श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत काल में जितनी स्फूर्तिदायक थी, आज भी उतनी ही है। यह मानव चेतना के लिहाज से एक ऐसा अनंत महासागर है, जिसकी गहराइयों में उतरने का प्रयास सदियों से मनीषी और विद्वान करते आए हैं। तभी कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में दिया गया गीता का ज्ञान आज प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों और कॉरपोरेट जगत के बोर्डरूम तक पहुँच चुका है। कमाल यह कि हजारों वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश आधुनिक विज्ञान और शोध की कसौटी पर न केवल खरा उतर रहा है, बल्कि उसे नई दिशा भी दे रहा है।
भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक के विश्वविद्यालयों में श्रीमद्भगवतगीता पर शोध प्रबंधों की भरमार है। ये शोध केवल भक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें प्रबंधन, नेतृत्व कुशलता, मनोविज्ञान और संघर्ष समाधान जैसे गंभीर विषय भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, दुनिया की एक सौ से अधिक भाषाओं में मौजूद दो हजार से ज्यादा टीकाएँ उपलब्ध हैं, जो अपने आप में विद्वतापूर्ण अध्ययन के प्रमाण हैं। महात्मा गांधी लंदन में थे तो एक बड़े पुस्तकालय में गए और लाइब्रेरियन से पूछा कि कौन-सी पुस्तक सबसे ज़्यादा बार जारी की जाती है। लाइब्रेरियन ने छूटते ही कहा – “श्रीमद्भगवतगीता।“ इस प्रसंग से भी श्रीमद्भगवतगीता की लोकप्रियता का पता चलता है।
सापेक्षता के सिद्धांत के जनक अल्बर्ट आइंस्टीन से लेकर क्वांटम मैकेनिक्स के जनक व नोबेल पुरस्कार विजेता एर्विन श्रोडिंगर और परमाणु बम के जनक रॉबर्ट ओपेनहाइमर जैसे महान वैज्ञानिक किसी न किसी रुप में श्रीमद्भगवतगीता में छिपी वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि को स्वीकार कर चुके हैं। श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।” यानी जैसे धागे में मणियां (मोती) पिरोई होती हैं, वैसे ही यह संपूर्ण संसार मुझमें ही पिरोया हुआ है। डच दार्शनिक स्पिनोजा का दर्शन इससे मिलता-जुलता है और आइंस्टीन को इस दर्शन में प्रगाढ़ आस्था थी। एर्विन श्रोडिंगर ने अपनी पुस्तकों में वेदांत और गीता दर्शन के आलोक में तथ्यों को प्रस्तुत किया और क्वांटम फिजिक्स में ‘कण’ और ‘तरंग’ के द्वैत को सुलझाने के लिए उपनिषदों और गीता के अद्वैतवाद और चेतना के एकत्व संबंधी सिद्धांत का सहारा लिया।
ओपन हाइमर प्रथम परमाणु बम बनाने वाले वैज्ञानिक समूह के अग्रणी सदस्य थे और हिरोशिमा और नागासाकी में विध्वंस के साक्षी थे। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने श्रीमद्भगवतगीता पढ़ने के लिए कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में संस्कृत सीखी थी। श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद पढ़ने के बाद कहा, “भगवद्गीता… किसी भी ज्ञात भाषा में मौजूद सबसे सुंदर दार्शनिक गीत है।” परमाणु परीक्षण के बाद सहसा उनके मन में गीता का श्लोक “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो:…” कौंध गया था। उन्होंने मीडिया से कहा था – “हम जानते थे कि दुनिया अब वैसी नहीं रहेगी। वैसे में मुझे श्रीकृष्ण का वह प्रसंग स्मरण हो आया था; जिसमें वे अर्जुन को कर्तव्य निर्वहन के लिए समझाते हुए अपना विराट रूप दिखाते हैं और कहते हैं, ‘अब मैं मृत्यु (काल) बन गया हूँ….”
