भारतीय अध्यात्म की समृद्ध परंपरा में ऐसे ग्रंथ हैं, जिन्हें मनुष्य के भीतर छिपे रहस्यों की कुंजी कहा जाना चाहिए। मार्कंडेय पुराण का श्रीदुर्गासप्तशती उन्हीं में एक प्रमुख ग्रंथ है। अक्सर लोग इसमें वर्णित कथा को केवल देवी और असुरों के युद्ध की पौराणिक या ऐतिहासिक कथा मान लेते हैं। लेकिन गहराई से पड़ताल करें, तो पता चलता है कि यह मानव चेतना के तेरह चरणों का ब्रह्मांडीय आध्यात्मिक विज्ञान है। इसमें वर्णित सात सौ श्लोक असल में हमारे मन की परतों को खोलते हुए उसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ने का काम करते हैं। इस लिहाज से देवी और असुरों के बीच होने वाले युद्ध कोई बाहरी घटनाएं नहीं हैं, बल्कि हमारे भीतर ही सद्गुणों और दुर्गुणों के बीच निरंतर चलने वाला संघर्ष है। श्रीदुर्गासप्तशती से हमें प्रेरणा और युक्ति मिलती है कि इस मानसिक अराजकता को किस तरह दूर किया जाए कि जीवन आनंदमय हो जाए।
श्रीदुर्गासप्तशती के तेरह अध्यायों या चरणों को आध्यात्मिक दृष्टि से तीन व्यापक खंडों में समझा जा सकता है। इन तीन खंडों में श्रीदुर्गासप्तशती के तीन चरित्र हमारी चेतना की विकास यात्रा के तीन पड़ाव हैं। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक सफर है, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। इस यात्रा का पहला पड़ाव हमारी चेतना की जड़ता से मुक्ति का है। मधु और कैटभ वे प्रवृत्तियां हैं, जो गहरी नींद और प्रमाद से पैदा होती हैं। आधुनिक विज्ञान इसे ‘डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क’ कहता है। यह मस्तिष्क सुप्त अवस्था होती है और इस अवस्था में हमारा मन बिना किसी उद्देश्य के भटकते रहता है। महाकाली का प्रकट होना वास्तव में हमारी चेतना का प्रारंभिक जागरण है। यह उस तमस को समूल नष्ट करने की प्रक्रिया है, जो हमें आत्म-बोध से दूर रखती है।
दूसरे पड़ाव या अध्याय में संघर्ष थोड़ा और गहरा होता है। तब हमारा सामना महिषासुर से होता है। महिषासुर हमारे भीतर के उस अहं यानी ईगो का प्रतीक है, जो हर क्षण अपना रूप बदलता रहता है। महान मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ने इसे ‘शैडो’ कहा और फ्रायड ने ‘इड’ का नाम दिया। शैडो व्यक्तित्व का वह अंधकारमय हिस्सा है, जिसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते और समाज से छिपाकर रखते हैं। इड मनुष्य की उन आदिम और दमित इच्छाओं के भंडार को कहा गया है, जो तत्काल संतुष्टि चाहती हैं। पर भारतीय योग-दर्शन इस पूरे प्रश्न को एक अलग दार्शनिक नजरिए से देखता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, मानव दुःख का मूल कारण अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक पाँच क्लेश हैं। इनमें ‘अस्मिता’ का अर्थ है अहंभाव, अर्थात् वह मानसिक भ्रम, जिसमें मनुष्य स्वयं को शरीर, मन और इंद्रियों के साथ पूर्णतः अभिन्न मान लेता है। योग-दर्शन कहता है कि जब मनुष्य चित्त की बुद्धि और आत्मा का भेद भूल जाता है, तब ‘मैं’ का सीमित बोध उत्पन्न होता है और इसी वजह से अनेक प्रकार के मानसिक बंधनों का जन्म होता है। देवी द्वारा इसका वध करना इस बात का प्रतीक है कि जब हम अपने अहंकार को पहचान कर उसे साक्षी भाव से देखने लगते हैं, तो मानसिक द्वंद्व से मुक्ति मिल जाती है।
