स्वाधीनता दिवस तीन अनूठे योग लेकर आया है। संसद के दोनों सदनों ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 में संशोधन कर ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज के समकक्ष विधिक दर्जा दे दिया है। इसी अवधि में इस कालजयी रचना की 150वीं वर्षगाँठ का स्मृति-वर्ष चल रहा है, जो पिछले नवंबर आरंभ हुआ। इसके साथ ही 15 अगस्त को श्रीअरविंद का जन्मदिवस भी है, जिन्होंने ‘वंदे मातरम्’ की महत्ता को एक बड़े कैनवास पर समझा और उसके महात्म्य को पूरी प्रखरता के साथ प्रकट किया। इन तीन घटनाओं का संगम एक पुराने प्रश्न को फिर जीवंत बना दिया है कि “वंदे मातरम्” को हम किस रूप में समझें? केवल एक राष्ट्रीय गीत के रूप में, या उस समर्थ मंत्र के रूप में, जिसकी व्याख्या श्रीअरविंद ने भारत की आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक के रूप में की थी?
उत्तर इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ही निहित है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने सन् 1875 में इस गीत की रचना की थी, जो बाद में उनके कालजयी उपन्यास “आनंदमठ” के माध्यम से व्यापक समाज तक पहुँचा। सन् 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे स्वर दिया और आगे चलकर यही गीत स्वाधीनता आंदोलन में जन-जन का सिंहनाद बन गया। इस यात्रा में अनेक महापुरुषों का योगदान रहा, किंतु श्रीअरविंद ने इसे देखने की एक ऐसी अनूठी दृष्टि दी, जिससे इसमें निहित आध्यात्मिक तत्त्व की गहरी दार्शनिक समझ विकसित हो सकी।
श्रीअरविंद बंकिम बाबू पर पहले भी लिख चुके थे, किंतु 1907 में अपने संपादन में निकलने वाली ‘बंदे मातरम्’ पत्रिका के एक लेख में उन्होंने बंकिम बाबू को ‘ऋषि’ की संज्ञा दी। यही लेख आगे चलकर उनकी रचनावली में ‘ऋषि बंकिमचंद्र’ शीर्षक से संकलित हुआ। श्रीअरविंद के दृष्टिकोण में ऋषि वह नहीं जो केवल साहित्य रचे, बल्कि वह है जो सत्य का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करे। वेदों में ऋषि को इसीलिए ‘मंत्रद्रष्टा’ कहा गया है। इस गीत का जन्म भी बंकिम बाबू की दिव्य अनुभूति से हुआ था, इसी कारण श्रीअरविंद ने उन्हें मात्र एक साहित्यकार न मानकर ऋषि के रूप में स्वीकार किया।
जनमानस में इस गीत के प्राकट्य का वर्णन करते हुए श्रीअरविंद ने लिखा था कि बत्तीस वर्ष पूर्व जब बंकिम बाबू ने यह महान गीत लिखा, तब इसे बहुत कम लोगों ने सुना था। किंतु कालांतर में चेतना की एक विशेष अवस्था में जनमानस के कंठ से ‘वंदे मातरम्’ का गान स्वतः फूट पड़ा। इसके साथ ही ऐसा लगा मानो साक्षात माँ प्रकट हो गईं और पूरी जनता देशभक्ति के धर्म में दीक्षित हो गई।
श्रीअरविंद के लिए ‘मंत्र’, ‘दीक्षा’ और ‘प्रकटीकरण’ जैसे शब्द केवल साहित्यिक अलंकार नहीं थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि विशिष्ट ध्वनियाँ जन-चेतना को जाग्रत कर बिखरी हुई सामूहिक ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित कर देती हैं। भारतीय चिंतन में मंत्र की यही परिभाषा है। इसके अनुसार मंत्र केवल शब्द-समूह नहीं, बल्कि चेतना को रूपांतरित करने वाली समर्थ ध्वनि है। ‘वंदे मातरम्’ के विषय में भी श्रीअरविंद का यही दृष्टिकोण था।