आधुनिक युग में श्रीमद्भगवतगीता के ज्ञान की विश्वव्यापी स्वीकार्यता को देखते हुए किसी को भी सहसा मन में सवाल होता है कि आखिर ऐसा क्यों? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका एक लाइन में उत्तर देना कदापि संभव नहीं। एक लाइन में तो इतना ही कहा जा सकता है कि श्रीमद्भगवतगीता जीवन का मैनुअल है। यह हमें सन्यासी बनकर एकांतवास में जाने को नहीं कहती, बल्कि संसार में रहकर, तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए शांति से जीने की कला सिखाती है। गीता कहती है, “योग: कर्मसु कौशलम्।” अर्थात हर कर्म को उत्कृष्टता से करो, और “…मा फलेषु कदाचन।” यानी फल की चिंता न करो, क्योंकि “हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ।“ ये हमारे अधीन नहीं है। ये बातें अशांत मन को सांत्वना प्रदान करती हैं और सही दिशा प्रदान करती हैं।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन की जैसी दशा थी, आज हम सबके मन में भी प्रकारांतर से वैसा ही द्वंद्व चल रहा होता है। क्यों? एक बड़ा कारण यह है कि शीतयुद्ध से लेकर एआई युग तक की सबसे बड़ी समस्या भय है। भविष्य को लेकर भय, असफलता का भय, हानि का भय, मृत्यु का भय आदि आदि। यही भय जब विकराल रुप धारण करता है तो मनुष्य मानसिक पीड़ाओं से ग्रसित होता है। व्यवहार रुप में हम सब देख भी रहे हैं कि आज दुनिया की बड़ी आबादी किसी न किसी रुप में मानसिक रोग से ग्रसित है। तनाव, चिंता, अवसाद, भ्रम आदि उसके रुप हैं। श्रीमद्भगवतगीता से हमें जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण मिलता है, साहस मिलता है। तब हम विकट परिस्थिति में टूटतें नहीं, बल्कि उठ खड़े होते हैं।
वैज्ञानिकों और भौतिकशास्त्रियों को श्रीमद्भगवतगीता का महत्व इसलिए भी समझ आने लगा है, क्योंकि इसमें ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं। जैसे, आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, यह केवल शरीर बदलती है। श्रीमद्भगवतगीता की यह बात विज्ञान के उस सिद्धांत से मेल खाती हुई है, जिसमें कहा गया है कि ऊर्जा न तो बनाई जा सकती है, न नष्ट की जा सकती है। इसी तरह, राजनीतिज्ञों और प्रबंधकों को विजय-सूत्र मिल जाते हैं। इन मायनों में यह ग्रंथ हमारे धर्मग्रंथों में एक अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरे के समान और उपनिषदों का सार है।
आज हम सब उसी श्रीमद्भगवतगीता की 5162वीं जयंती मना रहे हैं। यही वह दिन है, जब भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में युद्ध से पहले अर्जुन को गीता ज्ञान दिया था। परमहंस योगानंद ने ठीक ही कहा था – “गीता का ज्ञान हठधर्मियों के मनोरंजनके लिए, शुष्क बुद्धिजीवियों द्वारा इसके कथनों से मानसिक व्यायाम करने के लिए नहीं है। अपितु, यह बताने के लिए है कि संसार में रहते हुए और योग की चरणबद्ध विधियों का अभ्यास करके संतुलित जीवन कैसे जिया जाए।“ पर क्या केवल गीता-पाठ से बात बन जाएगी? बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती कहते थे – “पोथी पढ़ने से आदमी तोता होता है और सेवा करने से हनुमान। हनुमानजी केवल सेवक नहीं, ज्ञानी भी थे। उन्होंने अपने ज्ञान को सेवा का रूप दिया। फिर क्या हुआ? ‘सियाराममय सब जग जानी, करहुँ प्रणाम जोरी जुग पानी।“ तो आइए, हम सब भी अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों को भगवान के संदेशो के अनुरुप उचित दिशा प्रदान कर शाश्वत सुख, शान्ति और आनन्द की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