तीसरा और अंतिम अध्याय चेतना की पूर्णता का शिखर है। शुंभ और निशुंभ ‘मैं’ और ‘मेरा’ के उन अंतिम बंधनों के प्रतीक हैं, जो हमें संसार से अलग महसूस कराते हैं। जब देवी रणक्षेत्र में घोषणा करती हैं कि “इस जगत में मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन है,” तो वे अद्वैत चेतना का शंखनाद करती हैं। आधुनिक विज्ञान की ‘इंटीग्रेटेड इंफॉर्मेशन थ्योरी’ भी इसी एकता की पुष्टि करती है। इस सिद्धांत से पता चलता है कि चेतना का उच्चतम स्वरूप वही है, जहाँ सारी सूचनाएं और अनुभव एक अखंड इकाई बन जाते हैं। यह वह अवस्था है, जहाँ व्यक्ति और ब्रह्मांड के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले ही यह उद्घोष किया था कि मनुष्य की देह ब्रह्मांड का ही सूक्ष्म रूप है। यजुर्वेद का प्रसिद्ध वाक्य ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’ इसी सत्य की ओर संकेत करता है कि जो व्यवस्था विराट सृष्टि में है, वही व्यवस्था मानव शरीर में भी कार्य कर रही है।
श्रीदुर्गासप्तशती के केंद्र में ‘महामाया’ का जो स्वरूप वर्णित है, वह आधुनिक विज्ञान की सबसे जटिल गुत्थियों में से एक “चेतना का भ्रम” से गहराई से मेल खाता है। श्रीदुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय में ऋषि मेधा राजा सुरथ को समझाते हैं कि ‘महामाया’ कोई साधारण सम्मोहन नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की वह योगनिद्रा है, जो ज्ञानियों के चित्त को भी अपनी शक्ति से खींचकर मोह में डाल देती है। जब तक हम इस आवरण के भीतर होते हैं, सत्य को उसके उसके मूल रूप में नहीं देख पाते हैं। सवाल है कि हम क्या करें कि जीवन की राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश हो और अज्ञान से मुक्ति मिल जाए? बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कहते हैं कि, श्रीदुर्गासप्तशती के मंत्रों की साधना ही पर्याप्त है।
योगशास्त्र की दृष्टि में मंत्र केवल शब्द नहीं, बल्कि ध्वनि ऊर्जा की विशिष्ट आवृत्तियां हैं जो हमारे अस्तित्व के सूक्ष्म स्तरों को झंकृत करती हैं। हमारा शरीर और मन केवल भौतिक तत्वों से नहीं, बल्कि प्राणिक और भावनात्मक ऊर्जा के कंपनों से निर्मित है। मंत्रों का सस्वर पाठ शरीर के भीतर ऐसी तरंगें उत्पन्न करता है जो हमारे ऊर्जा केंद्रों यानी चक्रों के शोधन में सहायक होती हैं। यह प्रक्रिया कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर मनुष्य को सामान्य चेतना से ऊपर उठाकर समाधि की ओर ले जाती है। तर्क और बुद्धि मनुष्य को सांसारिक समझ तो देते हैं, लेकिन जीवन के गहरे रहस्यों को समझने के लिए इनकी अपनी सीमाएं हैं। जब मंत्रों के प्रभाव से बुद्धि शांत होती है, तब श्रद्धा और विश्वास का उदय होता है। यही वह क्षण है जब साधक का ‘स्व’ ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन होने लगता है। इस तादात्म्य या विलय की अवस्था में व्यक्ति और सृष्टि के बीच का भेद मिट जाता है। इस प्रकार मंत्र वह वैज्ञानिक कुंजी हैं जो मनुष्य के सूक्ष्म व्यक्तित्व के द्वार खोलकर उसे आत्म-बोध और वैश्विक एकता के आनंद से जोड़ देते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

