# USHAKAAL > JOURNEY WITHIN, JOURNEY BEYOND ## Posts - [लाइलाज नहीं है यह 'व्याधिमंदिरम्'](https://ushakaal.com/antibiotic-resistance/): प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने शरीर को ‘व्याधिमंदिरम्’ यानी रोगों का घर बताते हुए चेतावनी दी थी कि योग के जरिए उसे इस तरह साधो कि वही शरीर ‘धर्मसाधनम्’ बन जाए। इसलिए कि जीवन का अंतिम लक्ष्य यही है। पर, हमने क्या किया? अतर्यात्रा से मुख मोड़कर बर्हिर्यात्रा शुरु की और इंदियों के दास बन गए। नतीजतन, जिस शरीर को धर्मसाधनम् बनना था, वह व्याधिमंदिरम् बनकर रह गया है। पर, हमरा जीवन कैसा है? हमने भागदौड़ भरी जिंदगी में दवाओं को ‘शॉर्टकट’ मान लिया है। शरीर में जरा-सा दर्द हुआ नहीं कि हमने गोली निगल ली। संकट यही से शुरु होता - [चलो बुलावा आया है...और आशा भोंसले चल पड़ीं अनंत यात्रा पर](https://ushakaal.com/ashabhosale/): माता रानी का बुलावा आया और अनंत यात्रा पर निकल पड़ी आशा भोसले। वैसे तो उनकी पहचान भारतीय संगीत की बहुरंगी धारा में चुलबुले, रोमांटिक और प्रयोगधर्मी गीतों के साथ जुड़ी हुई थी। पर उनके सुरमयी संसार का एक ऐसा भी पक्ष था, जहाँ उनके स्वर अध्यात्म की गहराइयों को छू जाते थे। तभी कई अवसरों पर उनके गीत गहरे आध्यात्मिक अनुभव में रूपांतरित होते प्रतीत होते थे। उनकी टीम के सदस्य अक्सर कहा करते थे कि जब वे भजन रिकॉर्ड करती थीं, तो स्टूडियो का समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत होता था। एक मर्मस्पर्शी घटना मराठी अभंग की - [योग के मूल स्वरुप की पुनर्स्थापना के लिए योग-यात्रा](https://ushakaal.com/bharat-yoga-yatra/): बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी तथा विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की “भारत योग यात्रा – 2026” योग विद्या के वर्तमान व्यावसायिक स्वरूप से अलग प्राचीन विद्या के वास्तविक और शुद्ध रूप को पुनर्स्थापित करने का एक प्रयास है। इसे बिहार योग परंपरा या सत्यानंद योग परंपरा में “योग का द्वितीय अध्याय” के रुप में जाना जाता है। योग का द्वितीय अध्याय केवल एक नया चरण नहीं है; यह योग का पुनर्जनन है। हम जानते हैं कि बिहार योग विद्यालय बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी - [मेरुदंड : आध्यात्मिक उत्थान का आधार](https://ushakaal.com/vertebral-column/): किसी व्यक्ति के गुण या व्यवहार प्रतिकूल हो तो हम सब कहते हैं कि फलां रीढ़ विहीन है। इसके विपरीत रीढ़ का सीधा होना साहस, आत्मसम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक बन जाता है। पर, इस मुहावरे से इतर रीढ़ का महत्व इतना है कि चिकित्सा विज्ञान से लेकर अध्यात्म विज्ञान तक में इसकी महत्ता पर काफी कुछ कहा गया है। चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से मेरुदंड (रीढ़) हमारे शरीर की संरचना का केंद्रीय अक्ष है, मुख्य आधार है। मेरुदंड अस्वस्थ हो तो न शरीर सीधा खड़ा रह सकता है, न ही तंत्रिका तंत्र ठीक से कार्य कर सकता है। - [इसलिए ज्ञान के असीम सागर हैं श्री हनुमान](https://ushakaal.com/hanuman-jayanti-3/): जय हनुमान ज्ञान-गुण सागर…. गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री हनुमान जी को “ज्ञान गुण सागर” क्यों कहा? इसलिए कि सूर्य भगवान से अपार ज्ञान प्राप्त करने के कारण ज्ञानियों में अग्रगण्य (सबसे आगे) हैं। ज्ञान के असीम सागर हैं। यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक पूर्ण व्यक्तित्व का खाका है। श्री तुलसीदास जी जब उन्हें असीम ज्ञान का पुंज और दोषरहित बाताते हैं, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि वास्तविक ज्ञान वही है जो अहंकार को समाप्त कर दे। प्रकृति का नियम है कि जहाँ गुण होते हैं, वहाँ कुछ न कुछ दोष भी होते हैं, लेकिन हनुमान जी - [हनुमान जयंती : आंतरिक समुद्र-लंघन का उत्सव](https://ushakaal.com/hanuman-jayanti-2/): भारत भूमि पर शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जब श्रीराम भक्त हनुमान जी की दिव्य कथा, उनके असीम बल, ज्ञान और निरभिमानी स्वरूप की महिमा न गाई जाती हो। सूर्य को निगलने की कथा, भूलोक में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की सेवा और पाताललोक में अहिरावण का वध करके राम – लक्ष्मण को वापस लाने संबंधी प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि उनकी व्याप्ति तीनों लोकों में है। वे अतुलित बल के धाम होते हुए भी इतने अभिमान-शून्य हैं कि स्वयं को केवल राम जी के दूत से इतर कुछ भी मानने को तैयार नहीं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार - [आध्यात्मिक उत्क्रांति (Spiritual Emergency): अंतराग्नि का आंतरिक प्रवाह - 4](https://ushakaal.com/spiritual-emergency-4/): आध्यात्मिक संकट (Spiritual Emergency/ आध्यात्मिक उत्क्रांति) की प्रकारिकी: मनोविकृति या आत्मिक रूपांतरण? आध्यात्मिक संकट केवल मानसिक असंतुलन की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह आत्मिक रूपांतरण की संभावना भी समेटे हुए है—जहाँ व्यक्ति अपने भीतर की गहराइयों से जुड़कर चेतना के नए आयामों को छूता है। सिगमंड फ्रायड ने मानसिक असंतुलन को “इड, ईगो और सुपरईगो” के बीच बिगड़े संतुलन का परिणाम माना। उनके अनुसार, जब यह संतुलन टूटता है, तो व्यक्ति क्रोध, भय, दमन, बाध्यता और जुनून जैसे लक्षणों से ग्रस्त हो जाता है। परंतु नियो-फ्रायडियन विचारकों ने इस संकट को एक गहन आध्यात्मिक आयाम दिया, जिसे उन्होंने “Spiritual Emergency/ - [जैसा भोजन, वैसा मन; जैसा मन, वैसा विचार; जैसा विचार, वैसा कर्म](https://ushakaal.com/shakahar/): वैदिक परंपरा में ‘आहार’ शब्द का अर्थ केवल वह भोजन नहीं है जो हम मुख से ग्रहण करते हैं। यह एक समग्र अवधारणा है जिसमें वह सब कुछ शामिल है जिसे हम अपनी इंद्रियों और मन के माध्यम से ‘ग्रहण’ करते हैं। जैसा कि छांदोग्य उपनिषद में कहा गया है – “आहार शुद्धौ सत्त्व शुद्धिः; सत्त्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः; स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः।” मतलब यह कि जब आहार शुद्ध होता है, तो अंतःकरण शुद्ध होता है; अंतःकरण की शुद्धि से स्थिर स्मृति (आत्म-स्मरण) आती है; और स्मृति की प्राप्ति होने पर समस्त बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। छांदोग्य उपनिषद का - [रामनवमी : राम से बड़ा राम का