अद्वैत वेदांत और सनातन धर्म की अविरल परंपरा में ज्योतिर्मठ, श्रृंगेरी मठ, शारदा और गोवर्धन मठ आदि शंकराचार्य की अमर देन हैं और सनातन धर्म के हृदय-स्थल हैं। वहीं, इन पीठों पर आसीन शंकराचार्य उस प्राचीन ज्ञान परंपरा के संरक्षक हैं। इसलिए, चार पीठों और उनके शंकराचार्यों का बड़ा महत्व है। इनको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद धर्म की हानि के तौर पर देखा जाता है। भारतीय दर्शन प्रचार या बहस के लिए नहीं, बल्कि आचरण के लिए है। ज्ञान की सिद्धि अनुभव में निहित है और संतों में द्वैत भाव अंशमात्र रह जाए तो समय रहते समाधान भी जरूरी होता है।
आधुनिक युग के इतिहास में शंकराचार्य पद को लेकर विवाद होने लगे हैं। बात अदालत तक पहुंच चुकी है। किसी भी विवाद का समाधान शास्त्रानुकूल हो तो पद की पवित्रता और परंपरा अखंडता बनी रहती है। इसलिए कि शंकराचार्य का पद एक दिव्य दायित्व है, जो विवादों से परे ज्ञान के प्रसार और धर्म की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए होता है। इस आलोक में ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के मुद्दों पर उत्पन्न विवाद चिंताजनक है। यह पीठ कभी तो पीठाधीश्वर यानी शंकराचार्य पद धारण के सवाल पर चर्चा में होता है तो कभी पीठाधीश्वर के विभिन्न मुद्दों पर स्टैंड कारण चर्चा होती है। हाल ही प्रयागराज के माघ मेले में उनके शाही स्नान को लेकर विवाद हुआ था।
आदि शंकराचार्य ने लगभग ८वीं शताब्दी में सभी चार पीठों की स्थापना सनातन धर्म की रक्षा, अद्वैतवाद के प्रचार और भारतीय संन्यास परंपरा को नवजीवन प्रदान करने के लिए की थी। इस महायज्ञ की निरंतरता के लिए शंकराचार्य पद का सृजन किया था। मुंडक उपनिषद में एक लोकप्रिय मंत्र है – सत्यमेव जयते नानृतं। सत्येन पन्था विततो देवयानः। अर्थात केवल सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। ईश्वर की ओर जाने का मार्ग सत्य में से होकर गुजरता है। स्वामी विवेकानंद ने इस मंत्र की व्याख्या कुछ इस तरह की है – “पवित्र और सर्वोपरि निष्ठावान बनो; क्षण भर के लिए भी प्रभु में अपनी आस्था मत खोओ; और तुम्हें प्रकाश की प्राप्ति होगी। जो कुछ सत्य है, वही सर्वदा बना रहेगा; और जो सत्य नहीं है, उसे कोई नहीं बचा सकेगा। दूसरे लोग चाहे कुछ भी क्यों न सोचें या करें; तुम कभी अपनी पवित्रता, नैतिकता तथा भगवत्प्रीति की ध्वजा को मत झुकाना।“
शंकराचार्य ऐसे ही मूल्यों की स्थापना करेंगे, शायद कुछ ऐसी ही कल्पना की गई होगी। तभी इस पद के लिए योग्यता का मापदंड आध्यात्मिक परिपक्वता, त्याग और ज्ञान की गहराई को बनाया गया, न कि सांसारिक महत्वाकांक्षा या राजनीतिक प्रभाव। उस काल में इस पद को लेकर या इस पद पर आसीन संत के कारण कोई विवाद होगा, इसकी कल्पना तक नहीं की गई थी। आदि शंकराचार्य के बाद उनके शिष्यों और उत्तराधिकारियों ने अद्वैत वेदांत परंपरा को मजबूत किया, जिससे संस्थागत संरचनाओं का नवीनीकरण होता गया। जहां तक ज्योतिर्मठ का सवाल है तो सन् 1941-1953 तक स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के शंकराचार्य रहते सब कुछ ठीक चलता रहा। उनकी समाधि के बाद उत्तराधिकार को लेकर दो गुट बन गए। एक पक्ष ने वसीयत के आधार पर स्वामी शांतानंद सरस्वती को शंकराचार्य बनाया, जबकि दूसरे ने स्वामी कृष्णबोध आश्रम को। उसके बाद तो इस महत्वपूर्ण पीठ के पीठाधीश्वर को लेकर विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। बल्कि विवाद का दायरा विस्तार पाता जा रहा है।
