छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास के बीच का यह प्रसंग भक्ति, समर्पण और कर्तव्य की पराकाष्ठा है कि कैसे एक महान शासक ने अपना संपूर्ण राज्य अपने गुरु के चरणों में अर्पित कर दिया और गुरु ने उसे राजधर्म का पाठ पढ़ाकर लोक कल्याण के मार्ग पर प्रशस्त किया। प्रस्तुत कथा श्रीहनुमान के अवतार के रुप में प्रसिद्ध समर्थ रामदास पर आधारित माधवराव सप्रे की पुस्तक “दासबोध” पर आधारित है, जिसमें समर्थ रामदास और शिवा जी महाराज के बीच प्रेरक संवाद है।
कथा है कि एक दिन समर्थ माहुली-संगम पर स्नान-संध्या करके भिक्षा माँगते हुए शिवाजी के महल में पहुंच गए और “जय जय श्रीरघुवीर समर्थ” की गर्जना करके भिक्षा माँगी। समर्थ की वाणी सुनते ही शिवाजी का हृदय गद्गद हो गया। वे विचार करने लगे कि ऐसे सत्पात्र सद्गुरु की झोली में क्या भिक्षा डाली जाए। फिर खयाल आया और तुरंत ही कागज पर लिखा, “श्रीसमर्थ के चरणों में सब राज्य अर्पण कर दिया।” फिर उन्होंने इस पत्र पर मुहर लगाकर बाहर गए और समर्थ की झोली में डालकर साष्टांग दंडवत् किया। यह देख कर समर्थ ने पूछा, “क्यों शिवा, यह कैसी भिक्षा डाली? मुट्ठी भर चावल झोली में डाले होते तो दोपहर का समय कटता। आज क्या कागज का टुकड़ा ही समर्पण करके हमारा आतिथ्य करते हो?” इतना कह कर जब उन्होंने वह कागज निकाल कर पढ़ा तब मालूम हुआ कि शिवाजी ने अपना सब राज्य अर्पण कर दिया है।
समर्थ ने शिवाजी से पूछा, “क्यों शिवा, राज्य तो तुमने हमको दे दिया, अब तुम क्या करोगे?” शिवाजी ने हाथ जोड़ कर विनती की, “आपकी चरण-सेवा में रह कर समय व्यतीत करूँगा।” यह सुन कर समर्थ हँसे और कहा, “बाबा! जो जिसका काम है, वह उसी को करना उचित है। ब्राह्मणों को जप-तप करके ज्ञान सम्पादन करना चाहिए और क्षत्रियों को क्षात्रिय धर्म ही का पालन करना चाहिए। इस प्रकार अपना-अपना कर्तव्य करते रहने से ही मोक्ष-प्राप्ति होती है। अपना-अपना कर्म यथोचित रीति से पूर्ण करने में ही जन्म की सार्थकता है।
फिर उन्होंने पूर्व के कई दृष्टांत दिए। राजा रामचंद्र ने भी अपने कुलगुरु वसिष्ठ को आधा राज्य अर्पण कर दिया था। उस समय वसिष्ठ जी ने श्रीराम को योगवासिष्ठ के रूप में नीति, न्याय और धर्म का उपदेश किया और उनका राज्य उन्हें लौटा दिया। राजा जनक ने भी अपने गुरु याज्ञवल्क्य को राज्य अर्पण किया था। पर, गुरु ने जनक को राजधर्म का उपदेश किया। शिवा! हम वैरागियों को राज्य की क्या जरूरत है? कदाचित् हमने अंगीकार भी कर लिया तो उसे सँभालने के लिए प्रधान की जरूरत है। प्रधान तू ही बन और राज्य हमारा समझ कर उसका प्रबंध कर।”
यह उपदेश सुनते ही शिवाजी का अंतःकरण गद्गद हो गया। पर, उन्होंने समर्थ से प्रार्थना की, “अब कृपापूर्वक आप अपनी पादुका मुझे दीजिए, उन्हीं को स्थापित करके मैं आपके प्रधान की तरह राजकाज करूँगा।” समर्थ ने यह प्रार्थना स्वीकार की। उसी समय से शिवाजी महाराज ने अपने राज्य की निशानी अर्थात् झंडा भी भगवा रंग का कर दिया, जो कि वैराग्य, त्याग और धर्मनिष्ठा का प्रतीक है।