नाम](https://ushakaal.com/ramnavami/): मनुष्य ने विकास के अनेक सोपान तय किए हैं। पर, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में गोस्वामी तुलसीदास जी का कालजयी निष्कर्ष, ‘कलि केवल हरि नाम अधारा’ हर दृष्टिकोण से व्यावहारिक जान पड़ता है। रामनवमी के पावन अवसर पर जब हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम  के अवतरण का उत्सव मनाने वाले हैं, तब राम नाम की इस महिमा पर विचार करना और भी प्रासंगिक हो गया है। इसलिए कि यह नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि चेतना को जागृत करने वाली एक दिव्य ध्वनि है। श्रीरामचरितमानस के बालकांड में राम नाम की महिमा का वर्णन अत्यंत - [आध्यात्मिक उत्क्रांति (Spiritual Emergency): अंतराग्नि का आंतरिक प्रवाह – 3](https://ushakaal.com/spiritual-emergency3/): पिछले भाग में हमने देखा कि कुंडलिनी ऊर्जा चक्रों और मस्तिष्कीय केंद्रों के माध्यम से साधक को आत्मिक विकास की ओर ले जाती है। अब इस भाग में हम इसके मनो-शारीरिक प्रभावों और अनुभवजन्य परिणामों को समझेंगे, जो साधक के जीवन को गहराई से बदल देते हैं। कुंडलिनी जागरण के प्रभाव कुंडलिनी जागरण साधक के जीवन में बहुस्तरीय परिवर्तन लाता है—शारीरिक संवेदनाओं से लेकर मानसिक, आध्यात्मिक और ऊर्जा स्तर तक, यह अनुभव व्यक्ति को उसकी सीमित पहचान से बाहर निकालकर व्यापक चेतना की ओर ले जाता है। शारीरिक स्तर पर अनुभव कुंडलिनी शक्ति के जागरण की प्रक्रिया प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न - [श्रीदुर्गासप्तशती : आध्यात्मिक चेतना का विज्ञान](https://ushakaal.com/chaitra-navratri/): भारतीय अध्यात्म की समृद्ध परंपरा में ऐसे ग्रंथ हैं, जिन्हें मनुष्य के भीतर छिपे रहस्यों की कुंजी कहा जाना चाहिए। मार्कंडेय पुराण का श्रीदुर्गासप्तशती उन्हीं में एक प्रमुख ग्रंथ है। अक्सर लोग इसमें वर्णित कथा को केवल देवी और असुरों के युद्ध की पौराणिक या ऐतिहासिक कथा मान लेते हैं। लेकिन गहराई से पड़ताल करें, तो पता चलता है कि यह मानव चेतना के तेरह चरणों का ब्रह्मांडीय आध्यात्मिक विज्ञान है। इसमें वर्णित सात सौ श्लोक असल में हमारे मन की परतों को खोलते हुए उसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ने का काम करते हैं। इस लिहाज से देवी और असुरों - [षट्कर्म बिना अधूरी है योग साधना](https://ushakaal.com/shatkarma-3/): भारतीय परंपरा में योग आत्मानुशासन और आत्मबोध की साधना के रूप में पल्लवित-पुष्पित होता रहा है। पर, उसे सीमित स्वरूप देकर आज दुनिया भर के जिम और स्टूडियो में एक ग्लैमरस वर्कआउट के तौर पर प्रस्तुत किया जाने लगा है। नतीजतन, षट्कर्म रूपी मानव शरीर के आंतरिक शोधन का मूल विज्ञान हाशिए पर जा चुका है। भारतीय यौगिक दर्शन में इसे ‘घटाकाश’ के अद्भुत रूपक से समझाया गया है। घटाकाश का अर्थ है कि घड़े के भीतर भी वही अनंत आकाश है, जो बाहर व्याप्त है। यहाँ घड़ा हमारा शरीर है और उसके भीतर का आकाश हमारी जीवात्मा। जब मिट्टी - [होली : आत्मिक शुद्धि का विराट अनुष्ठान](https://ushakaal.com/holi/): भारतीय संस्कृति में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह आत्मा के परमात्मा से मिलन और अहंकार के विसर्जन का एक महान अनुष्ठान है। ब्रज की पावन रज में जब अबीर-गुलाल की बौछार होती है, तो वह केवल बाहरी चकाचौंध नहीं होती, बल्कि उसके भीतर भक्ति का एक ऐसा अनहद नाद छिपा होता है, जो साधक को भीतर तक झंकृत कर देता है। भक्तशिरोमणि सूरदास से जुड़ी एक अर्थपूर्ण लोककथा से इस बात को समझा जा सकता है। रंगोत्सव का समय था। कुछ भक्तों को विनोदवश विचार आया कि क्यों न सूरदास जी रंग दिया जाए। लिहाजा, वे उनके - [बेकाबू जैविक आयु को काबू में करता योग](https://ushakaal.com/biological-aging-and-yoga/): परिवर्तन संसार का नियम है। भारत अभी दुनिया का सबसे ‘युवा’ देश है। पर, दो दशकों बाद तस्वीर ऐसी ही नहीं होगी। भविष्य की कोख में एक मौन संकट आकार ले रहा है। अगले दो दशकों में बुजुर्गों की संख्या लगभग बारह फीसदी से बढ़कर चौबीस फीसदी तक पहुंच कर हमारे सामाजिक ढांचे की अग्निपरीक्षा ले रही होगी। परिस्थिति न बदली तो देश में बीमार और लाचार वृद्धों की एक विशाल फौज होगी। उनमें स्मृतियों का क्षय करने वाले डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसे रोगों के साथ ही उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर जैसी जानलेवा व्याधियां विकराल रुप धारण कर चुकी - [जब शिवाजी प्रधान सेवक बन गए थे](https://ushakaal.com/shivaji-maharaj/): छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास के बीच का यह प्रसंग भक्ति, समर्पण और कर्तव्य की पराकाष्ठा है कि कैसे एक महान शासक ने अपना संपूर्ण राज्य अपने गुरु के चरणों में अर्पित कर दिया और गुरु ने उसे राजधर्म का पाठ पढ़ाकर लोक कल्याण के मार्ग पर प्रशस्त किया। प्रस्तुत कथा श्रीहनुमान के अवतार के रुप में प्रसिद्ध समर्थ रामदास पर आधारित माधवराव सप्रे की पुस्तक “दासबोध” पर आधारित है, जिसमें समर्थ रामदास और शिवा जी महाराज के बीच प्रेरक संवाद है।कथा है कि एक दिन समर्थ माहुली-संगम पर स्नान-संध्या करके भिक्षा माँगते हुए शिवाजी के महल में पहुंच - [श्रीरामकृष्ण परमहंस : और विश्व-शांति का मर्म](https://ushakaal.com/shriramkrishna-paramhamsa/): हमने अभी-अभी महाशिवरात्रि मनाई। शिव-शक्ति के मिलन का आध्यात्मिक मर्म और भोलेनाथ के नीलकंठ स्वरुप का निहितार्थ समझा। अब दो दिनों बाद ही यानी अठारह फरवरी को उन्नीसवीं सदी के महान संत श्रीरामकृष्ण परमहंस की जयंती है। उन्हें भी आधुनिक युग का नीलकंठ कहा गया है। उन्होंने संसार की वैचारिक कट्टरता और कलह का विष पीकर “ईश्वर एक है’ की उद्घोषणा के रुप में अमृत प्रदान किया था। धर्मों की सारभूत एकता वाले इस संदेश के जरिए साबित किया कि “महोपनिषद्” में वर्णित “वसुधैव कुटुंबकम्” सार्वभौमिक बंधुत्व का बीज मंत्र है। उनके दिव्य गुणों के कारण ही कहा गया कि - [स्वामी निरंजनानंद सरस्वती : आधुनिक युग के वैज्ञानिक संत](https://ushakaal.com/swami-niranjanananda-saraswati/): किशोर कुमार // योग की बेहतर शिक्षा किस देश में और वहां के किन संस्थानों में लेनी चाहिए? यदि इंग्लैंड सहित दुनिया के विभिन्न देशों से प्रकाशित अखबार “द गार्जियन” से जानना चाहेंगे तो भारत के बिहार योग विद्यालय का नाम सबसे पहले बताया जाएगा। चूंकि ऐसा सवाल पश्चिमी