परिवर्तन संसार का नियम है। भारत अभी दुनिया का सबसे ‘युवा’ देश है। पर, दो दशकों बाद तस्वीर ऐसी ही नहीं होगी। भविष्य की कोख में एक मौन संकट आकार ले रहा है। अगले दो दशकों में बुजुर्गों की संख्या लगभग बारह फीसदी से बढ़कर चौबीस फीसदी तक पहुंच कर हमारे सामाजिक ढांचे की अग्निपरीक्षा ले रही होगी। परिस्थिति न बदली तो देश में बीमार और लाचार वृद्धों की एक विशाल फौज होगी। उनमें स्मृतियों का क्षय करने वाले डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसे रोगों के साथ ही उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर जैसी जानलेवा व्याधियां विकराल रुप धारण कर चुकी होंगी।
यह डरावनी तस्वीर मानवीय त्रासदी की आहट है, जो हमें सचेत कर रही है कि यदि आज संभले नहीं, तो हालात बदत्तर होंगे। हम सब अक्सर अपने शरीर का आकलन जन्म तिथि के हिसाब से करते हैं। पर, हमारे शरीर की आंतरिक स्थिति का सच्चा दर्पण जैविक आयु होती है। हमारी जैविक आयु कितनी है, इसका आकलन शरीर की कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों की वास्तविक कार्यक्षमता के आधार पर किया जाता है। जैविक आयु के बढ़ने की रफ्तार कितनी है, यह इस बात पर निर्भर है कि जीवन-शैली, खान-पान और नींद की गुणवत्ता कैसी है। मौजूदा समय में एपिजेनेटिक क्लॉक और एआई ब्लड बायोमार्कर जैसे दो ऐसी जांच पद्धतियां उपलब्ध हैं, जिनके जरिए जैविक आयु को मापना और उन्हें चिन्हित करना बेहद आसान हो गया है।
जैविक उम्र बढ़ने की प्रक्रिया शरीर के भीतर चलने वाला एक निरंतर चक्र है। चिकित्सीय शोधों से पता चला है कि शरीर में नई कोशिकाएं बनने का काम लगातार जारी रहता है, जिसमें क्रोमोजोम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। क्रोमोजोम के सिरों पर ‘टेलोमियर‘ नामक एक सुरक्षा कवच होता है, जो डीएनए और आनुवांशिक सूचनाओं को सुरक्षित रखता है। जैसे-जैसे कोशिकाएं विभाजित होती हैं, इन टेलोमियर की लंबाई धीरे-धीरे कम होने लगती है। टेलोमियर का मुख्य कार्य कोशिकाओं को तेजी से नष्ट होने से बचाना है, लेकिन इनके छोटा होने पर कोशिकाएं अपनी कार्यक्षमता खो देती हैं। यही वह स्थिति है, जब शरीर बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगता है और व्याधियों का घर बन जाता है। टेलोमियर के इस क्षय के कारण ही हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी घातक बीमारियों का खतरा शरीर में बढ़ जाता है।
नेचर पत्रिका के मुताबिक, यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख ने वरिष्ठ नागरिकों की एजिंग जनित समस्याओं को ध्यान में रखते हुए “डीओ हेल्थ” नाम से यूरोप में महत्वपूर्ण क्लीनिकल परीक्षण कराया है। उसके तहत एजिंग पर विटामिन डी3, ओमेगा3 फैटी एसिड और व्यायाम के सम्मिलित प्रभावों को देखा गया था। परिणाम आशाजनक थे। जैविक क्लॉक तो धीमा हुआ ही, कैंसर जैसी बीमारी का प्रभाव भी 61 फीसदी तक कम हुआ था। पर, ये उपाय वृद्धावस्था की स्वास्थ्य संबंधी समग्र समस्याओं के लिहाज से नाकाफी हैं। बल्कि भारत में एंटी एजिंग की दिशा में की गई पहल ज्यादा असरदार साबित हो सकता है। इसलिए कि, डीओ हेल्थ परीक्षण के दौरान कुर्सी से खड़े होने, एक पैर पर संतुलन बनाने, सीढ़ी पर चढ़ने-उतरने और रबर बैंड व्यायाम की तुलना में परंपरागत योग के प्रभाव ज्यादा असरदार और व्यापक हैं।