यहीं से उनका राष्ट्रवाद सामान्य राजनीतिक विचारों से भिन्न होकर आध्यात्मिक साधना में तब्दील हो गया। उन्होंने राष्ट्र को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे लोगों की चेतना में निवास करने वाली एक जीवंत शक्ति माना। उनका मानना था कि भारत का राष्ट्रवाद तब तक अधूरा रहेगा जब तक वह राजनीति से आगे बढ़कर आत्मा की साधना न बन जाए। वंदे मातरम् इसी साधना का मूल मंत्र है और यह विचार इसी रूप में फलित भी हुआ। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जब यह गीत लाखों कंठों से एक साथ गूंजता था, तब यह एक विराट सामूहिक साधना का रूप ले लेता था।
यौगिक दृष्टि से तो यह गीत भक्ति, कर्म और ध्यान का अद्भुत संगम है। योग दर्शन में ध्वनि को ‘नाद-ब्रह्म’ कहा गया है, क्योंकि शब्द स्वयं परम तत्व का रूप धारण कर लेता है। इस परिप्रेक्ष्य में ‘वंदे मातरम्’ का सामूहिक गान कई आध्यात्मिक धाराओं का संगम बन जाता है। फिर तो मातृभूमि के प्रति पूर्ण समर्पण ‘भक्ति’, राष्ट्र-हित में समर्पित प्रयास ‘कर्मयोग’ और मन की एकाग्रता ‘ध्यान’ बन जाता है। श्रीअरविंद ने इस दिव्य संगम पर मनन किया तो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह गीत एक साथ अंतःकरण को शुद्ध करता है, समाज को क्रियाशील बनाता है और मन को एकाग्र करता है। इसी अनुभूति से सिद्ध हुआ कि यह गीत राष्ट्र की चेतना के लिए संजीवनी महामंत्र है।
हालांकि इस गीत का इतिहास विवादों से पूर्णतः परे नहीं रहा। ‘आनंदमठ’ के कथानक और उसके कुछ अंशों को लेकर समय-समय पर विचार-विमर्श और बहसें होती रहीं। इसी पृष्ठभूमि में सन् 1937 में कांग्रेस ने गहन मंथन के बाद इस गीत के केवल शुरुआती दो पदों को स्वीकार करने का निर्णय लिया था, और इस पहल के केंद्र में स्वयं जवाहरलाल नेहरू थे। किंतु, सक्रिय राजनीति छोड़कर सन् 1910 में ही पुदुचेरी जाकर आध्यात्मिक साधना में लीन हो चुके श्रीअरविंद की अवधारणा इस गीत को लेकर पूरी तरह यथावत बनी रही। इसका कारण यह था कि वे इस गीत के तात्कालिक राजनीतिक उपयोग के स्थान पर उसके मूल में निहित आध्यात्मिक अनुभूति को ही सर्वोपरि मानते थे। उनके दृष्टिकोण में इस गीत की वास्तविक शक्ति इसके काव्य-सौंदर्य या राजनीतिक प्रयोग में नहीं, बल्कि उस आर्ष-दृष्टि में निहित थी, जिससे इसका जन्म हुआ था।
यही कारण है कि आज, डेढ़ सौ वर्षों के पश्चात, ‘वंदे मातरम्’ को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। राष्ट्र की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक चेतना और स्वाधीनता संग्राम में अभूतपूर्व भूमिका निभाने वाले इस गीत को विधिक संरक्षण देने की पहल का स्वागत होना चाहिए। किंतु, हमें इस बात का सदैव ध्यान रखना होगा कि ‘वंदे मातरम्’ का वास्तविक भाव केवल किसी औपचारिक अनुष्ठान या सरकारी निर्देश से प्रकट नहीं हो सकता। उसका सच्चा प्रकटीकरण तभी संभव है, जब हम उसके पीछे निहित उस मूल आर्ष-दृष्टि को आत्मसात करेंगे। जिस दिन यह गीत केवल हमारी वाणी तक सीमित न रहकर हमारी चेतना में उतर जाएगा, उसी क्षण इसका वास्तविक अर्थ हमारे सम्मुख उद्घाटित होगा। इस दृष्टि से यह गीत केवल अतीत की कोई सुनहरी स्मृति मात्र नहीं, अपितु वर्तमान की जीवंत प्रेरणा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)
