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Author: Kishore Kumar
Spiritual journalist & Founding Editor of Ushakaal.com
जैसा भोजन, वैसा मन; जैसा मन, वैसा विचार; जैसा विचार, वैसा कर्म
वैदिक परंपरा में ‘आहार’ शब्द का अर्थ केवल वह भोजन नहीं है जो हम मुख से ग्रहण करते हैं। यह एक समग्र अवधारणा है जिसमें वह सब कुछ शामिल है जिसे हम अपनी इंद्रियों और मन के माध्यम से ‘ग्रहण’ करते हैं। जैसा कि छांदोग्य उपनिषद में कहा गया है – “आहार शुद्धौ सत्त्व शुद्धिः; सत्त्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः; स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः।” मतलब यह कि जब आहार शुद्ध होता है, तो अंतःकरण शुद्ध होता है; अंतःकरण की शुद्धि से स्थिर स्मृति (आत्म-स्मरण) आती है; और स्मृति की प्राप्ति होने पर समस्त बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।छांदोग्य उपनिषद का यह…
रामनवमी : राम से बड़ा राम का नाम
मनुष्य ने विकास के अनेक सोपान तय किए हैं। पर, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में गोस्वामी तुलसीदास जी का कालजयी निष्कर्ष, ‘कलि केवल हरि नाम अधारा’ हर दृष्टिकोण से व्यावहारिक जान पड़ता है। रामनवमी के पावन अवसर पर जब हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अवतरण का उत्सव मनाने वाले हैं, तब राम नाम की इस महिमा पर विचार करना और भी प्रासंगिक हो गया है। इसलिए कि यह नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि चेतना को जागृत करने वाली एक दिव्य ध्वनि है।श्रीरामचरितमानस के बालकांड में राम नाम की महिमा का वर्णन अत्यंत गहन…
श्रीदुर्गासप्तशती : आध्यात्मिक चेतना का विज्ञान
भारतीय अध्यात्म की समृद्ध परंपरा में ऐसे ग्रंथ हैं, जिन्हें मनुष्य के भीतर छिपे रहस्यों की कुंजी कहा जाना चाहिए। मार्कंडेय पुराण का श्रीदुर्गासप्तशती उन्हीं में एक प्रमुख ग्रंथ है। अक्सर लोग इसमें वर्णित कथा को केवल देवी और असुरों के युद्ध की पौराणिक या ऐतिहासिक कथा मान लेते हैं। लेकिन गहराई से पड़ताल करें, तो पता चलता है कि यह मानव चेतना के तेरह चरणों का ब्रह्मांडीय आध्यात्मिक विज्ञान है। इसमें वर्णित सात सौ श्लोक असल में हमारे मन की परतों को खोलते हुए उसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ने का काम करते हैं। इस लिहाज से देवी और असुरों…
षट्कर्म बिना अधूरी है योग साधना
भारतीय परंपरा में योग आत्मानुशासन और आत्मबोध की साधना के रूप में पल्लवित-पुष्पित होता रहा है। पर, उसे सीमित स्वरूप देकर आज दुनिया भर के जिम और स्टूडियो में एक ग्लैमरस वर्कआउट के तौर पर प्रस्तुत किया जाने लगा है। नतीजतन, षट्कर्म रूपी मानव शरीर के आंतरिक शोधन का मूल विज्ञान हाशिए पर जा चुका है। भारतीय यौगिक दर्शन में इसे ‘घटाकाश’ के अद्भुत रूपक से समझाया गया है। घटाकाश का अर्थ है कि घड़े के भीतर भी वही अनंत आकाश है, जो बाहर व्याप्त है। यहाँ घड़ा हमारा शरीर है और उसके भीतर का आकाश हमारी जीवात्मा। जब मिट्टी…
होली : आत्मिक शुद्धि का विराट अनुष्ठान
भारतीय संस्कृति में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह आत्मा के परमात्मा से मिलन और अहंकार के विसर्जन का एक महान अनुष्ठान है। ब्रज की पावन रज में जब अबीर-गुलाल की बौछार होती है, तो वह केवल बाहरी चकाचौंध नहीं होती, बल्कि उसके भीतर भक्ति का एक ऐसा अनहद नाद छिपा होता है, जो साधक को भीतर तक झंकृत कर देता है।भक्तशिरोमणि सूरदास से जुड़ी एक अर्थपूर्ण लोककथा से इस बात को समझा जा सकता है। रंगोत्सव का समय था। कुछ भक्तों को विनोदवश विचार आया कि क्यों न सूरदास जी रंग दिया जाए। लिहाजा, वे उनके पास…
