ओशो कालजयी हैं, शाश्वत, सदैव प्रासंगिक हैं। पर, आधुनिक युग में जब कभी विवादस्पद आध्यात्मिक गुरुओं की बात आती है तो ओशो का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे अपने जीवनकाल में बेहद विवादास्पद रहे। क्यों? इसलिए कि उन्होंने पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और रूढ़ियों को सीधे चुनौती दी। सेक्स, राजनीति, धर्म और सामाजिक व्यवस्था जैसे संवेदनशील विषयों पर खुलकर बातें करते रहे। परिणाम स्वरुप उनके चाहने वालों की संख्या दुनिया भर में बढ़ती गई। यहां तक कि लंदन के “द संडे टाइम्स” ने उन्हें ‘1,000 मेकर्स ऑफ द ट्वेंटीएथ सेंचुरी” की सूची में शामिल किया था। वहीं दूसरी तरफ, समाज का बड़ा तबका इन बातों को स्वीकार नहीं कर पाया। पर, महाप्रयाण के बाद उनके विचारों की स्वीकार्यता बढ़ती चली जा रही है तो यह मंथन का विषय जरुर बनता है।
नि:संदेह, ओशो सबसे मौलिक विचारकों में से एक थे। हालांकि उनके विचार इतने विवादास्पद होते थे कि विधानसभा से लेकर संसद तक में चर्चा के विषय बन जाते थे। सन् 1968-69 में बात यहां तक पहुंच गई थी कि गुजरात सरकार ने नर्मदा के किनारे ओशो आश्रम बनाने के लिए दी गई छह सौ एकड़ जमीन वापस ले ली थी। अमेरिका में ओशो (तब भगवान श्री रजनीश) के खिलाफ भारत से भी कहीं अधिक सख्त और सीधी कानूनी कार्रवाई हुई थी। नतीजतन, उन्हें अमेरिका छोड़कर जाना पड़ा था। इतना ही नहीं, दुनिया के 21 देशों में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लग गया था। ओशो अस्सी के दशक में जब अमेरिका से भारत लौटे थे तो भी उनको लेकर संसद में विरोध के स्वर सुनाई पड़े थे।
सच है कि नए विचारों और उसके आलोक में धर्म की व्याख्या का सदैव विरोध होता रहा है। बुद्ध हों या जीसस जीते जी उनकी बातों पर कहां विश्वास किया गया। जीसस को तो सूली पर ही चढ़ा दिया गया था। ऐसे में ओशो भी अपवाद नहीं रहे तो चौंकाने जैसी बात नहीं थी। वैसे भी, ओशो सरलता से सूली पर चढ़ने को तैयार नहीं थे। तभी तो जेल में डाला गया तो उन्होंने वही क्रांति के बीज बो दिए थे। उसकी तपिश आज भी महसूस की जा रही है। ओशो आज भी प्रासंगिक इसलिए हैं, क्योंकि वे अतीत के उत्तर नहीं देते, बल्कि वर्तमान में जीने की कला सिखाते हैं। वे कोई नया धर्म नहीं देते, बल्कि आपको वह आईना दिखाते हैं, जिसमें खुद के असली चेहरे को देखा जा सके।
उनके ज़ोरबा द बुद्धा संबंधी क्रांतिकारी सिद्धांत को लोग कहां भूल पाए हैं, बल्कि वह सिद्धांत आधुनिक युग के युवाओं को खूब भा रहा है। जैसे, ओशो कहा करते थे कि एक पूर्ण मनुष्य वह है, जो बाहरी दुनिया (यूनानी चरित्र जोरबा, जो खाने, पीने और नाचने में मग्न रहता है) और भीतरी दुनिया (बुद्ध, जो शांत और ध्यानमग्न हैं) दोनों को एक साथ जीता है। आज का युवा भौतिक सफलता के साथ ही मानसिक शांति भी चाहता है तो वह खुद को ओशो के विचार के करीब पाता है। इसलिए ओशो के विचारों से प्रभावित लोगों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है।
