बहुत नपा-तुला बोलने के आदी ऋषि-मुनि और देवता वरदान देने के लिए इसी शब्द का प्रयोग करते थे। इसके मुख्यत: तीन कारण थे। पहला तो यह कि उनमें ‘वाक-सिद्धि’ होती थी। जब कोई भक्त वरदान मांगता, तो ऋषि अपनी ऊर्जा को एक शब्द में केंद्रित करते थे – ‘तथास्तु’। यह एक तरह का ‘कमांड’ था जो ब्रह्मांड को दिया जाता था कि भक्त की इच्छा पूरी हो। दूसरी बात यह कि ‘तथास्तु’ के माध्यम से ऋषि अपनी तपस्या का एक अंश उस भक्त को दे देते थे, ताकि…
ओशो : कांटे भी फूल बन गए
ओशो कालजयी हैं, शाश्वत, सदैव प्रासंगिक हैं। पर, आधुनिक युग में जब कभी विवादस्पद आध्यात्मिक गुरुओं की बात आती है तो ओशो का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे अपने जीवनकाल में बेहद विवादास्पद रहे। क्यों? इसलिए कि उन्होंने पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और रूढ़ियों को सीधे चुनौती दी। सेक्स, राजनीति, धर्म और सामाजिक व्यवस्था जैसे संवेदनशील विषयों पर खुलकर बातें करते रहे। परिणाम स्वरुप उनके चाहने वालों की संख्या दुनिया भर में बढ़ती गई। यहां तक कि लंदन के “द संडे टाइम्स” ने उन्हें ‘1,000 मेकर्स ऑफ द ट्वेंटीएथ सेंचुरी” की सूची में शामिल किया था। वहीं दूसरी तरफ,…
गीता : आध्यात्मिकता का सुमधुर फल
श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत काल में जितनी स्फूर्तिदायक थी, आज भी उतनी ही है। यह मानव चेतना के लिहाज से एक ऐसा अनंत महासागर है, जिसकी गहराइयों में उतरने का प्रयास सदियों से मनीषी और विद्वान करते आए हैं। तभी कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में दिया गया गीता का ज्ञान आज प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों और कॉरपोरेट जगत के बोर्डरूम तक पहुँच चुका है। कमाल यह कि हजारों वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश आधुनिक विज्ञान और शोध की कसौटी पर न केवल खरा उतर रहा है, बल्कि उसे नई दिशा भी दे रहा है।भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक के…
सत्य साईं बाबा : जीवन और विरासत
सर्वव्यापी और सर्वज्ञ श्री सत्य साईं बाबा के पावन जन्मशताब्दी वर्ष में हमें उनकी कौन-सी विरासत को हृदय से अपनाने और ग्रहण करने की लालसा रखनी चाहिए? इसलिए कि बाबा ने अपनी सारी सम्पदा, अपना समस्त ऐश्वर्य और दिव्य सामर्थ्य पहले ही हमें प्रदान कर रखा है। हम सब उनकी उस असीम सम्पदा के उत्तराधिकारी हैं, उनके वारिस हैं। हम सबका दायित्व है, हम उस असली ‘सम्पदा’ को निर्मल मन से ग्रहण करते जाएं। जन्मशताब्दी वर्ष में बाबा को यही विनम्र श्रद्धांजलि होगी।बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती कहते थे, “जैसे चंद्रमा को केवल चंद्रमा के प्रकाश से…
सर्दियों के लिए आजमायी हुईं यौगिक विधियां
सर्दियों के मौसम में कई स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जाती हैं। अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, जोड़ों का दर्द, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी और विशेष रूप से उच्च रक्तचाप की समस्याएं सताने लगती हैं। वैसे तो उच्च रक्तचाप की वजहें और भी हैं। मुंबई की विख्यात चिकित्सक रह चुकीं बिहार योग विद्याय की संन्यासी और “यौगिक मैनेजमेंट ऑफ कैंसर” की लेखिका डॉ. स्वामी निर्मलानंद सरस्वती का कहना है कि धमनियों के सिकुड़ जाने से उच्च रक्तचाप और हृदयरोग को सीधा निमंत्रण मिलता है। सर्दियों के साथ ही, अस्वस्थ्यकर जीवन पद्धति और खानपान की वजह से आदमी मोटा होता है तो भी धमनियां सिकुड़…
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