बेकाबू जैविक आयु को काबू में करता योग
परिवर्तन संसार का नियम है। भारत अभी दुनिया का सबसे ‘युवा’ देश है। पर, दो दशकों बाद तस्वीर ऐसी ही नहीं होगी। भविष्य की कोख में एक मौन संकट आकार ले रहा है। अगले दो दशकों में बुजुर्गों की संख्या लगभग बारह फीसदी से बढ़कर चौबीस फीसदी तक पहुंच कर हमारे सामाजिक ढांचे की अग्निपरीक्षा ले रही होगी। परिस्थिति न बदली तो देश में बीमार और लाचार वृद्धों की एक विशाल फौज होगी। उनमें स्मृतियों का क्षय करने वाले डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसे रोगों के साथ ही उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर जैसी जानलेवा व्याधियां विकराल रुप धारण कर चुकी…
जब शिवाजी प्रधान सेवक बन गए थे
छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास के बीच का यह प्रसंग भक्ति, समर्पण और कर्तव्य की पराकाष्ठा है कि कैसे एक महान शासक ने अपना संपूर्ण राज्य अपने गुरु के चरणों में अर्पित कर दिया और गुरु ने उसे राजधर्म का पाठ पढ़ाकर लोक कल्याण के मार्ग पर प्रशस्त किया। प्रस्तुत कथा श्रीहनुमान के अवतार के रुप में प्रसिद्ध समर्थ रामदास पर आधारित माधवराव सप्रे की पुस्तक “दासबोध” पर आधारित है, जिसमें समर्थ रामदास और शिवा जी महाराज के बीच प्रेरक संवाद है।कथा है कि एक दिन समर्थ माहुली-संगम पर स्नान-संध्या करके भिक्षा माँगते हुए शिवाजी के महल में पहुंच…
श्रीरामकृष्ण परमहंस : और विश्व-शांति का मर्म
हमने अभी-अभी महाशिवरात्रि मनाई। शिव-शक्ति के मिलन का आध्यात्मिक मर्म और भोलेनाथ के नीलकंठ स्वरुप का निहितार्थ समझा। अब दो दिनों बाद ही यानी अठारह फरवरी को उन्नीसवीं सदी के महान संत श्रीरामकृष्ण परमहंस की जयंती है। उन्हें भी आधुनिक युग का नीलकंठ कहा गया है। उन्होंने संसार की वैचारिक कट्टरता और कलह का विष पीकर “ईश्वर एक है’ की उद्घोषणा के रुप में अमृत प्रदान किया था। धर्मों की सारभूत एकता वाले इस संदेश के जरिए साबित किया कि “महोपनिषद्” में वर्णित “वसुधैव कुटुंबकम्” सार्वभौमिक बंधुत्व का बीज मंत्र है। उनके दिव्य गुणों के कारण ही कहा गया कि…
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती : आधुनिक युग के वैज्ञानिक संत
किशोर कुमार // योग की बेहतर शिक्षा किस देश में और वहां के किन संस्थानों में लेनी चाहिए? यदि इंग्लैंड सहित दुनिया के विभिन्न देशों से प्रकाशित अखबार “द गार्जियन” से जानना चाहेंगे तो भारत के बिहार योग विद्यालय का नाम सबसे पहले बताया जाएगा। चूंकि ऐसा सवाल पश्चिमी देशों में आम है। इसलिए “द गार्जियन” ने लेख ही प्रकाशित कर दिया। उसमें भारत के दस श्रेष्ठ योग संस्थानों के नाम गिनाए गए हैं। बिहार योग विद्यालय का नाम सबसे ऊपर है। इस विश्वव्यापी योग संस्थान के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की समाधि के दस साल होने को हैं। फिर भी बिहार योग का आकर्षण…
प्रेम उठे तो स्वर्ग, गिरे तो नर्क
दुनिया भर में वेलेंटाइन वीक की धूम है। रोमांटिक शेर ओ शायरी से सोशल मीडिया अंटा पड़ा है। प्रेम का संदेश देने वाले भारतीय सूफी संत परंपरा के महान कवि बुल्लेशाह के प्रेम के रंग में रंगे दोहे भी सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे हैं। पचास साल पहले सुप्रसिद्ध भजन गायक नरेंद्र चंचल द्वारा राजकपूर की फिल्म “बॉबी” के लिए गाया गया गीत बैकग्राउंड में बज रहा है – बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, बुल्लेशाह वे कहते। पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, इस दिल में दिलबर रहता…। हमें फिल्म का संदर्भ याद रह गया, गीत के बोल याद रह गए। पर…
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