भारत का अभ्युदय एक आध्यात्मिक क्रांति है। यह कभी कोई साधारण भूखंड नहीं रहा, बल्कि साधना की इस भूमि पर ऋषि-संतों की परंपरा फली-फूली और यहीं से वैदिक वाणी प्रवाहित हुई। इस देश ने सदैव आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान और अंतर्यात्रा को भौतिक प्रगति से ऊपर रखा। इसी वजह से यह देश विश्व गुरु कहलाया। जब दुनिया के अन्य भू-खंडों पर साम्राज्यवादी विस्तार की भावना प्रबल थी, तब भी भारत की धरती पर विश्व बंधुत्व की भावना घनीभूत की जाती रही। यहां के ऋषि-मुनि जगत के कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहे और आध्यात्मिक उत्थान के जरिए मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए सदैव कार्य करते रहे। इसलिए, सन् 1893 के शिकागो विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने उद्घोष किया कि भारत की सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव विश्व को शांति दे सकता है तो दुनिया भर के लोगों ने इसे गंभीरता से लिया था।
इस लेख में स्वामी जी के उस उद्घोष की आधुनिक युग में प्रासंगिकता और भारत की दिशा-दशा पर चर्चा होगी। पर, पहले वैदिक दर्शन और भारत के ध्येय पर चर्चा समीचीन होगी, जो स्वामी जी की उद्घोषणा का आधार था। हम जानते हैं कि वैदिक दर्शन का मूल आधार ही परोपकार है और भारत का ध्येय वाक्य है – वसुधैव कुटुम्बकम्। हमारे लिए पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है। इसलिए हमने विश्व को परस्पर सम्मान और सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया। ईशावाश्योपनिषद के मंत्र “ईशा वास्यमिदं सर्वं” के द्वारा हमने दुनिया को बताया कि यह जगत ईश्वर से व्याप्त है। ऐसे में द्वैत भाव केवल अज्ञान ही हो सकता है। इसलिए हमने दुनिया को अद्वैत का पाठ पढ़ाया। त्याग और भोग के बीच संतुलन बनाए रखृने का संदेश दिया, जो वैदिक दर्शन का मूल सिद्धांत भी है। तभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था – “यदि सभी उपनिषद् और ग्रंथ नष्ट हो जाएं और केवल यह एक मंत्र बच जाए, तो भी हिंदू धर्म जीवित और भारत शक्तिशाली रह सकता है।“
सच है कि भारतीयों ने कभी अपनी भूमि को जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं माना, बल्कि “माता” कहकर पुकारा और उसे ‘जीवंत चेतना’ माना। इस संदर्भ में अथर्ववेद में एक मंत्र है – “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:।” यानी यह भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। हमने सदैव साबित किया कि भारत की शक्ति और समृद्धि ‘स्व’ के लिए नहीं, बल्कि ‘सर्व’ के लिए होती है। भारत ने ‘अद्वैत’ का सिद्धांत देकर वैज्ञानिक रुप से साबित किया कि सभी में एक ही चेतना व्याप्त है। बावजूद, यदि अशांति है तो इसकी वजह कुछ और नहीं, बल्कि द्वैत भाव यानी मैं और तुम, मेरा और तेरा वाली भावना है। यह भावना जब तक रहेगी, अशांति बनी रहेगी।
फिर भी हमने सदैव सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः का भाव रखा। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हम यही प्रार्थना करते रहे कि भारत ही नहीं, दुनिया के सभी व्यक्ति सुखी और निरोगी हों। आपने ध्यान दिया होगा कि अपने देश में धार्मिक अनुष्ठानों के अंत में शांति पाठ किया जाता है। पंडित-पुरोहित यजुर्वेद का मंत्र पढते-पढ़ाते हैं – “ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति:, पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।” इस मंत्र में आकाश, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल और औषधियाँ, सबकी शांति और संतुलन की कामना की गई है। इसलिए स्वामी विवेकानंद ने एक सौ साल पहले भारत की जो महता बताई थी, वह आज भी बनी हुई है।
सच तो यह है कि अपनी वैदिक शिक्षाओं को युगानुकूल बनाने के लिए हमारे संत-महात्मा और योगी सतत् प्रयत्नशील रहे हैं। परिणामस्वरुप, वैदिक शिक्षाएं आधुनिक युग के लिहाज से ढल पाईं और उनका फलक विस्तार हुआ। पमहंस योगानंद, प्रभुपाद स्वामी, श्रीअरविंदो, महर्षि रमण, स्वामी शिवानंद सरस्वती, मा आनंदमयी, महर्षि महेश योगी, परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती, बीकेएस आय्यंगार आदि ने अपने-अपने हिस्से का काम करके जगत का बड़ा कल्याण किया। श्रीअरविंदो के इंटीग्रल योग ने आध्यात्मिकता को जीवन में उतारने का मार्ग दिखाया, जो भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन के जरिए जीवन में सुख-शांति लाता है। इन संतों-योगियों के उत्तराधिकारी आज भी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
आधुनिक विज्ञान की क्वांटम थ्योरी हो या हमारे उपनिषदों का ‘वसुधैव कुटुंबकम’, दोनों ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि हम ऊर्जा के स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जिस तरह तालाब में गिरा एक पत्थर पूरे पानी में तरंगें पैदा करता है, उसी तरह एक व्यक्ति की चेतना में आया सकारात्मक बदलाव सामूहिक चेतना को ऊपर उठाता है। जब हम अपने क्रोध को करुणा में बदलते हैं, तो अनजाने में दुनिया में हिंसा के स्तर को थोड़ा कम कर देते हैं। इसलिए यज्ञ, याग, योग और अच्छे विचार, अच्छी आदतों से खुद को शांति मिलती है और आसपास का माहौल भी खुशनुमा बन जाता है। आधुनिक विज्ञान के मुताबिक, यौगिक क्रियाओं से हमारे शरीर में ऑक्सीटोसिन (लव हार्मोन), सेरोटोनिन (मूड स्टेबलाइजर) और डोपामाइन (मोटिवेशन इंजन) के रुप में खुशी के जो तीन सिपाही हैं, उनका प्रबंधन हो जाता है।
भारत आध्यात्मिक रुप से सशक्त और शक्तिशाली बने रहकर दुनिया को शांति और एकता का संदेश देता रहे, इसके लिए नई-नई पीढ़ियों का भी तदनुरुप शिक्षण-प्रशिक्षण जरुरी है। पतंजलि योगसूत्र हमें बताता है कि शांति कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि मन की एक अवस्था है। जब हम उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं, तो हम स्वंय के साथ-साथ समाज के एक हिस्से को भी बेहतर बना रहे होते हैं। बदलाव की यह यात्रा किसी बड़े आंदोलन से नहीं, बल्कि एक मुस्कान और तीस मिनट के योग से शुरू होती है। याद रहे कि हम तालाब में फेंके गए उस पत्थर के समान हैं, जिसकी लहरों से पूरे तालाब में हलचल होती है।
स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व भारतीय गणतंत्र की आत्मा है। जब हम खुद को इसके अनुरुप संवारते हैं, तो देश संवरता है और उसका गहरा छाप पृथ्वी के समस्त भू-भाग पर दिखता है। भारत का अभ्युदय मैं कौन हूँ से शुरू होकर हम कौन हैं तक की यात्रा की पूर्णता है। यही है आत्मिक स्वराज, जिसे हमने सदैव सर्वोपरि रखा और नई-नई पीढियों को भी इसी विरासत को आगे ले जाना है। इसी कामना के साथ गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

