महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि इसमें मानसिक उद्वेगों और बिखरते रिश्तों को संभालने का एक गहरा मनोवैज्ञानिक सूत्र अंतर्निहित है। पर, हम सब इस महान अवसर को सजगता के अभाव में यूं ही हाथों से जाने देते हैं। शिवरात्रि वाली सुबह से लेकर रात तक हर तरफ ‘हर-हर महादेव’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ के उद्घोष से आकाश गुंजायमान होता है। भव्य शिव बारात के दौरान देवों से लेकर गणों तक की जीवंत झांकियों के साथ शंखों की ध्वनि और डमरू की थाप पर झूमते भक्तों के कारण अद्भुत उत्सवी माहौल बनता है। पर, हम इस शिवमय वातावरण में अंतर्यात्रा का लाभ लेने के बदले बहिर्यात्रा करते हुए समय व्यतीत कर देते हैं।
“यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे” सूत्र के रुप में श्वेताश्वतर उपनिषद और कुलार्णव तंत्र जैसे ग्रंथों से निकले इस विचार का स्पष्ट संदेश है कि जो कुछ इस विशाल ब्रह्मांड में व्याप्त है, वह सब सूक्ष्म रूप में हमारे शरीर के भीतर भी मौजूद है। जैसे एक छोटे से बीज के भीतर विशाल वृक्ष की पूरी संभावना छिपी होती है, वैसे ही आत्मा के भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड का सत्य समाहित है। यह केवल एक आध्यात्मिक दर्शन नहीं, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्यों से भी प्रमाणित है। ब्रह्मांड की विशाल आकाशगंगाओं का जाल और हमारे मस्तिष्क के भीतर न्यूरॉन्स के जटिल ताने-बाने की समानता इस बात का द्योतक है।
इस लिहाज से जब हम महाशिवरात्रि के मौके पर शिव-पार्वती विवाह के लिए शिव जी की बारात निकालते हैं तो योगबल से हमारे भीतर भी “शिव-शक्ति” का मिलन होना चाहिए। कथा तो हम सब जानते ही हैं। सती ने देह त्यागा तो शिव जी गहरे वैराग्य और समाधि में चले गए थे। जब सती का पुनर्जन्म पार्वती के रुप में हुआ, तो उन्होंने शिव जी को पाने के लिए कठोर तप किया। इससे भोले बाबा प्रसन्न हो गए और विवाह के लिए बारात लेकर निकल पड़े।
इसे आध्यात्मिक प्रकाश की प्राप्ति को दो सरल रूपों में समझा जा सकता है। पार्वती जी का तप इस बात का द्योतक है कि पहले रूप में ऊर्जा जागृत होकर ऊपर की ओर बढ़ती है और शिखर पर स्थित ब्रह्मांडीय चेतना यानी शिव से एकाकार हो जाती है। यह कुंडलिनी योग का मार्ग है। शिव जी की बारात दूसरा रूप है, जो चेतना का शक्ति की ओर मुड़ने की प्रक्रिया है। यहाँ ‘रात्रि’ का अर्थ बाहरी जगत के प्रति पूर्ण विस्मृति है। जब समय और स्थान का बोध मिट जाता है, तब केवल शुद्ध आत्मा शेष रहती है। यह गहन शांति ही वह अंधेरी रात है, जिसके ठीक बाद ज्ञान का सूर्योदय होता है। अतः शिवरात्रि उस दहलीज का नाम है, जहाँ पहुँचकर साधक परम प्रकाश के अनुभव के लिए तैयार होता है।
इस यात्रा में शिव और उनकी विचित्र बारात हमारे आंतरिक जगत का सटीक प्रतिबिंब है। शिव की बारात में शामिल विकृत रूप वाले भूत-प्रेत और राक्षस वास्तव में हमारे अपने डर, क्रोध, वासना और पशुवत प्रवृत्तियाँ हैं, जिन्हें हम साधना के पथ पर अपने साथ लेकर चलते हैं। अक्सर साधक इन प्रवृत्तियों से घबराकर पीछे हट जाते हैं या उन्हें दबाने की कोशिश करते हैं। ठीक उसी तरह जैसे हिमालय पुत्री की शादी के मौके पर शिव जी का भयानक रूप को देखकर परिस्थिति बनी थी। पर जब शिव का पार्वती यानी उच्चतर ऊर्जा से मिलन होता है, तो वही डरावने राक्षस दिव्य सेवकों में बदल जाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि आध्यात्मिक परिपक्वता आने पर कुछ भी नष्ट नहीं होता, बल्कि सब कुछ रूपांतरित हो जाता है। डरावने राक्षस भी दिव्य सेवकों में बदल जाते हैं। इसका अर्थ है कि योग के प्रभाव से हमारी निम्नतर प्रवृत्तियाँ ही उच्च अंतर्ज्ञान और आत्मिक आभूषण बन जाती हैं।
