बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने कोई पांच दशक पहले कहा था कि 21वीं शताब्दी भक्ति की शताब्दी होगी। यह अवश्य घटित होगा, एक मान्यता के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान के रूप में। बच्चे माता-पिता से सवाल करेंगे कि मीराबाई जहर पी कर भी जीवित कैसे रह गई थीं? यानी, यह चेतना के विकास से जुड़ा मामला है। वे अक्सर कहते थे कि आध्यात्मिक चेतना का विकास ही मनुष्य की नियति है। निम्न वासनाओं और कामनाओं के दायरे में सीमित रहना मनुष्य की नियति नहीं है। महर्षि अरविंद का भी इस विषय पर सुंदर और तार्किक व्याख्यान है। वे कहते थे कि आने वाले युग में दिव्य चेतना मानव जीवन में अवश्य प्रकट होगी। कोई चाहे, न चाहे, मगर यह होकर रहेगा। यही मानवता की निर्धारित नियति है।
कोई पूछ सकता है कि नागपंचमी के मौके पर दो महान गुरुओं की भविष्यवाणी के क्या मायने? दरअसल, यही सवाल इस पूरे लेख की धुरी है। विज्ञान की एक छात्रा ने नागपंचमी से जुड़े कुछ ऐसे सवाल किए, जिससे गुरुओं की वाणी मानस-पटल पर छा गई। इन सवालों में उस युग की आहट दिखी, जिसके बारे में काफी पहले गुरुओं ने भविष्यवाणी की थी। पहला सवाल था कि नागपंचमी पर सांप को दूध क्यों पिलाते हैं? सांपों का शरीर दूध पचाने के लिए नहीं बना है। इसे पचाने के लिए शरीर में एक खास पाचक तत्व की जरूरत होती है, जो केवल स्तनधारियों के पास होता है। सांप के पाचन तंत्र में दूध पचाने वाला तत्व बिल्कुल नहीं होता। बात सही है और विज्ञानसम्मत भी। मैंने कुछ समय पहले ही वन विभाग के किसी अधिकारी के हवाले से खबर पढ़ी थी, जिसमें लिखा था कि नागपंचमी पर सांप का दूध पीना उसकी स्वाभाविक पसंद नहीं, बल्कि जीवन रक्षा की एक कारुणिक विवशता है।
अनुष्ठानों के लिए पकड़े गए सांपों के अक्सर विषदंत तोड़ दिए जाते हैं और उन्हें हफ्तों भूखा-प्यासा रखा जाता है। अत्यधिक निर्जलीकरण और प्यास से तड़पता सांप अपनी जान बचाने की हताशा में दूध को भी जल समझकर पी लेता है। यह अप्राकृतिक आहार उसके लिए प्राणघातक सिद्ध होता है। जैविक रूप से लैक्टोज न पचा पाने के कारण दूध उसके फेफड़ों में संक्रमण, एलर्जी और आंतों में सड़न पैदा करता है, जिससे कुछ ही दिनों में उसकी तड़प-तड़पकर मृत्यु हो जाती है, जबकि, नागपंचमी का मूल संदेश प्रकृति और जीव के प्रति सह-अस्तित्व, सजगता और सम्मान का है। वैसे, नाग को दूध पिलाने की प्रथा कैसे शुरु हुई, इसका साक्ष्य नहीं मिलता। हां, पौराणिक कथा यह है कि जनमेजय के सर्पसत्र में नाग जलने लगे और आस्तीक मुनि ने उन्हें बचाया। सर्प के शरीर पर दूध डालकर दाह शांत किया गया। हो सकता है कि उसी कथा का कालांतर में रुप बदल गया हो।
दूसरा सवाल। जो सर्प हमारे लिए साक्षात काल के समान होता है, वही सर्प योगियों के गले का हार क्यों बन जाता है? आधुनिक युग में इस बात को आध्यात्मिक नजरिए से ही समझा जा सकता है। इसलिए कि योगी के लिए जीव के रुप में सांप की अहमियत नहीं होती, बल्कि वे तो उसकी देह-मुद्रा में झलकने वाले एक अद्भुत संतुलन के कायल होते हैं। आपने कभी किसी सांप को देखा होगा। वह घंटों तक एक ही स्थान पर बिना किसी हलचल के पड़ा रहता है। बाहर से देखने पर वह पूरी तरह तनाव-मुक्त और निश्चल दिखता