देशों में आम है। इसलिए “द गार्जियन” ने लेख ही प्रकाशित कर दिया। उसमें भारत के दस श्रेष्ठ योग संस्थानों के नाम गिनाए गए हैं। बिहार योग विद्यालय का नाम सबसे ऊपर है। इस विश्वव्यापी योग संस्थान के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की समाधि के दस साल होने को हैं। फिर भी बिहार योग का आकर्षण - [प्रेम उठे तो स्वर्ग, गिरे तो नर्क](https://ushakaal.com/swami-niranjanananda-saraswati-3/): दुनिया भर में वेलेंटाइन वीक की धूम है। रोमांटिक शेर ओ शायरी से सोशल मीडिया अंटा पड़ा है। प्रेम का संदेश देने वाले भारतीय सूफी संत परंपरा के महान कवि बुल्लेशाह के प्रेम के रंग में रंगे दोहे भी सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे हैं। पचास साल पहले सुप्रसिद्ध भजन गायक नरेंद्र चंचल द्वारा राजकपूर की फिल्म “बॉबी” के लिए गाया गया गीत बैकग्राउंड में बज रहा है – बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो, बुल्लेशाह वे कहते। पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, इस दिल में दिलबर रहता…। हमें फिल्म का संदर्भ याद रह गया, गीत के बोल याद रह गए। पर - [महाशिवरात्रि : आंतरिक रुपांतरण का उत्सव](https://ushakaal.com/mahashivratri/): महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि इसमें मानसिक उद्वेगों और बिखरते रिश्तों को संभालने का एक गहरा मनोवैज्ञानिक सूत्र अंतर्निहित है। पर, हम सब इस महान अवसर को सजगता के अभाव में यूं ही हाथों से जाने देते हैं। शिवरात्रि वाली सुबह से लेकर रात तक हर तरफ ‘हर-हर महादेव’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ के उद्घोष से आकाश गुंजायमान होता है। भव्य शिव बारात के दौरान देवों से लेकर गणों तक की जीवंत झांकियों के साथ शंखों की ध्वनि और डमरू की थाप पर झूमते भक्तों के कारण अद्भुत उत्सवी माहौल बनता है। पर, हम इस शिवमय - [शबरी जयंती: भक्ति की लोकतांत्रिक आत्मा का उत्सव](https://ushakaal.com/shabari-jayanti/): भक्ति की पावन गंगा जब हृदय की कंदराओं से फूटती है तो वह ऊंच-नीच, जाति-कुल और शास्त्र-ज्ञान की समस्त सीमाओं को लांघकर सीधे परम तत्व में विलीन हो जाती है। शबरी माता का जीवन इसी आध्यात्मिक लोकतंत्र का वह जीवंत दस्तावेज है, जो सदियों से मनुष्यता को सिखा रहा है कि ईश्वर किसी मंदिर की चारदीवारी या जटिल कर्मकांडों में नहीं, बल्कि भक्त के निश्छल अनुराग और अटूट प्रतीक्षा में निवास करता है। आज के इस भागदौड़ भरे और दिखावे वाली दुनिया में शबरी जयंती केवल एक पौराणिक कथा का स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि यह अंतर्मन की शुचिता और - [आध्यात्मिक उत्क्रांति (Spiritual Emergency): अंतराग्नि का आंतरिक प्रवाह - 2](https://ushakaal.com/spiritual-emergency2/): कुंडलिनी क्या है: ऊर्जा का सुप्त स्रोत कुंडलिनी ऊर्जा भारतीय योग परंपरा का सबसे रहस्यमयी आयाम है, जो मेरुदंड के मूल में सुप्त अवस्था में स्थित रहती है और साधक के भीतर गहन रूपांतरण की संभावना जगाती है। भारतीय योग परंपरा में “कुंडलिनी” शब्द एक रहस्यमयी और शक्तिशाली ऊर्जा का प्रतीक है। इसका प्रारंभिक उल्लेख हठयोग प्रदीपिका  जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जहाँ इसे “मुक्ति की कुंजी” कहा गया है—एक सर्प के समान कुंडलित, जो मेरुदंड के मूल में सुप्त अवस्था में स्थित रहती है। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने इसे आत्म-जागरण की प्रक्रिया का मूल आधार माना है, जो - [महर्षि महेश योगी : एक वैज्ञानिक संत की शिक्षाओं का मूल्य](https://ushakaal.com/maharshi-mahesh-yogi-3/): चेतना की गहराइयों में उतरना किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि यह हमारे देखने का नजरिया पूरी तरह बदल देता है। बीसवीं सदी के महान योगी महर्षि महेश योगी द्वारा प्रतिपादित ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन या “भावातीत ध्यान” वह कुंजी है, जो हमें जीवन के सबसे सूक्ष्म और आनंदमय स्तरों तक ले जाती है। जब हम ध्यान के माध्यम से मन की शांति का अनुभव करते हैं, तो हम केवल शांत नहीं होते बल्कि एक नई दृष्टि प्राप्त करते हैं। यह दृष्टि हमें सामान्य जगत के भीतर ही एक स्वर्णिम युग का आभास कराने लगती है। जीवन अपनी पूरी सुंदरता के - [ज्ञान-सिंहासन की शुचिता बनी रहे](https://ushakaal.com/shankaracharya/): अद्वैत वेदांत और सनातन धर्म की अविरल परंपरा में ज्योतिर्मठ, श्रृंगेरी मठ, शारदा और गोवर्धन मठ आदि शंकराचार्य की अमर देन हैं और सनातन धर्म के हृदय-स्थल हैं। वहीं, इन पीठों पर आसीन शंकराचार्य उस प्राचीन ज्ञान परंपरा के संरक्षक हैं। इसलिए, चार पीठों और उनके शंकराचार्यों का बड़ा महत्व है। इनको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद धर्म की हानि के तौर पर देखा जाता है। भारतीय दर्शन प्रचार या बहस के लिए नहीं, बल्कि आचरण के लिए है। ज्ञान की सिद्धि अनुभव में निहित है और संतों में द्वैत भाव अंशमात्र रह जाए तो समय रहते समाधान भी जरूरी होता है। - [श्री हनुमान जी की अष्ट सिद्धियां और कृत्रिम बुद्धिमत्ता](https://ushakaal.com/ashtsidhhi/): लाखों साल पहले हमारी धरती ज्ञान-विज्ञान के मामले में कितनी समृद्ध रही होगी, इसके प्रमाम हमारे वैदिक शास्त्र हैं। आज मंगलवार है। इसे बजरंगबलि का दिन माना जाता है। सनातन धर्म में सप्ताह के प्रत्येक दिन को किसी न किसी देवता को समर्पित किया गया है। मंगलवार का संबंध मंगल ग्रह से है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल को शक्ति, साहस और युद्ध का कारक माना गया है। हनुमान जी भी बल और पराक्रम के देवता हैं, इसलिए मंगल ग्रह की शांति और कृपा के लिए मंगलवार को उनकी पूजा की जाती है। इसलिए, मैंने आज के दिन को हनुमान जी - [आध्यात्मिक मूल्य भारतीय गणतंत्र की आत्मा](https://ushakaal.com/republicday-and-spirituality/): भारत का अभ्युदय एक आध्यात्मिक क्रांति है। यह कभी कोई साधारण भूखंड नहीं रहा, बल्कि साधना की इस भूमि पर ऋषि-संतों की परंपरा फली-फूली और यहीं से वैदिक वाणी प्रवाहित हुई। इस देश ने सदैव आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान और अंतर्यात्रा को भौतिक प्रगति से ऊपर रखा। इसी वजह से यह देश विश्व गुरु कहलाया। जब दुनिया के अन्य भू-खंडों पर साम्राज्यवादी विस्तार की भावना प्रबल थी, तब भी भारत की धरती पर विश्व बंधुत्व की भावना