भारत माता ने आज के दिन स्वामी विवेकानंद के रुप में एक ऐसे सपूत को जन्म दिया था, जिन्होंने अल्पायु में ही प्रसुप्त भारतीय चेतना को झकझोरने के लिए सनातन धर्म को कर्मकांडों से निकालकर एक जीवंत, व्यावहारिक और राष्ट्र-निर्माण की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। परिणाम हुआ कि इस व्यावहारिक वेदांत के कारण भारतीय दर्शन को पुनर्जीवन मिला और सनातन धर्म आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का आधार बन गया। इससे विश्व पटल पर भारत का गौरव बढ़ा।
जन्मजात संन्यासी स्वामी विवेकानंद इस निष्कर्ष पर थे कि प्रत्येक राष्ट्र का विश्व के लिए एक संदेश होता है, एक प्रेरणा होती है। जब तक वह संदेश आक्रांत नहीं होता, तब तक राष्ट्र जीवित रहता है। भारत का संदेश बहिर्यात्रा नहीं, अंतर्यात्रा रहा है। उसकी समृद्धि का आधार आध्यात्मिक संपदा है। यह संपदा जब तक हमारे पास है, राष्ट्र का गौरव बना रहेगा। इस मान्यता के पीछे उनका व्यापक आध्यात्मिक दृष्टिकोण था। वे कहते थे, जिस तरह फ्रांसीसियों के चरित्र का आधार स्वाधीनता और समानता रही है। उसी तरह भारतीयो जीवन का मेरुदण्ड धर्म और आध्यात्मिकता है। भारतीय राजनीतिक उत्पीड़न, अपमान या संपत्ति की लूट को तो सहन कर लेते हैं। पर, जब धर्म या आध्यात्मिक मान्यताओं पर प्रहार होता है, तब वे अस्थिर हो जाते हैं। इसके ऐतिहासिक उदाहरण हैं। मुग़ल साम्राज्य तब तक फला-फूला, जब तक उसने धर्म में हस्तक्षेप नहीं किया। औरंगजेब के पतन का कारण धार्मिक असहिष्णुता थी। अंग्रेज इस बात को समझते थे और धार्मिक मामलों में प्राय: तटस्थ ही रहे।
स्वामी जी चाहते थे कि भारत की यह शक्ति, जो विश्व के लिए संदेश है, वह किसी हालत में आक्रांत न होने पाए। तभी उन्होंने युवापीढ़ी से अपील की थी – “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।“ इस आध्यात्मिक संदेश के गूढ़ार्थ को सामान्य बुद्धि से नहीं समझा जा सकता। भारत के सिद्ध योगी इस संदेश की व्याख्या कुछ इस तरह करते हैं। स्वामी जी ने उठो इसलिए कहा कि वे जानते हैं कि आधुनिक युग का युवा अज्ञान (अविद्या) की नींद में हैं, और वह खुद को केवल शरीर और मन समझता है। इसलिए उसे इस देह-भाव से ऊपर उठना होगा। अपनी दुर्बलताओं, हीन भावनाओं और “मैं नहीं कर सकता” के विचार को त्यागकर अपनी अनंत आंतरिक शक्ति को पहचानना होगा। आत्म-स्वरुप का ज्ञान जागना है। हमें समझना होगा कि हम एक नश्वर शरीर नहीं, बल्कि अजर, अमर और अनंत आत्मा हैं। अच्छे और बुरे, नित्य और अनित्य के बीच भेद करने वाली बुद्धि (विवेक) को जगाना होगा। फिर आत्म-साक्षात्कार और परहित को लक्ष्य करके इस आध्यात्मिक मार्ग की बाधाओं को पार करते जाना है। 
दरअसल, स्वामी जी का संदेश हमें याद दिलाता है कि मनुष्य का जन्म केवल भोग-विलास के लिए नहीं हुआ है, बल्कि पशुवत प्रवृत्तियों को त्यागकर चेतना के रुप में प्रसुप्त ईश्वरीय शक्ति को जगाने के लिए हुआ है। और तब तक संघर्ष जारी रहना चाहिए, जब तक कि वह परम सत्य (परमात्मा) प्राप्त न हो जाए। यदि हम अपने बुनियादी तत्व को ही नष्ट कर देंगे, जिससे हमारा अस्तित्व जुड़ा हुआ है, तो विनाश निश्चित है। सच है कि किसी भी देश की दिशा और दशा वहां के नौजवान ही तय करते हैं। लेकिन इसके लिए युवाओं का चरित्र कैसा होना चाहिए? स्वामी जी कहते थे, “हमें ऐसे युवाओं की जरूरत है, जो साहसी हों, जिनका हृदय निर्मल हो, जो निडर हों और जिनकी आँखों में ऊँचे सपने हों। लेकिन योगमय जीवन के बिना ऐसा चरित्र कदापि संभव नहीं।
