भगवान की गाथाएँ हमारी स्मृति, आस्था और आध्यात्मिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए हम उन्हें सिनेमाघरों के पर्दे पर महज मनोरंजन के लिए नहीं देखते। रामायण, महाभारत और श्रीकृष्ण की लीलाएँ भारतीय जनमानस में केवल कथाओं के रूप में जीवित नहीं हैं। पीढ़ियों से उनका श्रवण, पाठ, मंचन और स्मरण हमारी भक्ति-भावना तथा आध्यात्मिक संस्कारों से जुड़ा रहा है। हम जब ये गाथाएँ सिनेमा के पर्दे पर देखते हैं, तो केवल अभिनय की गुणवत्ता नहीं परखते, बल्कि अपने आराध्य के उन दिव्य गुणों की साकार अभिव्यक्ति से भी रु-ब-रू होना चाहते हैं, जिनसे गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध रहा है।
शायद यही कारण है कि नमित मल्होत्रा द्वारा निर्मित और नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रामायण’ के प्रदर्शन से पहले ही उसकी शास्त्रीय प्रामाणिकता को लेकर प्रश्न उठने लगे हैं। राम-सीता के विवाह प्रसंग पर फिल्माए गए गीत ‘मंगल रंग’ के संगीत को लेकर विशेष रूप से आपत्तियाँ जताई गईं हैं। उसमें सूफी कव्वाली का प्रभाव महसूस करते हुए उसकी तुलना ‘कुन फाया कुन’ तथा ‘आज रंग है’ जैसे गीतों से की जा रही है। विवाद का मूल प्रश्न यह है कि क्या धार्मिक कथाओं के सिनेमाई रूपांतरण में संगीत की रचनात्मक स्वतंत्रता से अधिक महत्त्व उस सांस्कृतिक परिवेश का होना चाहिए, जिसमें कथा घटित होती है? इसी बीच राम और सीता की भूमिकाएँ निभाने वाले रणबीर कपूर और साई पल्लवी के कुछ पुराने और हाल के बयानों को लेकर भी आपत्तियाँ उठाई जाने लगीं।
इन विवादों के बीच लोग रामानंद सागर के लगभग चार दशक पुराने ‘रामायण’ धारावाहिक को भी याद कर रहे हैं। सच है कि उस धारावाहिक ने भारतीय टेलीविजन के इतिहास में ऐसी बड़ी लकीर खींच दी है, जिसके समानांतर नई लकीर खींचना किसी भी फिल्मकार के लिए चुनौतीपूर्ण है। अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया ने राम और सीता के चरित्रों को इतनी सहजता और प्रभावशाली ढंग से साकार किया कि दर्शकों के मन में उनकी छवि अपने आराध्य की छवि से जुड़ गई। उस धारावाहिक ने भारतीय जनमानस में राम और सीता की ऐसी दृश्यात्मक स्मृति निर्मित कर दी, जिसे बाद के वर्षों में भी दर्शक अपने हृदय से अलग नहीं कर पाए हैं।
इससे संबंधित रोचक प्रसंग प्रकाश में आते रहते हैं। कुछ वर्ष पहले ही हवाई अड्डे पर अरुण गोविल को देखते ही एक महिला इतनी भावविभोर हो गई कि उनके चरणों में गिर पड़ी थी। अरुण गोविल ने उस घटना का जिक्र करते हुए कहा था कि लोग वास्तव में उनके चरण नहीं छूते, बल्कि अपनी आस्था और विश्वास को प्रणाम करते हैं। वे तो एक माध्यम भर हैं। इस प्रसंग से समझा जा सकता है कि किस तरह किसी कलाकार का अभिनय दर्शक के मन में उसके आराध्य के साथ एक गहरा भावनात्मक संबंध स्थापित कर देता है।
दरअसल, भगवान के प्रति बचपन से श्रद्धा होने के कारण उनकी सजीव छवि सामने आते ही मन उसे अपने पूर्व संस्कारों से जोड़ लेता है। हम बचपन से जिस श्रीराम का स्मरण कर रहे थे, वही श्रीराम जब किसी कलाकार के रूप में बोलते, चलते, मुस्कराते और करुणा प्रकट करते दिखते हैं, तो अभिनेता और आराध्य के बीच की दूरी घटने लगती है। कलाकार बार-बार उसी चरित्र में दिखे, तो वह छवि स्मृति में बस जाती है। नए कलाकार को इसलिए दोहरी परीक्षा देनी पड़ती है। उसे अच्छा अभिनय भी करना होता है और पहले से जमी उस छवि के बीच अपनी जगह भी बनानी होती है। योगदर्शन में इसे वृत्ति और संस्कार का चक्र कहा गया है और आधुनिक मनोविज्ञान में ‘स्कीमा’।