ज्योतिर्मठ का सूत्र वाक्य “अयमात्मा ब्रह्म” आत्मा और ब्रह्म के बीच अभेद की घोषणा यह अद्वैत वेदांत का सार है और आदि शंकराचार्य की साधना तथा शिक्षण का केंद्रबिंदु भी। इस मठ का उद्देश्य बाहरी कर्मकांडों का विस्तार करना नहीं, बल्कि साधकों की चेतना का विस्तार करना है। “अयमात्मा ब्रह्म” से अभिप्राय है कि जिसे व्यक्ति “मैं” कहता है, वही संपूर्ण अस्तित्व का मूल है। दूसरे शब्दों में अद्वैत वेदांत का मूल प्रश्न है – मैं कौन हूँ? और “अयमात्मा ब्रह्म” इसका उत्तर है। यानी, आत्मा और ब्रह्म दो नहीं हैं। भेद केवल अज्ञान से प्रतीत होता है।
वैसे तो सभी मठो की अपनी विशिष्टता है। पर, ज्योतिर्मठ खास कई कारणों से है। इस पीठ के प्रथम आचार्य तोटकाचार्य गिरि थे। कहा जाता है कि वे इस पद के काबिल नहीं थे। उन्हें आदि शंकराचार्य के अन्य शिष्यों की तुलना में कम बौद्धिक माना जाता था। कारण यह था कि उनका अधिकांश समय आदि शंकराचार्य की व्यक्तिगत सेवा और आश्रम के कार्यों में व्यतीत होता था। लेकिन जहां दैवीय ऊर्जा होती है, वहाँ का संपूर्ण वातावरण ऊर्जायुक्त हो ही जाता है। ऐसे में एक आत्मज्ञानी संत के सानिध्य में रहने वाला व्यक्ति, चाहे उसका गुण-कर्म जैसा भी रहा हो, वह अज्ञानी कैसे रह सकता था। जब मठों के लिए महाधीशों के चयन की बारी आई और आदि शंकराचार्य की दृष्टि तोटकाचार्य पर पड़ी तो मानों शक्तिपात हो गया। फिर तो तोटकाचार्य में ज्ञान का ऐसा प्रस्फुटन हुआ कि वे दिव्य छंदों में रचना करने लगे। ‘तोटक’ छंद में गुरु की स्तुति की और तोटकाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे।
ज्योतिर्मठ को दशनामी संन्यासियों में गिरि, पार्वत और सागर नामक शाखाओं से जोड़ा गया। इसने हिमालय क्षेत्र में संन्यासियों को आश्रय, शिक्षा और साधना का आधार दिया। यह पीठ नागा साधुओं सहित विभिन्न संन्यासी परंपराओं के लिए प्रशिक्षण एवं दीक्षा का केंद्र बना। आदि शंकराचार्य ने ज्योतिषमठ के लिए उत्तर दिशा का चुनाव किया तो जाहिर है कि उसके मायने गहरे होंगे। पहली बात तो यह कि ध्रुवतारा उत्तर दिशा में है। आकाश में अन्य नक्षत्र घूमते प्रतीत होते हैं, पर ध्रुव स्थिर रहता है। यानी वह स्थिरता का प्रतीक है। वैदिक ग्रंथों में उत्तर को देवताओं की दिशा माना गया है। इसलिए, उत्तर में अवस्थित हिमालय वैदिक काल से ही ज्ञान, तपस्या और आत्मानुसंधान का केंद्र रहा है। ऋषियों के आश्रम, वनप्रस्थ और संन्यास परंपरा का स्वाभाविक गंतव्य उत्तर ही माना गया। मतलब यह कि भारत के ब्रह्म स्थान की उत्तर दिशा अंतर्यात्रा के लिए माकूल है। ऐसे महान पीठ और उसके शंकराचार्य पद की मर्यादा हर हाल में शास्त्रानुकूल रहनी चाहिए। धर्माकाश के दैदीप्यमान केंद्र और ज्ञान-सिंहासन की शुचिता पर आंच आना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