यदि शिव-पार्वती की कथा के श्रवण तक ही सीमित न रह जाएं और उसके आध्यात्मिक लाभ लेने का प्रयास करें तो महर्षि पतंजलि के योगसूत्र “योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:” को साकार कर दे सकते हैं। यानी, मन की सभी गतिविधियां, विचार और भावनाएं पूर्णतः शांत हो जाएंगी। चित्त अपने मूल शुद्ध, निष्कलंक, निर्विकल्प स्वरूप में स्थित हो जाएगा। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि गहरे ध्यान में हमारा मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र एक अद्भुत संतुलन में आ जाते हैं। अर्धनारीश्वर का स्वरूप इसी संतुलन का प्रतीक है, जो बताता है कि पूर्णता के लिए विचार और भाव का एक होना अनिवार्य है। इस लिहाज से महाशिवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और अनुशासन का एक ऐसा उत्सव है, जो आज की युवा पीढ़ी को भीतर की अनंत ऊर्जा से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है।
अब कहा जा सकता है कि साधना के लिए शिवरात्रि यानी अमावस्या की पूर्व रात्रि ही क्यों? दरअसल, शिवरात्रि के समय मन का कारक चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल सबसे कम होता है। इससे मन की अस्थिरता कम होती है और शरीर की ऊर्जा को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित करना सरल हो जाता है। हमारे शरीर में नाड़ियां तो बहुत हैं। पर, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के रुप में तीन नाड़ियां प्रमुख हैं। इड़ा नाड़ी और चंद्रमा के बीच गहरा अंतर्संबंध है। पिंगला नाड़ी का संबंध सूर्य से है। इड़ा और पिंगला नाड़ियों के बीच संतुलन साधकर ही हम उस ‘सोम’ यानी अमृत तत्व को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, जो मानसिक शांति का आधार है। सोमनाथ मंदिर इसी आंतरिक संतुलन और मानसिक शांति की प्राप्ति का स्थूल केंद्र माना जाता है।
वैदिक शास्त्र और आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित है कि मंत्र प्राणायाम साधना को पूर्णता प्रदान करते हैं। ‘ॐ नमः शिवाय’ भगवान शिव का मंत्र है। ॐ कवच है, जो हर तरह के खतरे से रक्षा करता है। ‘न’ पृथ्वी और ब्रह्मा का; ‘म’ जल और विष्णु का; ‘शि’ अग्नि और रुद्र का; ‘व’ वायु और महेश्वर का; ‘य’ आकाश और सदाशिव और जीव का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए, मानसिक तनाव तथा संबंधों में विखराव के दो-चार हो रही युवापीढ़ी सुखासन में बैठकर केवल नाड़ी शोधन प्राणायाम और “’ॐ नमः शिवाय” मंत्र के जप को ही अपनी जीवन-पद्धति का हिस्सा बना ले, तो आंतरिक शिव-शक्ति का मिलन हो न हो, पर मानसिक और भावनात्मक तल पर बड़ा बदलाव होगा, जो तात्कालिक समस्याओं के समाधान में उत्प्रेरक की भूमिका निभाएगा। इसलिए बाह्य महाशिवरात्रि के साथ ही आंतरिक रूपांतरण का उत्सव भी मनाइए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

