समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए धनतेरस केवल धन-संपत्ति की कामना का पर्व नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, जीवनशक्ति और अमृतत्व के गहरे आध्यात्मिक रहस्य पर विचार करने का भी अवसर है। किंतु प्रश्न है कि समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत का हमारे जीवन से क्या संबंध है? क्या अमृत केवल देवताओं के लिए था या मनुष्य के भीतर भी उसका कोई स्रोत विद्यमान है?
भारतीय योग परंपरा के अनुसार, मनुष्य के भीतर चेतना और जीवनशक्ति का अपार भंडार छिपा हुआ है। तप, ध्यान और योग साधना से यह सुप्त शक्ति जागृत होने लगती है। योग की भाषा में इसे कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने भी कुण्डलिनी योग के संदर्भ में मनुष्य की सुप्त शक्तियों के जागरण और चेतना के विकास पर विशेष बल दिया है। उनकी पुस्तक “कुंडलिनी योग” अद्भुत है, जिसमें तंत्र विद्या, कुंडलिनी जागरण संबंधी उनका व्यक्तिगत अनुभव और वैज्ञानिक साक्ष्यों का अनुपम संग्रह है।
समुद्र मंथन की पौराणिक कथा को यदि योग की दृष्टि से देखें, तो हमारे भीतर भी एक समुद्र विद्यमान है। यह हमारे मन, प्राण, बुद्धि, संस्कारों और चेतना का विशाल संसार है। सामान्यतः हम इसकी सतह पर उठने वाली इच्छाओं और विचारों की लहरों में उलझे रहते हैं। किंतु जब योग साधना द्वारा अपने अंतर्जगत का मंथन करते हैं, तो भीतर छिपी शक्तियों और विकारों से हमारा सामना होता है। इस दृष्टि से कुण्डलिनी जागरण को समुद्र मंथन का आध्यात्मिक रूपक माना जा सकता है।
योग परंपरा में कुण्डलिनी को मेरुदंड के मूल में स्थित सुप्त शक्ति माना गया है। साधना के प्रभाव से इस शक्ति के सुषुम्ना मार्ग से ऊपर उठाया जाता है। अर्थात् एक ओर तप की अग्नि ऊपर उठती है, तो दूसरी ओर सोम की चैतन्य धाराएँ मस्तिष्क रूपी पर्वत के शिखर से नीचे प्रवाहित होने लगती हैं। इन धाराओं के कारण ही शांति, आनंद और आंतरिक तृप्ति का अनुभव होता है। योग की भाषा में इसे ही शिव-शक्ति का मिलन या अग्नि-सोम का मिलन कहा गया है। जब साधना से उसका मन निर्मल होता है, विचारों में स्पष्टता आती है और जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलता है, तो व्यक्ति भीतर से रुपांतरित हो जाता है।
ऋग्वेद में वृद्ध गायों के पुनः युवा होने का उल्लेख मिलता है। महर्षि अरविन्द ने अपनी पुस्तक “द सीक्रेट ऑफ द वेद” में इस वैदिक प्रतीक की व्याख्या करते हुए गायों को ज्ञान और प्रकाश की शक्तियों से जोड़ा है। उनके अनुसार वृद्ध गायों का पुनः युवा होना उस दिव्य प्रकाश की पुनर्प्राप्ति का संकेत है, जो अज्ञान के कारण ओझल हो गया था। इस दृष्टि से कायाकल्प का अर्थ केवल वृद्ध शरीर का युवा हो जाना नहीं है। यह उस चेतना का पुनर्जागरण भी है, जो सांसारिक उलझनों और अज्ञान के कारण अपनी वास्तविक क्षमता को प्रकट नहीं कर पाती। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के समग्र योग का लक्ष्य भी मानव प्रकृति और चेतना का व्यापक रूपांतरण है।
श्रीमद्भागवतम् में धन्वंतरि के प्राकट्य और उनके हाथ में अमृत कलश का वर्णन है। धन्वंतरि आयुर्वेद के अधिष्ठाता हैं। इसलिए उनका प्राकट्य स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन यौगिक दृष्टिकोण से अमृत कलश के विशिष्ट मायने हैं। वह मनुष्य के भीतर छिपी उस आनंदमयी चेतना का प्रतीक है, जिसे साधक तप और आत्ममंथन से अनुभव करने का प्रयास करता है।
इस प्रकार समुद्र मंथन की कथा और कुण्डलिनी जागरण के बीच एक सार्थक आध्यात्मिक संबंध दिखता है। समुद्र मंथन से पहले हलाहल विष निकला था। इसी प्रकार जब मनुष्य अपना आत्ममंथन करता है, तो उसे सबसे पहले अपने भीतर के क्रोध, लोभ, अहंकार, भय और नकारात्मक संस्कारों का सामना करना पड़ता है। इन प्रवृत्तियों का सामना करते हुए ही वह आत्मशुद्धि की ओर बढ़ता है।
धनतेरस का वास्तविक आध्यात्मिक संदेश इसी आत्ममंथन में छिपा है। हम जीवनभर बाहरी धन और सुख-सुविधाओं की खोज में लगे रहते हैं। लेकिन यदि हमारा मन अशांत है और विचार नकारात्मक हैं, तो बाहरी समृद्धि भी हमें स्थायी संतोष नहीं दे सकती। भगवान धन्वंतरि के अमृत कलश से हमें शिक्षा मिलती है कि स्वास्थ्य केवल शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन की समग्र साधना का आधार है। और योग से हमें शिक्षा मिलती है कि शरीरिक स्वास्थ्य के साथ मन की निर्मलता, प्राणों का संतुलन और चेतना का विकास भी आवश्यक है।
इसलिए इस युग में समुद्र मंथन का एक आध्यात्मिक अर्थ कुण्डलिनी जागरण और आत्ममंथन भी है। अंतर इतना है कि पौराणिक समुद्र मंथन में अमृत बाहर से प्राप्त हुआ था, जबकि योग साधना हमें अपने भीतर छिपे आनंद और चेतना के स्रोत की खोज करने के लिए प्रेरित करती है। क्योंकि वास्तविक समृद्धि केवल धन का संग्रह नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, शांत मन और आनंदमय चेतना का संगम है। यही हमारे भीतर के अमृत कलश की खोज है।
(लेखक योग व अध्यात्म विज्ञान विश्लेषक हैं।)
