भारतीय परंपरा में योग आत्मानुशासन और आत्मबोध की साधना के रूप में पल्लवित-पुष्पित होता रहा है। पर, उसे सीमित स्वरूप देकर आज दुनिया भर के जिम और स्टूडियो में एक ग्लैमरस वर्कआउट के तौर पर प्रस्तुत किया जाने लगा है। नतीजतन, षट्कर्म रूपी मानव शरीर के आंतरिक शोधन का मूल विज्ञान हाशिए पर जा चुका है। भारतीय यौगिक दर्शन में इसे ‘घटाकाश’ के अद्भुत रूपक से समझाया गया है। घटाकाश का अर्थ है कि घड़े के भीतर भी वही अनंत आकाश है, जो बाहर व्याप्त है। यहाँ घड़ा हमारा शरीर है और उसके भीतर का आकाश हमारी जीवात्मा। जब मिट्टी का यह घड़ा फूटता है, तो भीतर का सीमित आकाश बाहर के अनंत परमात्मा में विलीन हो जाता है।
योग का वास्तविक लक्ष्य इसी शरीर रूपी आवरण को इतना शुद्ध और पारदर्शी बनाना है कि भीतर और बाहर का अंतर ही समाप्त हो जाए। घेरण्ड संहिता में स्पष्ट कहा गया है कि जिस प्रकार कच्चे घड़े में पानी रखने पर वह नष्ट हो जाता है, वैसे ही अशुद्ध शरीर में किया गया योगाभ्यास व्यर्थ हो सकता है। घटशुद्धि यानी शरीर का शोधन ही वह प्रक्रिया है, जो इस ‘मिट्टी के पुतले’ को ‘कंचन काया’ में बदल देती है। इसे ही योगशास्त्र में षट्कर्म कहा गया है।
इसकी महत्ता को सिद्ध योगी चौरंगीनाथ के जीवन प्रसंग से बेहतर समझा जा सकता है। नाथपंथ की गुरु-शिष्य परंपरा में चौरंगीनाथ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। कथा के अनुसार, तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें योग साधना में सफलता नहीं मिल पा रही थी। चौरंगीनाथ ने अपने गुरु से अपनी व्यथा साझा की। गुरु ने पूछा, “क्या तुमने शरीर की शुद्धि के लिए षट्कर्म का अभ्यास किया था?” चौरंगीनाथ चौंक गए, क्योंकि तब तक उन्हें इसका बोध नहीं था। तब गुरु ने उन्हें महर्षि भृगु की कथा सुनाई, जिन्हें स्वयं दिव्य ऋषियों से इस विद्या को सीखना पड़ा था। ताकि उनकी साधना की बाधाएं दूर हो सकें। इसी प्रेरणा के बाद चौरंगीनाथ की साधना में वह छलांग लगी, जिसने उन्हें सिद्धि के शिखर पर पहुँचाया।
बीते दो दशकों में योग का वैश्वीकरण तो हुआ है, लेकिन इस प्रक्रिया में योग के कुछ गहरे और आधारभूत अंग पीछे छूट गए हैं। नई दिल्ली स्थित मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान के वरीय योग चिकित्सक डॉ विनय भारती को इस बात का मलाल है कि योग को लेकर भ्रांतियां बढ़ती ही जा रही हैं। नतीजतन, योग को वेट मैनेजमेंट या कमर दर्द दूर करने के टूल के रुप में देखा जाता है। वैसे, ये लाभ निश्चित रूप से मिलते हैं, लेकिन इन्हें ही योग का पूरा स्वरूप मान लेना बड़ी भूल है।
डॉ भारती दो दशक पुराने प्रसंग के आधार पर बताने की कोशिश करते हैं कि हम कहां से चले थे, कहां पहुंच गए और हमारा चिंतन कैसा होना चाहिए। मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान की नई बिल्डिंग के उद्घाटन के मौके पर दिल्ली में आयोजित समारोह के मुख्य अतिथि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और विशिष्ट अतिथि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. सीपी ठाकुर थे। डॉ. ठाकुर ने योग के चमत्कारी लाभों का जिक्र करते हुए कहा कि योग कीजिएगा तो सफेद बाल भी काले हो जाएंगे। लेकिन असली वैचारिक मोड़ तब आया जब अटल बिहारी वाजपेयी अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा, “यदि बाल काला करने के लिए योग करना है, तो योग मत करिए; इसके लिए बाजार में कई उत्पाद उपलब्ध हैं।“ प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य महज चुटीली टिप्पणी नहीं था, बल्कि योग को सीमित दायरे में बांधने की प्रवृत्ति के खिलाफ बड़ा संदेश था।
