आप सबको मॉ सरस्वती की आराधना का महापर्व और वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं। शास्त्रों के मुताबिक, आज के दिन ही ब्रह्मा जी के आह्वान पर मॉ सरस्वती वीणा बजाती हुई इस धरा पर प्रकट हुई थीं। वीणा की ध्वनि के स्पंदन से मूक ब्रह्मांड झंकृत हो गया था और वाणी मिल गई थी। इसलिए माता को वागेश्वरी भी कहा गया है। आज हम चर्चा करेंगे उनके बीज मंत्रों पर, जो सर्वशक्तिमान है।
जैसे एक विशाल वटवृक्ष का पूरा अस्तित्व एक सूक्ष्म बीज में समाहित होता है, वैसे ही माँ सरस्वती की संपूर्ण शक्तियाँ एकाक्षर बीज मंत्र ‘ऐं’ में होता हैं। यानी हम विस्तृत बीज मंत्र जैसे ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वत्यै नमः का जप न भी करें तो फल उतना ही होगा। हम जब ‘ऐं’ का जप करते हैं, तो सीधे ऊर्जा के स्रोत को स्पंदित करते हैं। ‘ऐं’ का जप करते समय जब हम अंतिम अनुस्वार को लंबा खींचते हैं, तो उससे जो ध्वनि पैदा होती है, वह मस्तिष्क की कोशिकाओं को पुनर्जीवित करती है। इतना ही नहीं, केवल एक शब्द होने के कारण यह हमारे प्राण के साथ आसानी से जुड़ जाता है।
इस मंत्र को श्वास छोड़ते हुए ‘ऐ’ से शुरू करना चाहिए और ‘म्म्म्’ (अनुस्वार) पर खत्म करना चाहिए। ध्वनि का 20 फीसदी ‘ऐ’ और 80 फीसदी अंत का गुंजन होना चाहिए। इस मंत्र का उच्चारण करते समय अपना ध्यान ‘आज्ञा चक्र’ (दोनों भौंहों के बीच) या ‘विशुद्धि चक्र’ (कंठ) पर रखना श्रेयस्कर होता है। साथ ही कल्पना करना चाहिए कि इस ध्वनि के साथ अज्ञान का अंधकार मिट रहा है और भीतर प्रकाश फैल रहा है। मंत्र शास्त्र के अनुसार, ‘ऐं’ तीन तत्वों से मिलकर बना है। ‘अ’ सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा और चैतन्य का प्रतीक है। ‘इ’ शक्ति, गति और बुद्धि का प्रतीक है और ‘म’ (अनुस्वार) पूर्णता या मोक्ष का प्रतीक है।
यदि छात्र पढ़ाई शुरू करने से पहले केवल 11 बार ‘ऐं’ का गहरे गुंजन के साथ उच्चारण करें, तो यह एकाग्रता बढ़ाने के लिए किसी भी लंबी स्तुति से अधिक प्रभावी सिद्ध होता है। हम सब चलते-फिरते या काम करते समय ‘ऐं’ का मानसिक स्मरण करें तो यह योग की प्रभावशाली विधि ‘अजपा-जप’ की श्रेणी में आ जाता है, जो निरंतर सुरक्षा कवच का कार्य करता है। तंत्र शास्त्र के मुताबिक, “बीजं सर्वशक्तिमयं” यानी बीज ही सर्वशक्तिमान है। इसलिए, यदि हमारे पास समय की कमी है या गहरी साधना करना चाहते हैं, तो केवल ‘ऐं’ का जप पर्याप्त और शास्त्रसम्मत है।
मंत्र शास्त्र और आध्यात्मिक विज्ञान में स्फटिक की माला और मॉ सरस्वती के बीज मंत्र ‘ऐं’ के बीच गहरा संबंध है। माँ सरस्वती स्वयं शुभ्रता (सफेद रंग) और शीतलता की अधिष्ठात्री हैं, और स्फटिक इन्हीं गुणों को भौतिक रूप में धारण करता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि स्फटिक एक पीजोइलेक्ट्रिक पदार्थ है। इसमें ऊर्जा को संचित करने और उसे प्रवाहित करने की अद्भुत क्षमता होती है। जब हम ‘ऐं’ मंत्र का जप करते हैं, तो उससे उत्पन्न होने वाली ध्वनि ऊर्जा स्फटिक के मनकों में ‘स्टोर’ हो जाती है। धीरे-धीरे वह माला स्वयं सिद्ध हो जाती है, और उसे धारण करने या हाथ में लेने मात्र से मन शांत होने लगता है। और हम सब जानते हैं कि मॉ सरस्वती का संबंध ‘बुद्धि’ से है, और बुद्धि तभी सही निर्णय लेती है, जब मस्तिष्क ठंडा और स्थिर होता है। तब मंत्र के प्रभाव से हमारे मस्तिष्क की जो ‘मेधा नाड़ी’ होती है, जिसे पीनियल ग्लैंड और योग में आज्ञा-चक्र कहते हैं, वह सक्रिय होती है।
केनोपनिषद में मॉ सरस्वती को ‘उमा’ बताया गया है। कथा है कि जब देवताओं (अग्नि, वायु, इंद्र) को अपनी शक्ति पर अहंकार हो गया, तब उनके सामने एक ‘यक्ष’ प्रकट हुआ। कोई भी देवता उस यक्ष को समझ नहीं पाया। अंत में, इंद्र के सामने उमा के रुप में एक अत्यंत सुंदर स्त्री प्रकट हुईं थीं। उन्होंने इंद्र भगवान को बताया कि वह यक्ष वास्तव में ‘ब्रह्म’ है। यहाँ उमा ‘ब्रह्मविद्या’ के रूप में प्रकट होती हैं, जो देवताओं के अहंकार को नष्ट कर उन्हें परम ज्ञान देती हैं। इसलिए कहा गया है कि बिना विद्या (सरस्वती) के, शक्ति और क्रिया व्यर्थ हैं।