घनीभूत की जाती रही। यहां के ऋषि-मुनि जगत के कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहे और आध्यात्मिक उत्थान के जरिए मानवता को अंधकार - [बेहद शक्तिशाली है मॉ सरस्वती का बीज मंत्र](https://ushakaal.com/saraswati-mantra/): आप सबको मॉ सरस्वती की आराधना का महापर्व और वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं। शास्त्रों के मुताबिक, आज के दिन ही ब्रह्मा जी के आह्वान पर मॉ सरस्वती वीणा बजाती हुई इस धरा पर प्रकट हुई थीं। वीणा की ध्वनि के स्पंदन से मूक ब्रह्मांड झंकृत हो गया था और वाणी मिल गई थी। इसलिए माता को वागेश्वरी भी कहा गया है। आज हम चर्चा करेंगे उनके बीज मंत्रों पर, जो सर्वशक्तिमान है। जैसे एक विशाल वटवृक्ष का पूरा अस्तित्व एक सूक्ष्म बीज में समाहित होता है, वैसे ही माँ सरस्वती की संपूर्ण शक्तियाँ एकाक्षर बीज मंत्र ‘ऐं’ में होता - [आध्यात्मिक उत्क्रांति (Spiritual Emergency): अंतराग्नि का आंतरिक प्रवाह](https://ushakaal.com/spiritual-emergency1/): मनुष्य का जीवन केवल जैविक अस्तित्व तक सीमित नहीं है; उसके भीतर आत्मा की पुकार है जो उसे आत्म-साक्षात्कार और गहन रूपांतरण की ओर ले जाती है। यही पुकार कभी संकट जैसी प्रतीत होती है, पर वास्तव में यह आध्यात्मिक उत्क्रांति का द्वार है। मनुष्य केवल जैविक अस्तित्व नहीं है, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक सत्ता भी है। यह विचार मनोविज्ञान के अग्रणी चिंतक अब्राहम मैस्लो द्वारा प्रतिपादित किया गया था, जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार को मानव विकास की सर्वोच्च आवश्यकता माना। उनके अनुसार, आध्यात्मिक विकास की आकांक्षा मानव स्वभाव में अंतर्निहित होती है और यही उसे पूर्णता की ओर ले जाती है। - [प्राचीन विद्या मंदिरों का अक्स एक योग मंदिर](https://ushakaal.com/bihar-school-of-yoga-2/): बिहार की पावन भूमि और मुंगेर में उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर अवस्थित बिहार योग विद्यालय आधुनिक युग में ऋषि संस्कृति के पुनर्जागरण का महान केंद्र है। यह अपनी किस्म का इकलौता केंद्र है, जो पूरी तरह संन्यासियों द्वारा संचालित है। बीसवीं सदी के महान संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने यौगिक क्रांति के लिए जो संकल्प लिया था, उसकी पूर्णता का यह साक्षात गवाह है। जब इस योग विद्यालय की स्थापना की गई थी, तो उसके पीछे की अवधारणा यह थी कि योग को एक विज्ञान, एक जीवनशैली, एक विश्वास और मानवता की संस्कृति के रूप में मानव समाज - [स्वामी विवेकानंद : काल से परे एक जीवंत चेतना](https://ushakaal.com/swamivivekananda/): भारत माता ने आज के दिन स्वामी विवेकानंद के रुप में एक ऐसे सपूत को जन्म दिया था, जिन्होंने अल्पायु में ही प्रसुप्त भारतीय चेतना को झकझोरने के लिए सनातन धर्म को कर्मकांडों से निकालकर एक जीवंत, व्यावहारिक और राष्ट्र-निर्माण की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। परिणाम हुआ कि इस व्यावहारिक वेदांत के कारण भारतीय दर्शन को पुनर्जीवन मिला और सनातन धर्म आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का आधार बन गया। इससे विश्व पटल पर भारत का गौरव बढ़ा। जन्मजात संन्यासी स्वामी विवेकानंद इस निष्कर्ष पर थे कि प्रत्येक राष्ट्र का विश्व के लिए एक संदेश होता है, एक प्रेरणा होती है। - [आध्यात्मिक संजीवनी है योगी कथामृत](https://ushakaal.com/paramhamsa-yogananda/): भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को शिक्षा देते हैं कि कर्मफल की आसक्ति से व्यक्ति दुखी होता है। इसलिए कि भौतिकता आत्मा की अमरता को भुला देती है और पुनर्जन्म के चक्र में फंसाए रखती है। आधुनिक युग के मानव के पास जन्म-चक्र की परवाह नहीं। उसके तो रातो-रात येन-केन-प्रकारेन तमाम तरह के भौतिक हित पूरे हो जाने चाहिए। यही भौतिक लालसा मानसिक समस्याओं से दो-चार होने को मजबूर करती है। आधुनिक युग की इस सबसे बड़ी समस्या के कारण जीवन संकट में है। ऐसे में परमहंस योगानंद की शिक्षाओं की आज भी बनी हुई है। परमहंस योगानंद की शिक्षाओं में - [राष्ट्र का संदेश बने नववर्ष का संकल्प](https://ushakaal.com/new-year-2025/): भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपरा में ‘समय’ को केवल एक कैलेंडर की गणना नहीं, बल्कि ‘काल पुरुष’ के रूप में देखा जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में काल (समय) को जीवन की क्षणभंगुरता, विश्व के संहारक तथा चक्रीय प्रकृति का प्रतीक बताया गया है। इस लिहाज से योग और अध्यात्म के गहरे धरातल पर नववर्ष का आगमन केवल तिथि का परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना के नवीनीकरण का एक महापर्व है। ब्रह्मांडीय व्यवस्था के साथ लयबद्ध होने का महान अवसर है। यौगिक अनुशासन में ‘संकल्प’  का बहुत महत्व है। इसलिए, नववर्ष अपनी संकल्प शक्ति को दृढ़ करके मानसिक विकारों (काम, क्रोध, मद, लोभ) - [बिगड़े पाचन तंत्र के लिए यौगिक उपाय](https://ushakaal.com/digestive-systems/): सर्दियों में पेट की समस्याएं बढ़ जाना आम बात है। इसके कई वैज्ञानिक और जीवनशैली से जुड़े कारण होते हैं। शरीर का तापमान गिरने से लेकर खान-पान में बदलाव तक, सब कुछ हमारे पाचन तंत्र पर असर डालता है। ठंड के मौसम में शरीर अपनी ऊर्जा का उपयोग शरीर को गर्म रखने में अधिक करता है। इससे मेटाबॉलिज्म और पाचन क्रिया धीमी हो जाती है। जब खाना धीरे पचता है, तो पेट में भारीपन, गैस और ब्लोटिंग (पेट फूलना) जैसी समस्याएं होने लगती हैं। प्यास कम लगने के कारण शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाने और शारीरिक सक्रियता - [भावना जैसी भी हो, उत्तर तथास्तु!](https://ushakaal.com/be-what-you-want-to-be/): तथास्तु! यानी, जैसा तुम चाहते हो, वैसा ही हो। प्राचीन काल में बहुत नपा-तुला बोलने के आदी ऋषि-मुनि और देवता वरदान देने के लिए इसी शब्द का प्रयोग करते थे। इसके मुख्यत: तीन कारण थे। पहला तो यह कि उनमें ‘वाक-सिद्धि’ होती थी। जब कोई भक्त वरदान मांगता, तो ऋषि अपनी ऊर्जा को एक शब्द में केंद्रित करते थे – ‘तथास्तु’। यह एक तरह का ‘कमांड’ था जो ब्रह्मांड को दिया जाता था कि भक्त की इच्छा पूरी हो। दूसरी बात यह कि ‘तथास्तु’ के माध्यम से ऋषि अपनी तपस्या का एक अंश उस भक्त को दे देते थे, ताकि - [ओशो : कांटे भी फूल बन गए](https://ushakaal.com/osho-2/): ओशो कालजयी