इसलिए योग को लेकर उनका नजरिया बड़ा ही स्पष्ट था। “योग” शब्द आते ही हमारे मन में आसन, प्राणायाम या कसरती स्टाइल के आसनों की छवि उभरती है। पर, स्वामी विवेकानंद की यौगिक शिक्षाएं इस सीमित दायरे से बहुत ऊपर है। वे जीवन पर्यंत शिक्षा देते रहे कि योग आत्मा के अनुशासन, मन के परिष्कार और अंतःशक्ति के जागरण का विज्ञान है, जो मानव चेतना के उत्कर्ष का मार्ग है। उन्होंने योग के चार मार्ग बताए – कर्मयोग (निष्काम कर्म), भक्तियोग (हृदय की शुद्धि), राजयोग (मन का अनुशासन) और ज्ञानयोग (बोध का विकास) इन चारों का लक्ष्य एक ही है — अहंकार का क्षय और आत्म-साक्षात्कार। पर, महर्षि पतंजलि के “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” को सदैव अपनी यौगिक शिक्षा के केंद्र में रखा। क्यों? इसलिए कि मानव दुर्बल नहीं है। वह अपनी शक्ति से अनभिज्ञ है। योग वह साधना है, जिससे अशांत मन को शांति मिलती है और बिखरी हुई शक्ति को सृजनात्मक मार्ग पर ले जाती है।
स्वामी जी “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” की अवस्था को प्राप्त करने के लिए आत्म-नियंत्रण को पहला कदम बताते हुए कहते थे कि योग की शुरुआत आसन से नहीं, बल्कि नियम-संयम से होनी चाहिए। इसलिए कि यम और नियम कोई नैतिक अनुशासन नहीं, बल्कि आंतरिक ऊर्जा के संरक्षण का तकनीक है। यह तकनीक के कारण अनियंत्रित इच्छाऔं और उसके कारण होने वाले मानसिक विखराव पर अंकुश लगता है। इस दृष्टि से योग केवल व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि सामाजिक उत्थान का आधार भी है। लेकिन आज आम युवाओं की हालत क्या है? ज्यादातर युवा या तो सोशल मीडिया में मशगूल है या भौतिक सफलता के लिए भारी दबाव में है।
सुकून की बात यह है कि युवाओं का एक ऐसा वर्ग उठ खड़ा हुआ है, जो ‘दिखावे’ की दुनिया से ऊब चुका है। वह अब जीवन के गहरे अर्थ को खोज रहा है। ऐसे युवा पश्चिमी दुनिया के प्रभावों से मुक्त होने की जद्दोजहद के बीच यह जानना चाहते हैं कि वास्तव में ‘सफल’ और ‘संतुष्ट’ जीवन का आधार क्या है। वे अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और अपनी विरासत की ओर देखते हुए अपनी जड़ों को तलाश रहे हैं, ताकि वे मजबूती से उठ खड़े हो सकें। स्वामी जी के द्वारा बताए गए यौगिक उपाय इस काम में मददगार है। यदि हम सच्चे हैं, तो हम सफल जरूर होंगे। राष्ट्रीय युवा दिवस का महान संदेश भी यही है कि हमें अपनी ऊर्जा को सही दिशा देनी होगी। इस लिहाज से यह समय आत्म-मंथन का है। ताकि भारत के वास्तविक स्वरूप को बरकरार रखा जा सके। आइए, हम स्वामी विवेकानंद के शक्तिशाली आह्वान “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए,” को अपने आध्यात्मिक जीवन का मंत्र बना लें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