खैर, यदि शारीरिक स्वास्थ्य ही योग का लक्ष्य हो तो भी षट्कर्म बड़े महत्व का है। छह यौगिक क्रियाओं वाले इस यौगिक समूह को थोड़ा विस्तार से समझिए। धौति पट्कर्म की पहली क्रिया है, जिससे पाचन तंत्र को शुद्ध किया जाता है। आमाशय और अन्न नलिका की सफाई होती है। इससे कब्ज, अम्लता यानी एसिडिटी दूर होती है। इसे सामान्यत: कुंजल क्रिया के रुप में जाना जाता है। बस्ती क्रिया बड़ी आंत (मलाशय) की शुद्धि के लिए है। शंख प्रक्षालन इसकी प्रचलित विधि है। परमहंस् स्वामी निरंजनानंद सरस्वती इसे यौगिक एनिमा कहते हैं। इसी तरह वे नेति क्रिया को ईएनटी डाक्टर कहते है। क्यों? क्योंकि नेति क्रिया से नाक, कान और गले की सफाई हो जाती है और इनमें संबंधित बीमारियां दूर ही रहती हैं।
नौलि क्रिया एक उन्नत यौगिक प्रक्रिया है, जिसमें पेट की मांसपेशियों को विशेष तरीके से घुमाया जाता है। इससे पेट के अंगों की मालिश होता है और पाचन शक्ति बेहतर बनाता है। आंतरिक अंगों को मजबूती मिलती है। यह प्राण ऊर्जा को संतुलित करने में भी सहायक है। कपालभाति मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता और तनाव कम करने में सहायक है। साथ ही, फेफड़ों को मजबूत करता है और रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है। अंतिम है त्राटक क्रिया। इससे आंखों की रोशनी, एकाग्रता और मानसिक स्थिरता बढ़ती है। ध्यान की गहराई को बढ़ाने और मन को शांत करने में विशेष रूप से प्रभावी है।
आयुर्वेद के अनुसार शरीर में कफ, पित्त और वात का असंतुलन ही रोगों की जड़ है। १५वीं शताब्दी के योगी स्वामी स्वात्माराम ने ‘हठयोग प्रदीपिका’ में और महर्षि घेरंड ने ‘घेरंड संहिता’ में शोधन (सफाई) को योग का पहला अंग माना है। २०वीं सदी के मनीषी परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने सिद्ध किया कि षट्कर्म का प्रभाव केवल स्थूल अंगों तक सीमित नहीं है। यह हमारी इड़ा और पिंगला नाड़ियों को संतुलित कर सुषुम्ना को जागृत करता है, जो आध्यात्मिक उन्नति का द्वार है।
आधुनिक विज्ञान भी इन प्राचीन यौगिक विधियों के समक्ष नतमस्तक है। जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड डायग्नोस्टिक रिसर्च में प्रकाशित हालिया अध्ययन के मुताबिक, जल नेति और कपालभाति हार्ट रेट वेरिएबिलिटी में सुधार करते हैं। यह सीधे तौर पर हमारी वेगस नर्व को सक्रिय करने का प्रमाण है, जो तनाव मुक्ति और मानसिक शांति के लिए उत्तरदायी है। इस तरह, स्पष्ट है कि मानव शरीर रुपी प्रकृति की दी हुई इस अद्भुत सुपरमशीन की भी नियमित सर्विसिंग की जरूरत होती है। यदि कोई योग का समुचित लाभ लेना चाहता है, तो शुरुआत आसन से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि से करनी चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