हैं, शाश्वत, सदैव प्रासंगिक हैं। पर, आधुनिक युग में जब कभी विवादस्पद आध्यात्मिक गुरुओं की बात आती है तो ओशो का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे अपने जीवनकाल में बेहद विवादास्पद रहे। क्यों? इसलिए कि उन्होंने पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और रूढ़ियों को सीधे चुनौती दी। सेक्स, राजनीति, धर्म और सामाजिक व्यवस्था जैसे संवेदनशील विषयों पर खुलकर बातें करते रहे। परिणाम स्वरुप उनके चाहने वालों की संख्या दुनिया भर में बढ़ती गई। यहां तक कि लंदन के “द संडे टाइम्स” ने उन्हें ‘1,000 मेकर्स ऑफ द ट्वेंटीएथ सेंचुरी” की सूची में शामिल किया था। वहीं दूसरी तरफ, - [गीता : आध्यात्मिकता का सुमधुर फल](https://ushakaal.com/geeta-jayanti/): श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत काल में जितनी स्फूर्तिदायक थी, आज भी उतनी ही है। यह मानव चेतना के लिहाज से एक ऐसा अनंत महासागर है, जिसकी गहराइयों में उतरने का प्रयास सदियों से मनीषी और विद्वान करते आए हैं। तभी कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में दिया गया गीता का ज्ञान आज प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों और कॉरपोरेट जगत के बोर्डरूम तक पहुँच चुका है। कमाल यह कि हजारों वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश आधुनिक विज्ञान और शोध की कसौटी पर न केवल खरा उतर रहा है, बल्कि उसे नई दिशा भी दे रहा है। भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक - [सत्य साईं बाबा : जीवन और विरासत](https://ushakaal.com/satya-sai-baba/): सर्वव्यापी और सर्वज्ञ श्री सत्य साईं बाबा के पावन जन्मशताब्दी वर्ष में हमें उनकी कौन-सी विरासत को हृदय से अपनाने और ग्रहण करने की लालसा रखनी चाहिए? इसलिए कि बाबा ने अपनी सारी सम्पदा, अपना समस्त ऐश्वर्य और दिव्य सामर्थ्य पहले ही हमें प्रदान कर रखा है। हम सब उनकी उस असीम सम्पदा के उत्तराधिकारी हैं, उनके वारिस हैं। हम सबका दायित्व है, हम उस असली ‘सम्पदा’ को निर्मल मन से ग्रहण करते जाएं। जन्मशताब्दी वर्ष में बाबा को यही विनम्र श्रद्धांजलि होगी। बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती कहते थे, “जैसे चंद्रमा को केवल चंद्रमा के प्रकाश - [सर्दियों के लिए आजमायी हुईं यौगिक विधियां](https://ushakaal.com/yoga-for-winter-season/): सर्दियों के मौसम में कई स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जाती हैं। अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, जोड़ों का दर्द, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी और विशेष रूप से उच्च रक्तचाप की समस्याएं सताने लगती हैं। वैसे तो उच्च रक्तचाप की वजहें और भी हैं। मुंबई की विख्यात चिकित्सक रह चुकीं बिहार योग विद्याय की संन्यासी और “यौगिक मैनेजमेंट ऑफ कैंसर” की लेखिका डॉ. स्वामी निर्मलानंद सरस्वती का कहना है कि धमनियों के सिकुड़ जाने से उच्च रक्तचाप और हृदयरोग को सीधा निमंत्रण मिलता है। सर्दियों के साथ ही, अस्वस्थ्यकर जीवन पद्धति और खानपान की वजह से आदमी मोटा होता है तो भी धमनियां सिकुड़ - [मधुमेह, योग और चिकित्सा विज्ञान](https://ushakaal.com/study-on-diabetes-mellitus/): योग की प्राचीन विद्या के पास मुधमेह की चिकित्सा का अधिक कारगर उपाय है, जो कि हजारों वर्ष पुराना है। यौगिक क्रियाओं द्वारा शरीर की आन्तरिक उत्पादन प्रक्रिया को पुनः सक्रिय कर शरीर-संरचना को संतुलित किया जा सकता है। बीसवीं सदी के महान योगी और विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने साठ के दशक में इस बात की घोषणा की थी तो मरीजों से लेकर चिकित्सक तक चौंक गए थे। पर, स्वामी जी यहीं नहीं रुके थे। उन्होंने अनेक वर्षों तक यौगिक क्रियाओं द्वारा मधुमेह का इलाज करने के उपरान्त एक पुस्तक प्रकाशित करके - [गुरु कृपा से प्रभु मिलते हैं, और प्रभु कृपा से गुरु](https://ushakaal.com/guru-shishya/): इसमें दो मत नहीं कि सद्गुरु की कृपा भगवान की विशेष अनुकंपा से ही प्राप्त होती है। मनुष्य जब तक संसार के आकर्षणों में रमा रहता है, तब तक उसे अपने भीतर के सत्य की खोज का भाव नहीं जागता। लेकिन जब वह भोगों, आकांक्षाओं और असफलताओं के अनुभवों से थक जाता है, तब धीरे-धीरे उसके भीतर वैराग्य का एक सूक्ष्म बीज अंकुरित होता है।यह वैराग्य ही आत्मा की जागृति का प्रथम संकेत है। संसार की क्षणभंगुरता जब स्पष्ट होने लगती है, तब मनुष्य की दृष्टि बाहर से हटकर भीतर की ओर मुड़ती है। उसी क्षण ईश्वर की प्रेरणा कार्य - [चिंता की मूल पर प्रहार हैं ये यौगिक उपाय](https://ushakaal.com/yoga-and-maharshi-patanjali/): हम सब बचपन से ही संत कबीर की साखी “चिंता से चतुराई घटे, दुःख से घटे शरीर” पढ़ते-सुनते बड़े हुए। वैदिक ग्रंथों में भी अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जिनसे ऐसे ही भाव प्रकट होते हैं। चतुराई के सामान्य अर्थ तो बुद्धि की तीक्ष्णता, कुशाग्रता, चालाकी आदि होते हैं। पर, वैदिक ग्रंथों से लेकर संत कबीर की वाणी तक में जिस चतुराई की बात की गई है, वह सही-गलत की पहचान करने वाली आंतरिक बुद्धि की बात है। जब मन चिंता में डूबा होता है, तो विवेक की मलिनता से चतुराई घटती है। जबकि चतुराई कैसी होनी चाहिए? संत कबीर अपनी - [सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण हेतु सुधांशु जी महाराज का अभियान](https://ushakaal.com/sudhanshu-ji-maharaj/):   भारत आज तेजी से आधुनिकीकरण की राह पर अग्रसर है। शहरों की चकाचौंध, तकनीकी क्रांति और वैश्वीकरण की लहरें जहां एक ओर जीवन को सुगम बना रही हैं, वहीं दूसरी ओर नैतिकता, सांस्कृतिक जड़ों और मानवीय संवेदनाओं का ह्रास हो रहा है। ऐसे में, राष्ट्र की शाश्वत नैतिक एवं सांस्कृतिक नींव से पुनः जुड़ने की एक सशक्त पहल उभर रही है। विश्व जागृति मिशन के संस्थापक आध्यात्मिक नेता सुधांशु जी महाराज द्वारा प्रारंभ किया गया ‘सनातन संस्कृति जागरण अभियान’ इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह अभियान सनातन धर्म की मूल भावना—करुणा, समन्वय और साझा मानवता—को आधुनिक सामाजिक - [अयोध्या को विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बनाने की कवायद](https://ushakaal.com/spiritual-capital-of-world/): अयोध्या की पहचान विश्व की आध्यात्मिक राजधानी के रुप में बन जाए, इसके लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या