ओशो के कुछ विवादास्पद विचार, जैसे कि कामुकता के प्रति खुला दृष्टिकोण (संभोग से समाधि तक), अब अधिक स्वीकार्य और प्रासंगिक माना जा रहा है। प्रख्यात कवि और प्रेरक वक्ता कुमार विश्वास शायद इकलौते हैं, जिन्होंने भरी सभा में स्वीकार किया कि उन्होंने ओशो की चर्चित व विवादास्पद पुस्तक “संभोग से समाधि तक” को छात्र जीवन से लेकर अब तक चार बार पढ़ा। वे इस निष्कर्ष पर हैं कि संभोग शब्द केवल टाइटल भर है। पुस्तक में बातें समाधि की हैं, ऊर्जा की हैं, उसके रूपांतरण की हैं। इस तरह कहा जा सकता है कि जिस तरह बुद्ध या ईसा मसीह की अनुपस्थिति में उनके विचारों को विस्तार मिला, उसी तरह ओशो के मौलिक और स्वतंत्र चिंतन को भी अब अधिक स्वीकार्यता मिल रही है।
ओशो कहते रहे कि श्रद्धा कास्मिक है, ब्रह्मभाव है। भक्ति आत्मिक है, व्यक्तिभाव है। ध्यान मानसिक है और योग शारीरिक है। ज्यादातर लोग क्या करते हैं, शरीर से शुरू करते हैं, फिर मन पर जाते हैं, फिर आत्मा पर और फिर ब्रह्म पर। यानी कैवल्योपनिषद में बतलाए गए क्रम से उलट। इसलिए हर चरण सहज न होकर कठिन होता चला जाता है। योग से शुरू करने वाले आसन वगैर करके निपट जाते हैं। ध्यान से शुरू करने वालों के लिए भक्ति कठिन हो जाती है और भक्ति से शुरू करने वाले श्रद्धा तक नहीं पहुंच पाते। इसलिए, शुरूआत श्रद्धा से होनी चाहिए। ओशो के लिए श्रद्धा का मतलब किसी पत्थर की मूर्ति या किताब को पूजना नहीं है, बल्कि अपने भीतर के संदेहों के तूफानों के शांत होने के बाद जो गहरा मौन बचता है, उसी में जीना है। युवा ध्यान साधकों को यह बात खूब भाती है।
ओशो कहते थे कि दुनिया में कुछ समय के लिए गुणतंत्र लोकतंत्र का स्थान लेगा। यानी, सत्ता राजनीतिज्ञों के हाथों से पहले वैज्ञानिकों के हाथ में जाएगी, फिर वैज्ञानिक स्वयं उसे संतों-रहस्यदर्शियों को सौंप देंगे। इसलिए कि केवल रहस्यदर्शी के हाथ में ही धरती स्वर्ग बन सकती है। अब जब हम इस बात का विश्लेषण करते हैं तो इसे सत्य के करीब पाते हैं और ओशो के प्रति उसका आकर्षण बढ़ जाता है। हम जानते हैं कि आइंस्टाइन के एक पत्र के कारण परमाणु बम बन गया, जिसके कारम पूरा द्वितीय विश्व युद्ध का परिणाम बदल गया था। हिटलर, स्टालिन, चर्चिल, रूज़वेल्ट कोई मायने नहीं रखते थे। असली शक्ति एक वैज्ञानिक के पास थी।
ओशो के चाहने वाले नहीं मानते कि ओशो ने जीवन को कभी दुश्मन बनाया। उन्होंने इतना ही किया कि कभी किसी चीज़ को खारिज नहीं किया; न शरीर को, न कामवासना को, न धन को, न क्रोध को, न मृत्यु को। वे हर चीज़ को गहरे प्रेम से गले लगाते थे, इसलिए उनके हाथों में काँटे भी फूल बन जाते थे। प्रसिध्द गीतकार गुलजार सदैव ओशो के विचारों से खासे प्रभावित रहे हैं। वे कहते हैं कि ओशो कुछ और नहीं, बल्कि अस्तित्व की अभिव्यक्ति हैं। अस्तित्व का माधुर्य हैं। उनकी करूणा का सहारा पाकर मानवता धन्य हुई। ओशो को उनकी 94वीं जयंती (11 दिसंबर) पर सादर नमन।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

