बिहार की पावन भूमि और मुंगेर में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर अवस्थित बिहार योग विद्यालय आधुनिक युग में ऋषि संस्कृति के पुनर्जागरण का महान केंद्र है। यह अपनी किस्म का इकलौता केंद्र है, जो पूरी तरह संन्यासियों द्वारा संचालित है। बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने यौगिक क्रांति के लिए जो संकल्प लिया था, उसकी पूर्णता का यह साक्षात गवाह है। जब इस योग विद्यालय की स्थापना की गई थी, तो उसके पीछे की अवधारणा यह थी कि योग को एक विज्ञान, एक जीवनशैली, एक विश्वास और मानवता की संस्कृति के रूप में मानव समाज तक ले जाना है। इसके लिए ऐसे लोगों का चयन किया गया जो योग के सिद्धांतों से परिचित थे। योग के प्रति समर्पित और निष्ठावान थे और जिन्होंने आध्यात्मिक अनुशासन का अनुभव किया था। जाहिर है कि ऐसे लोग संन्यासी ही थे। इस प्रकार, बिहार योग विद्यालय में संन्यास परंपरा और योग परंपरा का मिलन हुआ।
समय बीतने के साथ ही परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी और इस संस्थान के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने महसूस किया कि इस सदी के लिहाज से योग विद्या की व्याख्या होनी चाहिए। उन्होंने व्यापक अध्ययन और आत्म-मंथन के बाद अगले पचास वर्षों के लिए ऐसी योग विधियां प्रस्तुत की, जो दुनिया की नजरों में क्रांतिकारी कदम था। इसलिए कि यह शास्त्रसम्मत और विज्ञानसम्मत तो है ही, इस युग की जरूरतों के अनुरूप भी है। इसे योग का द्वितीय चरण कहा गया है। लक्ष्य यह है कि एक ऐसी संस्कृति का निर्माण हो सके, जो मानव चेतना को नई ऊंचाइयों तक ले जाए। संन्यासी इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अहर्निश लगे रहते हैं। नतीजतन, बिहार योग विद्यालय यौगिक व आध्यात्मिक पुनर्जागरण का महान केंद्र बना हुआ है। इन्हीं विलक्षणता के कारण विदेशी अखबार “द गार्जियन” ने इस संस्थान को योग के मामले में पहले स्थान पर ऱखा है।
वसंत पंचमी के दिन इस योग मंदिर की स्थापना के 63 साल पूरे हो जाएंगे। इस दिवस को विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी माता सरस्वती के आविर्भाव का मंगल दिवस माना जाता है। इसलिए, इस खास तिथि को योग विद्यालय की स्थापना मात्र एक संयोग नहीं, बल्कि पूर्ण गुरु से ज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को पूर्णत्व के शिखर पर पहुंचाने की आध्यात्मिक उद्घोषणा थी। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती कहते थे, “जब आप चीजें जानते हैं, लेकिन उन्हें लागू करने में असमर्थ होते हैं, तो वह ‘सरस्वती का श्राप’ है। जब आप चीजें जानते हैं और खुद को सुधारने के लिए उन्हें लागू करने में सक्षम होते हैं, तो वह ‘सरस्वती की कृपा’ है। ज्ञान और बुद्धि में यही अंतर है। इसलिए हमारी कोशिश है कि योग केवल सैद्धांतिक ज्ञान और शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं रहे। सरस्वती परंपरा से होने के कारण हमारा मुख्य कर्तव्य आने वाली पीढ़ियों के लिए योग विद्या को सुरक्षित रखना और देशकाल के लिहाज से उसे प्रसाद स्वरुप प्रदान करना है।“ आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि स्वामी जी ईश्वरीय विधान और गुरु कृपा की बदौलत अपने उद्देश्यों में पूरी तरह सफल हो गए और हम सब उस योग प्रसाद को पाकर धन्य हैं।