मास्टर प्लान 2031 की समीक्षा करते हुए कुछ ऐसा ही विजन प्रस्तुत किया है। उसके मुताबिक, कोशिश है कि अयोध्या में प्राचीन आस्था और आधुनिकता का अनुपम संगम हो जाए। योजना के तहत अयोध्या को ज्ञान, उत्सव और हरित ऊर्जा की स्मार्ट नगरी के रूप में विकसित किया जाएगा, जिसमें तीर्थयात्रियों के लिए सुगम बुनियादी ढांचा, विविध पर्यटन परिपथ, हेरिटेज वॉक और ऐतिहासिक सर्किट शामिल होंगे। विकास क्षेत्र को 18 जोनों - [छठ महापर्व : आस्था, भक्ति और ज्ञान का संगम](https://ushakaal.com/chhath/): लोक आस्था का महापर्व छठ पर्व अपने चरम पर है। माहौल सर्वत्र भक्तिमय है। इस महापर्व को लेकर कथाएं तो अनेक हैं। पर, आधुनिक युग के लिहाज से सबसे विश्वसनीय कथा यह है कि इस महापर्व ने प्रवासन और आधुनिकीकरण की चुनौतियों के बावजूद, अपनी आस्था की शक्ति से खुद को न केवल बचाए रखा है, बल्कि वैश्विक पहचान बना ली है। साथ ही लाखों लोगों को जड़ों से जोड़े रखकर साझी सांस्कृतिक पहचान प्रदान की है। आने वाले समय में यह महापर्व यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। सृष्टि के प्रारंभ - [असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय...](https://ushakaal.com/deepavali/): सारे पर्व-त्योहार इतिहास के पन्ने हैं। जब हम उन ऐतिहासिक घटनाओँ की याद में उत्सव मनाने हैं तो अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े रहते हैं। यौगिक दृष्टिकोण से इससे भी बहुमूल्य बात यह है कि जब हम उन ऐतिहासिक घटनाओँ के संदेशों को आत्मसात करते हुए अपनी चेतना का क्रमिक विकास भी करते हैं तो जीवन में पूर्णता आती है। बात शास्त्रसम्मत और विज्ञानसम्मत दीपावली की हो या लक्ष्मी व काली पूजन की, इन सभी मामलों में ये सिद्धांत ही काम करते हैं। पर, समय व देश-काल की प्रकृति के अनुरुप इन त्योहारों के साथ कई भ्रांत धारणाएं जुड़कर परंपरा - [श्री रामचंद्र उर्फ लाला जी महाराज का फलता-फूलता “सहज मार्ग”](https://ushakaal.com/sri-ramchandra-alias-lala-ji-maharaj/): एक सौ साठ देश… पाँच हज़ार ध्यान केंद्र… सोलह हज़ार प्रशिक्षक… और दो करोड़ साधक! यह महज़ आँकड़ा नहीं, बल्कि आठ दशकों से प्रवहमान उस यौगिक और आध्यात्मिक यात्रा की जीवंत कहानी है, जो भारत के एक छोटे से कस्बे से आरंभ होकर आज दुनिया भर के लोगों की जीवन-पद्धति का हिस्सा बन चुकी है। श्री रामचंद्र मिशन का अभियान उत्तर प्रदेश के फतेहगढ़ से विस्तार पाता हुआ यूरोप, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका तक फैल चुका है। दूसरी तरफ रामाश्रम सत्संग है, जो मथुरा के साथ ही देश-विदेशों के कई स्थानों पर लाखों अनुयायियों की आस्था - [जब योग के प्रचारक बन गए थे जेपी](https://ushakaal.com/loknayak-jaiprakash-narayana/): किशोर कुमार // हम सब मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान से तो परिचित हैं ही। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अधीन एकमात्र स्वायत्तशासी संगठन है, जिसका उद्देश्य एक केंद्रीय एजेंसी के रूप में योग अनुसंधान, योग चिकित्सा, योग प्रशिक्षण और योग शिक्षा को बढ़ावा देना है। नई पीढ़ी के ज्यादातर लोगों को पता नहीं होगा कि योग के इस मंदिर की स्थापना महान योगी स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी की परिकल्पना औऱ उनके श्रमसाध्य प्रयासों का प्रतिफल है। तब यह विश्वायतन योगाश्रम के रूप में जाना जाता था। पर मैं आज स्वामी धीरेंद्र ब्रह्मचारी की जीवनी भी लिखने नहीं बैठा हूं। - [पंडित छन्नूलाल मिश्र : बुझ गया एक दीपक](https://ushakaal.com/pandit-chhannulal-mishra/): हंस (आत्मा) उड़ गया। काया (शरीर) मुरझा गई। शास्त्रीय संगीत की एक सशक्त आवाज सदा के लिए खामोश हो गई। जो मृत्युलोक में आया है, उसकी यही गति होनी है। पर, शास्त्रीय गायन की विशिष्ट शैलियों के जरिए ईश्वर से सीधा संवाद करने वाले सुरों, रागों और नादयोग के मर्मज्ञ पंडित छन्नूलाल मिश्र का जाना एक भक्त के जाने जैसा है, जो तभी तक आगे की ओर गति करता है, जब तक कि वह परमात्मा तक पहुंच न जाए। सामान्यत: जाने वाले लौट भी आते हैं। बदले हुए स्वरुप के कारण हम उन्हें पहचान नहीं पाते। पुनर्जन्म का सिद्धांत यही - [विजयादशमी या दशहरे का आध्यात्मिक संदेश](https://ushakaal.com/dussehra-2/):   विजयादशमी का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है और इससे जुड़ी अनेक कथाएं भी हैं। बेशक, ये कथाएं अलग-अलग काल-खंडों के हैं। पर, इन कथाओं से इतना पता चलता है कि शुभ कार्य शुभ समय में ही होते हैं और सदैव असत्य पर सत्य की जीत होती है। त्रेतायुग से महानवमी के बाद विजयादशमी या दशहरा मनाए जाने की कथा श्रीराम से जुड़ी हुई है। श्रीराम ने नवरात्रि के दौरान देवी के नौ स्वरुपों की साधना करके दैवी कृपा प्राप्त की थी। ताकि आसुरी शक्तियों का नाश किया जा सके। श्रीराम को पता था कि सृष्टि के प्रारंभिक दिनों से - [योग विद्या, प्रार्थना की शक्ति और दुर्गापूजा](https://ushakaal.com/durgapuja/): दैवी शक्तियों की कथाएं सांकेतिक होती हैं। भारतीय संस्कृति में वैदिककालीन या उसके पूर्व की जितनी भी घटनाएं हैं, उनकी अभिव्यक्ति कथाओं और प्रतीकों के माध्यम से की गईं। उन कथाओं का सार इसमें है कि उनसे मिले संकेतों के आधार पर हम अपना जीवन किस तरह बेहतर बना पाते हैं। दुर्गासप्तसती की कथाओं से हमें पता चलता है कि माता रानी की दिव्य शक्ति से राक्षसी शक्तियों का संहार होता गया था। सृष्टि के आरंभिक दिनों की ये कथाएं हमारे मानस में रची-बसी हैं तो अकारण ही नहीं है। उन कथाओं के गहरे संदेश हैं। हमारी क्रमिक साधनाओं के - [नवरात्रि : देवी के शक्ति स्वरूपों का महापर्व](https://ushakaal.com/navratri/): नव संवत्सर की शुरुआत ही देवी की आराधना से होगी। सृष्टि की रचना देवी से हुई थी। ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीकात्मक रूप भी वे ही हैं। उपनिषद में कहा गया है कि पराशक्ति ईश्वर की परम शक्ति है। यही विविध रूपों में प्रकट है। आत्मज्ञानी संत प्राचीन काल से कहते रहे हैं कि देवी या शक्ति सभी कामनाओं, ज्ञान और क्रियाओं का मूलाधार है। अब वैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि प्रत्येक वस्तु शुद्ध अविनाशी ऊर्जा है। यह कुछ और नहीं, बल्कि उस दैवी शक्ति का एक रूप मात्र है, जो अस्तित्व के प्रत्येक रूप में मौजूद है। नवरात्रि के दौरान हम उसी - [अकथ कहानी सामूहिक चेतना की धरोहर रामलीला की](https://ushakaal.com/ramleela/): वाराणसी के रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला के बारे में तो आपने सुना ही होगा। ऐसी अनूठी रामलीला, जिसके लिए पूरा नगर ही विशाल रंगमंच बन जाता है। गंगा तट अयोध्या तो बड़ा मैदान जनकपुर और किले के पास का इलाका लंका बन जाता है। यह कोई दस दिनों तक चलने वाली रामलीला नहीं होती, बल्कि महीना भर राम कथाओं की प्रगति श्रीराम के जीवन की क्रमवार यात्रा के रूप में होती रहती है। बस, बाकी रामलीलाओं से अलग यह होता है कि रावण मारा नहीं जाता, बल्कि वह श्रीराम के चारणों में समर्पण कर देता है। सन् 1830 में काशी - [श्रृंगी ऋषि अवतार, ब्रह्मर्षि कृष्णदत्त जी महाराज](https://ushakaal.com/krishnadatt-maharaj/): तपस्या केवल बाहरी कठोर साधना नहीं है, बल्कि इन्द्रियों की शुद्धि, हृदय की पवित्रता और प्रभु से एकत्व का अनुभव ही वास्तविक तप है। इसी से ज्ञान की प्राप्ति होती है। वही अमृत है, वही मुक्ति है। छांदोग्य उपनिषद, कठोपनिषद और श्रीमद्भगवतगीता जैसे ग्रंथों की गूढ़ बातें ब्रह्मर्षि कृष्णदत्त जी महाराज शवासन शवासन की अवस्था में ठीक वैसे ही सुना रहे थे, जैसे दिव्य दृष्टि वाले संजय महाभारत की घटनाओं का आंखों देखा हाल सुना रहे थे।   ऐसा कोई पहली बार नहीं था। बाल्यावस्था से ही वे जब कभी शवासन में होते, तो उनकी स्थिति योग समाधि जैसी बन - [परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती : लौट आइए हे महायोगी!](https://ushakaal.com/sannyasa-diwas/): बीसवीं सदी के महानतम संत और विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की महासमाधि के पंद्रह साल पूरे होने को हैं। उन्होंने पांच दिसंबर की मध्यरात्रि में महासमाधि ली थी। शिष्यों से वादा करके गए थे – “आऊंगा जरुर, रिटर्न टिकट लेकर जा रहा हूं।“ उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती तो सदैव उनकी दिव्य उपस्थिति महसूस करते हैं। पर, दुनिया भर में फैले शिष्यों की आंखें अपने गुरू को बाल रुप में सर्वत्र तलाशती रहती हैं। किसी भूखे-नंगे बच्चे की आंखें या मुख परमहंस जी से मिलती-जुलती दिख जाएं तो भावनाएं हिलोरे लेने - [स्वामी शिवानंद सरस्वती : अद्भुत प्रेरणादायी संत](https://ushakaal.com/swami-sivananda-saraswati-3/): कोई लाख करे चतुराई, करम का लेख मिटे न रे भाई…. छह दशक पहले कवि प्रदीप का गाया यह गीत आज भी लोगों की जुबान पर आ ही जाता है। खासतौर से तब, जब व्यक्ति कठिन दौर से गुजर रहा होता है। वैदिक ग्रंथों में भी प्रसंग है कि कर्म का फल भोगे बिना करोड़ों कल्प में कर्म क्षीण नहीं होता। चित्तगुप्त या चित्रगुप्त के बारे में भी यही मत है कि वे कर्मों के भले-बुरे प्रभावों का न्यायपूर्ण लेखा-जोखा रखते है, और प्रत्येक व्यक्ति को उसी अनुसार फल मिलता है। लेकिन, बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती - [श्रील प्रभुपाद और उनकी सूक्ष्म शक्तियों का असर](https://ushakaal.com/srila-prabhupada/): आत्मज्ञानी संतों की सूक्ष्म ऊर्जा हमें हर पल, हर क्षण स्पंदित करती है और सत्कर्मों के लिए प्रेरित करती है। इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णाकांशसनेस (इस्कॉन) की स्थापना करके कृष्ण-भक्ति आंदोलन के जरिए दुनिया भर में छा जाने वाले श्रीमूर्ति श्री अभयचरणारविन्द भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपादजी इसके उदाहरण हैं। वे यदि भौतिक शरीर में होते तो आज 129 वर्ष पूरे कर चुके होते। उनकी महासमाधि के भी लगभग 47 साल होने को हैं। पर, उनकी सूक्ष्म ऊर्जा की शक्तियां भक्तों को उनकी उपस्थिति का सदैव अहसास कराती रहती है, प्रेरित करती रहती हैं। इसे कुछ उदाहरणों से समझिए। आध्यात्मिक फिल्म “महावतार - [कैवल्यधाम योग संस्थान : योग और विज्ञान का संगम](https://ushakaal.com/kaivalyadham-lonavla/): महाराष्ट्र के योगी स्वामी कुवल्यानंद यौगिक क्रियाओं से मिलने वाले परिणामों को विज्ञान की कसौटी पर भी सिद्ध करके भारत के साथ ही पश्चिमी देशों में भी ख्याति अर्जित कर रहे थे। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को खुद ही कुवल्यानंद जी के योगाश्रम कैवल्यधाम में जाकर उनकी उपलब्धियों का साक्षी बनना चाहते थे। लिहाजा वे महाराष्ट्र के लोनावाला पहुंच गए, जहां कैवल्यधाम आकार ले रहा था। वे स्वामी जी की उपलब्धियों से बेहद खुश हुए। पर तुरंत ही उन पर संशय के बादल उमड़ने-घुमड़ने लगे। दरअसल, उन्हें आश्रम में पता चला कि स्वामी जी को अमेरिका में - [योग से होगा भटके बाल मन का उद्धार](https://ushakaal.com/sexual-harassment/): अवयस्क छात्र-छात्राओं में बढ़ी हिंसक प्रवृत्तियां अब आम है। अक्सर बाल अपराध से जुड़ी कोई न कोई वीभत्स घटना अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। यौन अपराध तो चरम पर है। ताज़ा राष्ट्रीय आँकड़े बताते हैं कि देश में नाबालिग लड़कों द्वारा नाबालिग लड़कियों के खिलाफ यौन अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। समाज शास्त्री इसकी प्रमुख वजह इंटरनेट, सामाजिक बदलाव, नैतिक शिक्षा की कमी, जागरूकता का अभाव आदि मानते हैं। पर, योग के परमहंसों की मानें तो बच्चों की हिंसक प्रवृत्तियां केवल बाह्य कारकों का परिणाम नहीं, बल्कि इसमें आंतरिक बदलावों की विशिष्ट भूमिका है। कैसे? जरा इसके विज्ञान - [‘वैरिकोज वेंस’ के लिए बड़े काम हैं ये योगासन](https://ushakaal.com/varicose-vens/): खतरे की घंटियों की हमने अनदेखी की। अब जीवन की धाराएँ ही अवरुद्ध होने लगी हैं। जी हां, वैरिकोज वेंस के कारण देश की पच्चीस फीसदी आबादी का जीवन तबाह है। पैरों की नीली, बैंगनी या लाल हो कर सूज चुकी नसें, पैरों और घुटनों से लेकर कमर तक के दर्द जीवन में जहर घोल रहे हैं। इंडियन वेन कांग्रेस 2024 की मानें तो वैरिकोज वेंस वाले लोगों की संख्या तीस फीसदी तक हो सकती है। एलोपैथी और आयुर्वेदिक पद्धतियों में तो इसका निदान है। पर, विभिन्न शोधों से पता चला है कि​ वैरिकोज वेंस, जिसे अपस्फीत शिरा या वेरिकोसाइटिस​ - [श्री अरविंद : भारत के रत्न, राष्ट्रवादी संत](https://ushakaal.com/sri-aurobindo-2/): अक्सर मन में ख्याल आता है कि जब विदेशियों को लगा था कि महान राष्ट्र नायक, स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरणा स्तंभ और अद्वितीय आध्यात्मिक चेतना के अग्रदूत श्री अरविंद घोष नोबेल पुरस्कार के हकदार हैं, तो भारत सरकार को