Author: Kumar Krishnan

आध्यात्मिक जीवन की असली परीक्षा किसी मंदिर या अनुष्ठान के एकांत में नहीं होती, बल्कि हमारे दैनिक व्यवहार की धूप-छांव में होती है। पादुका दर्शन में संन्यास दिवस पर स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने इसी मर्म को छुआ था। उन्होंने याद दिलाया कि गेरुआ पहन लेना आसान है, उसके मर्म को जीवन में उतारना कठिन। संन्यास केवल सिर मुंडाने या वस्त्र बदलने का नाम नहीं है। बात तो तब बनती है, जब मनुष्य अपने ‘मैं’ से मुक्त हो और उसके भीतर सेवा तथा करुणा का भाव गहराए।पर, संन्यास-मार्ग पर आगे बढ़ रहे लोगों को सदैव इस बात का परीक्षण करते रहना…

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भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान देवताओं से भी श्रेष्ठ माना गया है। उपनिषदों से लेकर संत परंपरा तक गुरु को वह प्रकाशस्तंभ बताया गया है, जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के आलोक की ओर ले जाता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और आत्मपरिवर्तन का महापर्व है। यह दिन गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, आत्मचिंतन करने और जीवन को नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।इसी सनातन परंपरा की सजीव अनुभूति इस वर्ष बिहार के ऐतिहासिक नगर मुंगेर स्थित बिहार स्कूल ऑफ योग से…

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