भारतीय दर्शन और शास्त्रों में किसी अभिनेता या पात्र में ईश्वर की प्रत्यक्ष प्रतीति होने की प्रक्रिया को अंधविश्वास नहीं, बल्कि चेतना और भाव-जगत की एक अत्यंत स्वाभाविक अवस्था माना गया है। ग्रंथों में इस बात का विशद विवेचना है कि स्थूल रूप के पीछे छिपे सूक्ष्म तत्व को किस प्रकार देखा जाए। वेदांत और उपनिषदों में इसे ‘प्रतीकोपासना’ कहा गया है। छांदोग्य उपनिषद और ब्रह्मसूत्र में कहा गया है कि ब्रह्म निराकार, अनंत और सर्वव्यापी है, परंतु मानवीय मन और इंद्रियां अपनी सीमाओं के कारण उस अमूर्त सत्ता को सीधे नहीं पकड़ सकतीं। इसलिए मन को स्थिर करने के लिए किसी नाम, रूप अथवा प्रतीक का आश्रय लेना अनिवार्य हो जाता है। इसलिए, जब कोई अभिनेता मर्यादा, करुणा, तेज या दिव्यता से भरे किसी चरित्र का रूप धारण करता है, तो वह दर्शक के लिए एक जीवित प्रतीक बन जाता है।
चाणक्य नीति में ‘भाव’ को ही ईश्वर की वास्तविक उपस्थिति का आधार मानते हुए स्पष्ट रुप से कहा गया है कि “भावो हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्।” मतलब कि देवता किसी बाह्य वस्तु में नहीं, बल्कि भक्त की आंतरिक भावना में प्रतिष्ठित होते हैं। जब दर्शक पूर्ण श्रद्धा से भगवान का वेश धारण किए व्यक्ति को देखता है, तो अंतःकरण सात्विक हो जाता है। उस क्षण अभिनेता केवल एक माध्यम मात्र रह जाता है, जिसके सहारे व्यक्ति के अपने भीतर सोया हुआ देवत्व जाग्रत होता है। श्रीमद्भागवत में रासलीला के प्रसंग में गोपियों द्वारा कृष्ण का स्वरूप धारण करने और अन्य गोपियों द्वारा उनमें साक्षात कृष्ण के दर्शन करने के प्रसंग से भी इसी भाव-तदात्म्य की पुष्टि होती है।
यही विवेक रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथों के नए सिनेमाई रूपांतरणों को लेकर उठने वाले विवादों को समझने की भी कुंजी है। फिल्मकारों से अपेक्षा करना उचित है कि वे कथा की मूल भावना, शास्त्रीय संदर्भों और पात्रों की गरिमा के प्रति संवेदनशील रहें। आखिर इन कथाओं से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। लेकिन दर्शकों को भी समझना होगा कि किसी कलाकार की निजी मान्यताओं या जीवनशैली को उसके निभाए गए चरित्र की कसौटी नहीं बनाया जा सकता। अभिनय की प्रामाणिकता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि कलाकार ने चरित्र के गुणों, आदर्शों और भावनाओं को कितनी प्रभावशाली और गरिमापूर्ण अभिव्यक्ति दी है।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चौदह वर्षों के वनवास और रावण का संहार करने के पश्चात, अयोध्या लौटे तो दीपावली मनाई गई थी। अच्छा है कि “रामायण” फिल्म भी दीवावली के मौके पर ही प्रदर्शित की जानी है। यदि यह फिल्म दर्शकों के मन में श्रद्धा जागृत कर सका, तो विवादों का सारा धुआँ अपने-आप छँट जाएगा।
(लेखक योग व अध्यात्म विज्ञान विश्लेषक हैं।)