यदि कुर्सी पर खड़े होने के बदले उत्कटासन, एक पैर पर संतुलन बनाने के लिए श्वासों की सजगता के साथ ताड़ासन या वृक्षासन, रबर बैंड व्यायाम की जगह गोमुखासन या हस्त उत्तानासन और सीढ़ी पर चढ़ने-उतरने के बदले सूर्य नमस्कार या वीरभद्रासन किए जाएं तो निश्चित रुप से उसके परिणाम व्यापक होंगे। एम्स के ऐनाटॉमी डिपार्टमेंट की डॉक्टर रीमा दादा के मुताबिक उनके अध्ययन में 96 लोगों को शामिल किया गया था। उन सभी के डीएनए, डैमेज मार्कर, स्ट्रेस मार्कर, एंटीऑक्सीडेंट क्षमता क्षमता और टेलीमियर मार्कर देखे गए। फिर नियमित रूप से तीन महीनों तक योग कराया गया। इसके बाद उनकी जांच की गई। पता चला कि जैविक उम्र की प्रक्रियाएं धीमी पड़ गई थीं।
डॉ. रीमा दादा के शोध से स्पष्ट हुआ कि मानसिक तनाव केवल मन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह कोशिकीय स्तर पर हमारे डीएनए को भी क्षति पहुँचाता है। जब हम तनाव में होते हैं, तो शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है, जो सीधे तौर पर हमारे आनुवंशिक मार्करों को नुकसान पहुँचाता है और बुढ़ापे की प्रक्रिया को तेज कर देता है। नियमित योग करने से शरीर में कोर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन कम होते हैं, जिससे डीएनए को नुकसान पहुँचाने वाले तत्व भी घटने लगते हैं। साथ ही ‘टेलोमेरेज’ नामक एंजाइम सक्रिय हो जाता है, जो टेलोमियर की लंबाई को बनाए रखने या बढ़ाने में सहायक होता है। इससे कोशिकाएं अधिक समय तक युवा और क्रियाशील बनी रहती हैं।
अध्ययन से यह भी पता चला कि योग और ध्यान के कारण जब शरीर में मस्तिष्क-व्युत्पन्न न्यूरोट्रॉफिक कारक यानी ब्रेन डेराइव्ड न्यूरोट्रोफिक फैक्टर (बीडीएनएफ) का स्तर बढ़ता है, तो एकाग्रता, याददाश्त और सीखने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होता है। इसलिए कि बीडीएनएफ ‘मस्तिष्क की खाद’ की तरह होता है, जो न्यूरॉन्स के जन्म, उनके विकास और उन्हें जीवित रखने में निर्णायक भूमिका निभाता है। साथ ही उनके बीच के संपर्क को भी मजबूत बनाता है। यही कारण है कि योग के प्रभाव से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और उम्र के साथ होने वाली भूलने की बीमारी या डिमेंशिया का खतरा भी काफी कम हो जाता है।
भारत की पहल यहीं तक सीमित नहीं है। भारतीय विज्ञान संस्थान की “दीर्घायु भारत पहल” या लॉन्गेविटी इंडिया इनिशिएटिव ने भी बड़ी उम्मीद जगाई है। इसके तहत भारतीयों की विशिष्ट संरचना को ध्यान में रखते हुए एंटी-एजिंग उपचार और प्रभावशाली बायोमार्कर विकसित किया जा रहा है। इस पहल का सबसे सशक्त पक्ष योग, आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा का समन्वय है। आंवला रसायन जैसे आयुर्वेदिक उपचारों पर किए गए अध्ययनों ने यह सिद्ध कर दिया है कि ये वृद्ध व्यक्तियों में डीएनए की मरम्मत करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। बिना किसी दुष्प्रभाव के मिलने वाले परिणाम से पता चलता है कि योग और आयुर्वेद केवल परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य की एंटी-एजिंग तकनीक के मजबूत स्तंभ हैं। इस तरह, समय की गति को थामना भले ही मनुष्य के वश में न हो, पर अपने शरीर की आंतरिक घड़ी यानी ‘बायोलॉजिकल क्लॉक’ की रफ्तार को धीमा करना संभव होता दिख रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)ए

