भक्ति की पावन गंगा जब हृदय की कंदराओं से फूटती है तो वह ऊंच-नीच, जाति-कुल और शास्त्र-ज्ञान की समस्त सीमाओं को लांघकर सीधे परम तत्व में विलीन हो जाती है। शबरी माता का जीवन इसी आध्यात्मिक लोकतंत्र का वह जीवंत दस्तावेज है, जो सदियों से मनुष्यता को सिखा रहा है कि ईश्वर किसी मंदिर की चारदीवारी या जटिल कर्मकांडों में नहीं, बल्कि भक्त के निश्छल अनुराग और अटूट प्रतीक्षा में निवास करता है। आज के इस भागदौड़ भरे और दिखावे वाली दुनिया में शबरी जयंती केवल एक पौराणिक कथा का स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि यह अंतर्मन की शुचिता और सरल विश्वास को पुनः जागृत करने का एक वैश्विक निमंत्रण है।
शबरी माता का व्यक्तित्व साधना की उस पराकाष्ठा का प्रतीक है, जहाँ सेवा ही एकमात्र शास्त्र बन जाती है और गुरु की वाणी ही जीवन का परम सत्य। उन्होंने जिस प्रकार समाज की वर्जनाओं को त्यागकर करुणा और अहिंसा का मार्ग चुना, वह आज के समय में विवेकपूर्ण विद्रोह की सबसे सुंदर मिसाल है। ऋष्यमूक पर्वत के जंगलों में मार्ग बुहारते और अपने अराध्य श्रीराम की प्रतीक्षा करते हुए शबरी ने यह सिद्ध कर दिया कि भक्ति कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक मौन तपस्या है। उनकी इस निष्ठा ने सिद्ध किया कि श्रद्धा जब गहरी होती है, तो साक्षात ब्रह्म को भी एक निर्धन वनवासी की कुटिया तक चलकर आना पड़ता है।
आज के संदर्भ में ‘जहाँ भाव है, वहाँ भगवान है’ का यह सूत्र सामाजिक समरसता और मानवीय गरिमा का सबसे बड़ा मंत्र है। जब श्रीराम शबरी के जूठे बेर स्वीकार करते हैं, तो वे वास्तव में समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को अपनी गोद में बिठाते हैं और सदियों पुरानी रूढ़ियों को प्रेम के एक झटके से ढहा देते हैं। इस प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि बाह्य शुद्धता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हृदय की कोमलता है। आज जब दुनिया खंडित पहचानों और वैमनस्यता में उलझी है, तब शबरी की दृष्टि हमें उदारता और समभाव का वह प्रकाश दिखाती है, जिसमें कोई पराया नहीं, बल्कि हर जीव ईश्वर का ही अंश नजर आता है।
शबरी जयंती का संदेश हमें अपनी आंतरिक जड़ता को तोड़ने और प्रेम की सादगी को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। यह पर्व याद दिलाता है कि भक्ति का अर्थ केवल मंत्रोच्चार नहीं, बल्कि मानवता की निस्वार्थ सेवा और प्रत्येक श्वास में परमात्मा की प्रतीक्षा है। यदि हमारे मन में शबरी जैसी धैर्यवान प्रतीक्षा और निष्कपट भाव हो, तो हमारे जीवन की सामान्य कुटिया भी वैकुंठ बन सकती है। शबरी का जीवन यह घोषणा करता है कि जिस हृदय में करुणा का वास है, वहीं श्रीराम का वास है।
वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में शबरी का प्रसंग ऐतिहासिक-कथात्मक नहीं, बल्कि धर्म-दर्शन का उद्घोष है। भील समुदाय की शबर जाति में जन्मी श्रमणा (शबरी) का बाल्यकाल से वैराग्य की ओर झुकाव, विवाह-भोज हेतु पशु-पक्षियों की बलि का विरोध, और फिर वन की ओर प्रस्थान कर जाना अहिंसा और करुणा के वैदिक मूल्यों की व्यावहारिक अभिव्यक्ति हैं।
प्रतिवर्ष फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष सप्तमी तिथि पर शबरी जयन्ती मनायी जाती है। इस लिहाज से इस सात यह तिथि 8 फरवरी को पड़ती है। गुरुनिष्ठा की प्रतिमूर्ति भक्तशिरोमणि शबरी माता की स्मृतियों को सादर नमन।