है, लेकिन भीतर से? भीतर से वह पल-पल परम सजग और जाग्रत रहता है। उसकी यह अवस्था हूबहू वैसी ही लगती है, जैसी किसी सिद्ध योगी की समाधि या गहरे ध्यान की अवस्था होती है। योग की तांत्रिक और हठयोग परंपरा में कुंडलिनी का वर्णन मूलाधार में सुप्त शक्ति के रूप में मिलता है। वह कब जागेगी, किस दिशा में गति करेगी और अपनी शक्ति का किस तरह उपयोग करेगी, यह उसकी जागृति पर निर्भर करता है। योगियों ने मनुष्य में भी कुछ ऐसा ही देखा। हमारे भीतर बुद्धि, ऊर्जा, संवेदना और चेतना की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं, लेकिन सामान्य जीवन में उनका बहुत छोटा हिस्सा ही सक्रिय हो पाता है। साधना का उद्देश्य इसी सुप्त क्षमता को पहचानना और उसे सही दिशा देना है। इन दो दृष्टिकोणों से योगी प्रतीकात्मक रुप से सर्प को बड़े महत्व का मानते रहे हैं। भगवान शिव के गले का नाग भी इसी भाव को व्यापक फलक पर अभिव्यक्त करता है।
तीसरा सवाल। नागपंचमी पर ढेर सारे सपेरे अपने बीन (वाद्य-यंत्र) की धुन पर सर्प को नचाते दिखते हैं। लोगों को लगता है कि संगीत सर्प को भी प्यारा होता है, जबकि विज्ञान के मुताबिक, सांप के कान हमारी तरह नहीं होते? यह सवाल वाकई अंधविश्वास पर से परतें हटाने वाला है। लगातार हो रहे वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि सर्प पूर्णतया बहरे नहीं होते। उनके भीतरी कान की संरचना पूरी होती है, और वे जबड़े की हड्डियों के माध्यम से कंपन को भीतरी कान तक पहुँचाते हैं। यही नहीं, वे ज़मीनी कंपन के साथ-साथ हवा से आती ध्वनि को भी एक सीमा तक, लगभग साढ़े चार सौ हर्ट्ज़ तक, महसूस कर लेते हैं। फिर भी, वैज्ञानिक कहते हैं कि सपेरो के बीन की आवाज उसे आह्लादित नहीं कर पाती, बल्कि बीन का हिलना-डुलना भय पैदा करता है। साँपों की दृष्टि गति के प्रति बहुत संवेदनशील होती है। जब सपेरा बीन बजाते समय उसे इधर-उधर घुमाता है और खुद भी झूमता है, तो साँप उस हिलती हुई वस्तु को अपने लिए संभावित खतरा मान लेता है। वह अपनी आत्मरक्षा की मुद्रा में फन उठाकर उस पर लगातार नज़र टिकाए रखता है। जैसे-जैसे बीन घूमती है, साँप भी अपना ध्यान उस पर केंद्रित रखने के लिए उसी दिशा में हिलता है। देखने वालों को यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो साँप संगीत की धुन पर नाच रहा हो।
यहीं हमें नागपंचमी से बड़ी सीख भी मिलती है। परंपरा का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं कि उसके हर व्यवहार को बिना प्रश्न स्वीकार कर लिया जाए। भारतीय परंपरा की मूल शक्ति ही प्रश्न करने में रही है। उपनिषदों का पूरा संसार प्रश्न और उत्तर से निर्मित हुआ। नचिकेता ने मृत्यु से प्रश्न किया। गार्गी ने याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया। अर्जुन ने कृष्ण से प्रश्न किया। प्रश्न ने ही भारतीय दर्शन को आगे बढ़ाया।
इसलिए यदि आज की पीढ़ी पूछती है कि सांप को दूध क्यों पिलाया जाता है, सर्प बीन पर क्यों झूमता है और शिव के गले में नाग क्यों है, तो इसे परंपरा के प्रति असम्मान नहीं समझना चाहिए। यह तो उसी भारतीय बौद्धिक परंपरा की निरंतरता है, जिसमें श्रद्धा के साथ विवेक का भी समावेश है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

