लाखों साल पहले हमारी धरती ज्ञान-विज्ञान के मामले में कितनी समृद्ध रही होगी, इसके प्रमाम हमारे वैदिक शास्त्र हैं। आज मंगलवार है। इसे बजरंगबलि का दिन माना जाता है। सनातन धर्म में सप्ताह के प्रत्येक दिन को किसी न किसी देवता को समर्पित किया गया है। मंगलवार का संबंध मंगल ग्रह से है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल को शक्ति, साहस और युद्ध का कारक माना गया है। हनुमान जी भी बल और पराक्रम के देवता हैं, इसलिए मंगल ग्रह की शांति और कृपा के लिए मंगलवार को उनकी पूजा की जाती है। इसलिए, मैंने आज के दिन को हनुमान जी की सिद्धियों की चर्चा करने के लिए चुना।
जब हम हनुमान जी की सिद्धियों की चर्चा करते हैं तो वह बात जुड़ जाती है त्रेतायुग से, जब इस धरा पर श्रीराम का अवतरण हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रीराम का जन्म आज से कोई अठारह साल वर्ष पूर्व हुआ था और उन्होंने 11000 वर्षों तक अयोध्या पर राज किया था। उसके बाद 8,64,000 वर्षों का द्वापर युग आया और कलियुग चल रहा है। 4,32,00 वर्षों वाले कलियुग के भी लगभग 5500 साल बीत चुके हैं। यानी इतने साल पहले श्री हनुमान जी अपनी अष्ठ यानी आठ सिद्धियों की बदौलत ऐसा चमत्कार करते रहे कि आधुनिक युग में वे कपोल-कल्पना जैसी लगती हैं। हालांकि हमारी बुद्धि का औसत विकास इतना कम है कि हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और क्वांटम भौतिकी के परिणामों से ही हत्प्रभ रह जाते हैं। सब कुछ चमत्कार जैसा जान पड़ता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और क्वांटम भौतिकी जिस दिशा में जा रही हैं, वह हमारे वैदिककालीन ज्ञान से ही प्रेरित है। आने वाले समय में वैज्ञानिक इस बात को मान्यता देंगे। खैर, आज की चर्चा है हनुमान जी की अष्ट सिद्धियों को लेकर। वे अष्ट सिद्धियां कौन-सी थीं? हमलोग हनुमान चालीसा में अक्सर पढ़ते हैं – अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥ यानी जानकी माता ने प्रसन्न होकर श्रीहनुमान जी को योग और तप से प्राप्त आठ विशेष शक्तियाँ, जैसे अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व और ईशित्व और नव निधियां यानी नौ प्रकार की धन-संपत्तियाँ दान में दी थी।
अब समझिए कि अष्ट सिद्धियों की महिमा क्या है। अणिमा सिद्धि प्राप्त होने से जीव अणु के समान सूक्ष्म हो जा सकता है। लंका में प्रवेश के समय हनुमान जी ने ‘मसक समान रूप धरि’ यानी मच्छर जैसा छोटा रूप धारण कर लिया था। महिमा सिद्धि हो तो विशालकाय रूप धारण करना संभव है। समुद्र लांघते समय जब सुरसा के सामने आ गया तो हनुमान जी ने अपने शरीर को विशालकाय बना लिया था। गरिमा सिद्धि से शरीर भार इच्छानुसार बढ़ाया जा सकता है। महाभारत के वन पर्व में प्रसंग है कि हनुमान जी ने भीम के समक्ष अपनी पूँछ को इतना भारी कर लिया था कि भीम उसे हिला न सके।
लघिमा सिद्धि के माध्यम से योगी अपने शरीर के परमाणुओं के बीच के खिंचाव को कम करके उसे रुई या वायु से भी हल्का बना सकता है। लंका की ओर जाते समय जब हनुमान जी ने छलांग लगाई, तो उन्होंने लघिमा सिद्धि का उपयोग किया, ताकि वे वायु की गति से उड़ सकें। प्राप्ति सिद्धि का अर्थ है किसी भी वस्तु या स्थान तक मानसिक या शारीरिक रूप से तुरंत पहुँच जाना। इसमें दूरी का बंधन समाप्त हो जाता है। संजीवनी बूटी के लिए हज़ारों मील दूर द्रोणागिरी पर्वत जाना और पल भर में औषधि लाना ‘प्राप्ति’ शक्ति का अनुपम उदाहरण है। प्राकाम्य यानी इच्छा कभी विफल न हो। यह संकल्प से सिद्धि की यात्रा है। इस सिद्धि से योगी पृथ्वी की गहराई में समां सकता है या अदृश्य होकर कहीं भी विचरण कर सकता है। अहिरावण का वध करने के लिए हनुमान जी का पाताल लोक में जाना और वहां की कठिन परिस्थितियों में भी सफल होना ‘प्राकाम्य’ सिद्धि का ही प्रतिफल था।
ईशित्व’ शब्द ‘ईश’ (ईश्वर) से बना है। यह वह सामर्थ्य है जिससे साधक प्रकृति के पंचतत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को अपने अनुशासन में ले आता है। लंका दहन के समय जब हनुमान जी की पूँछ में आग लगाई गई, तो उन्होंने अपनी योग शक्ति (ईशित्व) से अग्नि के ताप को नियंत्रित किया। माता सीता की प्रार्थना पर अग्नि देव उनके लिए ‘शीतल’ हो गए, लेकिन लंका के लिए विनाशकारी। ‘वशित्व’ वह सिद्धि है जिससे साधक किसी भी प्राणी के मन, व्यवहार और प्रवृत्तियों को प्रभावित कर सकता है। यह शक्ति ‘वशीकरण’ की तरह नहीं, बल्कि ‘आध्यात्मिक आकर्षण’ और ‘इंद्रिय विजय’ की तरह कार्य करती है। जब हनुमान जी अशोक वाटिका में थे, तो उनके प्रभाव से रावण जैसे शक्तिशाली योद्धा के मन में भी भय व्याप्त हो गया था। उनके गर्जन मात्र से शत्रुओं का धैर्य टूट जाता था।
ये सिद्धियां शास्त्रसम्मत हैं और आधुनिक युग के ऋषि-मुनि के जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएं इन्हें प्रमाणित करती हैं। आदिगुरु शंकराचार्य मंडन मिश्र की पत्नी उभया भारती से कामशास्त्र को लेकर पराजित होने लगे तो उन्होंने सही जबाव देने के लिए उभया भारती से एक महीने का समय मांगा और इस बीच वे एक राजा के शरीर में प्रवेश करके शिक्षा हासिल कर ली थी। इसके बाद ही वे शास्त्रार्थ में विजयी हुए थे। (जारी)