गुरू-शिष्य परंपरा के तहत स्थापित छोटा-सा योग विद्यालय देखते-देखते दुनिया के एक सौ से ज्यादा देशों में उपस्थिति दर्ज करा चुका है। साथ ही यह दुनिया भर में यौगिक अनुसंधानों को संचालित करने वाला महत्वपूर्ण केंद्र भी बन चुका है। अपने विलक्षण गुणों के कारण नासा को जब अंतरिक्ष यात्रियों के लिए यौगिक उपचारों की जरूरत महसूस हुई तो उसे इस काम को सफलापूर्वक अंजाम देने के लिए अपने पांच सौ वैज्ञानिकों के समूह में इकलौते योगी के रूप में बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ही उपयुक्त लगे। इस परियोजना के तहत एक ऐसे यंत्र का आविष्कार किया जा रहा है, जिससे फ्रिक्वेंसी का आदान-प्रदान हो सके। इस कार्य में स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की महती भूमिका है। इस परियोजना में सफलता मिलने पर अंतरिक्ष गए यात्रियों का इलाज इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फ्रिक्वेंसी से किया जा सकेगा।
शास्त्रसम्मत, विज्ञानसम्मत और दूरगामी सोच के तहत समय-समय पर योग विद्या की व्याख्या करके उसे साधकों के लिए सुलभ कराए जाने का ही परिणाम है कि यह अपनी स्थापना काल से ही नए-नए प्रतिमान स्थापित करने के लिए मशहूर है। इस संदर्भ में बेंगलुरू स्थित योग विश्वविद्यालय स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान के उपकुलपति डॉ एचआर नगेंद्र का मंतव्य गौरतलब है – “मैं जब पहली बार बिहार योग विद्यालय के संपर्क में आया था तो स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी की कार्यशैली देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। मैंने देखा कि वे योग के माध्यम से लोगों को रूपांतरित कर रहे थे। मैंने उस पद्धति को अपने संस्थान में लागू कर दिया। इसके बाद तो बार-बार ऐसा हुआ कि पूज्य गुरूओं स्वामी सत्यानंद सरस्वती और स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने जिस यौगिक प्रणाली का विकास किया, उसे हमने अपना लिया।“
दुनिया में योग का पहला विश्व विद्यालय होने का गौरव हासिल करने वाले इस संस्थान की स्थापना बिहार के मुंगेर जैसे सुदूरवर्ती शहर में करके पूरी दुनिया में योग का डंका बजा देना मामूली काम नहीं था। पर ऋषिकेश में डिवाइन लाइफ सोसाइटी व शिवानंद आश्रम के संस्थापक तथा पेशे से चिकित्सक रहे स्वामी शिवानंद सरस्वती के शिष्य परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपने गुरू का आदेश पालन करते हुए असंभव को संभव कर दिखाया। आज आलम यह है कि जिस तरह प्राचीन काल में ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे विदेशी यात्री भारत के विद्या मंदिरों में ज्ञान की खोज में आते थे, उसी तरह योग विद्या का लाभ लेने के लिए दुनिया के लगभग हर देश से जिज्ञासु बिहार योग विद्यालय जाते हैं। जिस प्रकार प्राचीन पुस्तकालयों में पांडुलिपियाँ सहेजी जाती थीं, उसी प्रकार इस विद्यालय ने ‘योग पब्लिकेशन ट्रस्ट’ के माध्यम से योग के दुर्लभ ज्ञान को दुनिया भर के लिए लिखित रूप में सहेज रखा है।
भारतीय योग विद्या को वैश्विक पहचान दिलानेवाले परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने तो 5 दिसंबर 2009 को अपनी तपोभूमि रिखियापीठ (देवघर) में महासमाधि ले ली थी। पर, उनकी सूक्ष्म ऊर्जा दुनिया भर के योग साधकों को स्पंदित करती रहती है। दूसरी तरफ, योग का नया अवतार आधुनिक युग की चुनौतियों से निजात दिलाने में मददगार साबित हो रहा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)

