हमने अभी-अभी महाशिवरात्रि मनाई। शिव-शक्ति के मिलन का आध्यात्मिक मर्म और भोलेनाथ के नीलकंठ स्वरुप का निहितार्थ समझा। अब दो दिनों बाद ही यानी अठारह फरवरी को उन्नीसवीं सदी के महान संत श्रीरामकृष्ण परमहंस की जयंती है। उन्हें भी आधुनिक युग का नीलकंठ कहा गया है। उन्होंने संसार की वैचारिक कट्टरता और कलह का विष पीकर “ईश्वर एक है’ की उद्घोषणा के रुप में अमृत प्रदान किया था। धर्मों की सारभूत एकता वाले इस संदेश के जरिए साबित किया कि “महोपनिषद्” में वर्णित “वसुधैव कुटुंबकम्” सार्वभौमिक बंधुत्व का बीज मंत्र है। उनके दिव्य गुणों के कारण ही कहा गया कि जब अनंत चेतना मानवीय सीमाओं को स्वीकार कर धरा पर आती है, तो वह श्रीरामकृष्ण जैसे स्वरूप में प्रकट होती है।
श्रीरामकृष्ण परमहंस का संपूर्ण अस्तित्व शिवत्व और चेतना के उस महामिलन की गाथा है, जिसका आरंभ उनके जन्म से पूर्व ही हो गया था। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में स्थित कमारपुकुर की पावन धरा पर उनकी माता चंद्रमणि देवी को एक ऐसी अलौकिक ज्योति के दर्शन हुए थे, जो महादेव के विग्रह से निकलकर उनके भीतर समां गई थी। लोक-मान्यता है कि जैसे आदि शंकराचार्य शिव के आशीर्वाद और अंश से प्रकट हुए थे, वैसे ही महादेव की वह ज्योति ही गदाधर के रूप में धरा पर अवतरित हुई, जिन्हें हम श्रीरामकृष्ण परमहंस के रुप में जानते हैं। वे बड़े हुए तो शिवरात्रि की एक रात गाँव में होने वाले नाटक में शिव की भूमिका निभाने के लिए सुसज्जित होकर जैसे ही मंच पर गए, अभिनय और यथार्थ की सीमाएं ढह गईं। उनकी चेतना बाह्य संपर्क पूरी तरह टूट गई और वे भाव-समाधि में लीन हो गए थे। इस दृश्य से पूरा गाँव स्तब्ध रह गया। नाटक का मंचन तो नहीं हो सका था। पर, एक महान आध्यात्मिक क्रांति का उदय हो गया था।
मॉ काली में ही शिव की भी उपस्थिति का अहसास कर चुके श्रीरामकृष्ण परमहंस अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों की बदौलत जाना कि जितने मत, उतने मार्ग, परन्तु ईश्वर एक है। वे मानव जाति के इतिहास में अकेले व्यक्ति थें, जिन्होंने सभी धर्मों के मार्ग से सत्य तक जाने की चेष्टा की और सभी धर्मों से उसी शिखर को पा लिया। ईश्वर अल्लाह तेरो नाम… तो अनेक लोग जपते रहे हैं। पर उन्होंने अनुभव से जान लिया है कि ईश्वर एक है। पुस्तकों में उल्लेख है कि सन् १८६६ के अंत में जब वे इस्लाम की साधना करते थे तो वे वास्तव में मुसलमान फकीर ही बन गए थे। राम-कृष्ण को भूलकर ‘अल्लाहू-अल्लाहू’ बोलने और कुरान की आयतें सुनने लगे थे। मैडोना और शिशु ईसा के चित्र को निहार रहे थे तो महसूस किया कि ईसा से निकली ज्योति उनके हृदय में समां गईं। इस तरह उन्होंने अनेकानेक पंथों की साधनाएं की और कहा कि जिस प्रकार नदियाँ अलग-अलग दिशाओं से बहती हैं, लेकिन अंत में एक ही समुद्र में मिल जाती हैं। उसी प्रकार सभी धर्मों का गंतव्य एक ही ईश्वर है।
वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया वैचारिक कट्टरता, धार्मिक संकीर्णता और पहचान के संकट से जूझ रही है, तब श्रीरामकृष्ण परमहंस का यह अनुभूतिपरक संदेश मानवीय एकता का सबसे बड़ा आधार बन सकता है। उनके अनुभवजन्य संदेशों में इतनी शक्ति है कि हमें संकुचित दायरे से निकालकर वैश्विक परिवार या ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना से जोड़ सकती है। उनकी इन आध्यात्मिक उपलब्धियों को आधुनिक विज्ञान के यूनिफायड फील्ड थ्योरी यानी एकीकृत क्षेत्र सिद्धांत के समानांतर माना जा सकता है, जो पूरे ब्रह्मांड को एक ही ऊर्जा का विस्तार मानता है। श्रीरामकृष्ण कहते भी थे कि वैश्विक शांति बाहर की संधियों या सामाजिक व्यवस्थाओं से नहीं आती, बल्कि चेतना के रूपांतरण से जन्म लेती है।
उपनिषदों में कहा गया है – “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” का संदेश है कि ईश्वर कहें या सत्य, वह एक ही है, उसको व्यक्त करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ यानी जो करुणा, जो आत्मीयता हम अपने लिए दिखाते हैं, वही हमें दूसरों को भी दिखानी चाहिए। ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्’ यानी हम सब एक साथ चलें, एक साथ बोलें, हमारे मन एक हों और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी पूरा विश्व एक परिवार है। श्रीरामकृष्ण परमहंस जैसे आत्मज्ञानी संत ने पढ़कर नहीं, बल्कि आत्मानुभूति के जरिए इस सत्य को जाना और उसे प्रचारित किया।
उनकी ये आध्यात्मिक अनुभूतियां आधुनिक विज्ञान के लिए तब भले पहेली बनी रही। पर, न्यूरोसाइंस अब उन न्यूरल बदलावों को प्रमाणित कर रहा है, जिन्हें रामकृष्ण ने ‘भाव-समाधि’ के दौरान स्वतः अनुभव किया था। विशेष रूप से न्यूरोथियोलॉजी के क्षेत्र में हुए शोध बताते हैं कि गहन आध्यात्मिक अवस्थाओं में मस्तिष्क का वह हिस्सा शांत हो जाता है जो स्वयं और संसार के बीच भेद करता है, जिससे ‘अद्वैत’ या ‘एकत्व’ की अनुभूति होती है। इसी प्रकार, क्वांटम भौतिकी के सूक्ष्म कणों का व्यवहार और चेतना अध्ययन के नए सिद्धांत उस सार्वभौमिक सत्य की पुष्टि करते हैं, जिसे वेदांत ने सदियों पहले प्रतिपादित किया था।
श्रीरामकृष्ण परमहंस की आध्यात्मिक ऊर्जा इतनी ताकतवर थी कि उसका प्रभाव दुनिया भर में दिखा। तब यह बात भले सार्वजनिक रुप से स्वीकार नहीं किया गया। पर, जब दुनिया में धार्मिक मतभिन्नता के कारण सौहार्द्र पूरी तरह बिगड़ने लगा तो सन् 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद बुलानी पड़ी थी। यह न मानने का कोई कारण नहीं कि आयोजन भारतीय दर्शन और समकालीन संतों की अनुभूतियों से प्रेरित होकर किया गया था। वैसे भी उसमें श्रीरामकृष्ण परमहंस के पट्टशिष्य स्वामी विवेकानंद की निर्णायक उपस्थिति ने उसे विश्व-धर्म संवाद के इतिहास में मील का पत्थर बना दिया था। श्रीरामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद प्राचीन और नवीन के संगम थे। रामकृष्ण भारत की प्राचीन आध्यात्मिक आत्मा थे, और विवेकानंद वह शक्ति थे, जिसने उस आत्मा को आधुनिक दुनिया के सामने प्रकट किया था।
यह सुखद है कि स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके अपने गुरु की आध्यात्मिक उपलब्धियों के प्रकाश को दुनिया भर में फैलाने देने का जो संकल्प लिया था, वह आज नाना रुपों में प्रकाशित है। इस दिव्य ऊर्जा से प्रकाशित होने वाले संतों-महात्माओं और मनोवैज्ञानिकों-वैज्ञानिकों की फेहरिस्त भी लंबी है। दुनिया में शांति का मर्म भी इसी दिव्य प्रकाश में सन्निहित है। श्रीरामकृष्ण परमहंस की स्मृतियों को 191वीं जयंती पर सादर नमन।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