उन्हें “भारत रत्न” से विभूषित करने का ख्याल क्यों नहीं आया? भारत सरकार ने सन् 1992 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को मरणोपरांत भारत रत्न देने की घोषणा की थी। यह अलग बात है कि उनके परिवार ने कुछ कारणों से इस सम्मान को लेने इंकार कर दिया था। पर उसी नेताजी ने अपने पत्र में लिखा था – “अरबिंदो घोष - [माता जानकी, प्रयागदास और रक्षाबंधन : अनोखी कथा](https://ushakaal.com/raksha-bandhan/): श्रावण का महीना था। गांव में रक्षाबंधन का दिन आया। हर बहन अपने-अपने भाई के हाथ पर राखी बाँध रही थी। कहीं हँसी के ठहाके, कहीं मिठाई की खुशबू। पर उस दिन एक कोना ऐसा भी था, जहाँ सात साल का छोटा-सा लड़का प्रयागदास अपनी माँ के पास बैठा, उदास होकर रो रहा था। “माँ… मुझे किसी ने राखी नहीं बाँधी!” माँ ने धीरे से कहा, “बेटा, तुम्हारी कोई बहन नहीं है…” बालक का सीधा-सा सवाल, “माँ! जब सबके पास हाथ-पाँव, नाक-कान हैं और बहन है… तो मेरी बहन क्यों नहीं?” माँ कुछ पल चुप रहीं, फिर बोलीं, “तुम्हारी भी - [षट्कर्म : शुद्धि से सिद्धि तक की सीढ़ी](https://ushakaal.com/shatkarma-2/): संत मत है कि घटशुद्धि से ही घटरूपी शरीर हठयोग साधना के योग्य होता है। घट की शुद्धि बिना यह कच्चे घड़े के समान है। यह लेख उसी घटशुद्धि के लिए षट्कर्म रुपी योग विद्या का विज्ञान बताने के लिए है। लेकिन पहले नाथपंथ के सिद्ध योगी चौरंगीनाथ से जुड़े एक प्रसंग पर गौर फरमाइए। चौरंगीनाथ को तमाम कोशिशों के बावजूद योग साधनाओं में सफलता नहीं मिल पा रही थी। तब गुरु को अपनी व्यथा सुनाई। कौन थे गुरु? मत्स्येंद्रनाथ? ज्ञानेश्वरी जैसे ग्रंथ में मत्स्येंद्रनाथ के बाद तथा गोरखनाथ के पहले गुरु-शिष्य परंपरा में चौरंगीनाथ का नाम आता है। दूसरी तरफ कई जगहों पर - [नागपंचमी और उसके आध्यात्मिक आयाम](https://ushakaal.com/nag-panchami/): अद्भुत! जीव-जंतुओं में भी ईश्वर का प्रतिरूप और उसकी पूजा! इसका मर्म वे क्या जानेंगे, जो जड़ों से कट गए और भारत को सपेरों का देश मानने लगे थे। पर, भारत जैसा आध्यात्मिक देश तो अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। वह जिस तरह राम और रावण में फर्क जानता है, उसी तरह नाग के गुण-दोष को भी समझता है। उसे मालूम है कि वासुकि नाग में विष भरा है तो अमृत निकालने के काम भी वही आता है। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। त्रिगुणायत मानवों को ही देख लीजिए। उसमें एक तरफ शील है, मर्यादा - [पराजयवादी प्रवृत्ति को परास्त करो - यही मंत्र संबल बना](https://ushakaal.com/bharat-ratna-apj-abdul-kalam/): “मैं आपको अपने जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना के बारे में बताना चाहता हूँ, जो 1958 में घटी। आप में से कुछ ने इसे मेरी पुस्तक ‘विंग्स ऑफ फायर’ में पढ़ा होगा। लेकिन यहाँ उपस्थित युवाओं के लिए, जिन्होंने यह पुस्तक नहीं पढ़ी, मैं इसे दोहराना चाहूँगा। जब मैं एक छोटा बालक था, मेरा सपना था कि मैं उड़ान भरूँ। मेरे पास एक अद्भुत शिक्षक थे, शिवसुब्रमण्या अय्यर, जिन्होंने मुझे विज्ञान की ओर प्रेरित किया और उड़ान से संबंधित कुछ करने का विचार दिया। इसलिए मैंने वैमानिकी अभियांत्रिकी में प्रवेश लिया और 1957 में स्नातक हुआ, जो बहुत समय पहले - [कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बदलता यौगिक परिदृश्य](https://ushakaal.com/integration-of-ai-in-yoga/): कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले योग प्रशिक्षक अब हमारी आपकी दहलीज पर दस्तक देने लगे हैं। एआई अनुकूलित यौगिक उपायो के रुप में उनकी कोंपलें निकल आई हैं। इसके कारण भारत सहित दुनिया भर में योग का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। योगशास्त्रों में योग का अंतिम लक्ष्य आत्मोत्थान कहा गया है। पर, दुनिया भर में ज्यादातर लोग स्वास्थ्य कारणों से योगाभ्यास करते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अनुकूलित योग उपायों से स्वास्थ्य संवर्द्धन की चाहत वाले योगाभ्यासियों का कितना हित होगा? कही ऐसा तो नहीं होगा कि एआई अनुकूलित यौगिक उपाय योग विद्या के - [डिजिटल युग के लिए वरदान है त्राटक](https://ushakaal.com/tratak/): स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डिजिटल उपकरण हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ये तकनीकें हमें दुनिया से जोड़ती हैं। लेकिन इसका बुरा प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। हमारा शरीर केवल मांस, हड्डियों और रक्त का बना कोई यंत्र नहीं, बल्कि अत्यंत सुसंवेदनशील, सजग और लयबद्ध तंत्र है, जो हमारी प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया से प्रभावित होता है। इसलिए, डिजिटल आदतें न केवल हमें थकाती हैं, बल्कि नींद, खुशी और एकाग्रता के लिए आवश्यक सेरोटोनिन और मेलाटोनिन जैसे रसायनों का संतुलन बिगड़ जाता है। छोटे बच्चों का मनोविकार से ग्रस्त होना इस बात का प्रमाण है। ऐसे में योग - [अठारह शिव मंदिरों का अद्भुत विज्ञान!](https://ushakaal.com/shiva-shakti-aakash-rekha/): श्रावण महीना हिंदू धर्म में भगवान शिव की भक्ति के लिए विशेष रूप से पवित्र माना जाता है। यह महीना भक्ति, तपस्या, और आध्यात्मिक साधना के लिए समर्पित है, क्योंकि इस समय प्रकृति और मानव चेतना का तालमेल विशेष रूप से शक्तिशाली होता है। पर, शिव-शक्ति आकाश रेखा पर अवस्थित मंदिरों का विशेष आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। ये मंदिर न केवल भगवान शिव और शक्ति के प्रतीक हैं, बल्कि प्राचीन भारतीय यौगिक विज्ञान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ मानव जीवन के संबंधों को भी दर्शाते हैं। जरा सोचिए, हज़ारों साल पहले, जब न कोई उपग्रह था, न जीपीएस, न - [परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती : ऐसे मिल गए थे गुरु](https://ushakaal.com/paramhamsaji/): आध्यात्मिक खोज का पथ कभी सुगम नहीं होता। यह एक ऐसी यात्रा है, जो हृदय की गहराइयों से शुरू होती है और अनंत की ओर बढ़ती है। बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उनका जन्म एक जमींदार परिवार में हुआ था। पिता पुलिस अधिकारी थे। किशोरावस्था में ही उनके मन में आध्यात्मिक जिज्ञासा ने जन्म ले लिया था। संसार की क्षणभंगुरता और जीवन के गहरे अर्थ की खोज ने उन्हें बेचैन कर दिया। लिहाजा, घर की सुख-सुविधाओं का परित्याग कर सत्य की तलाश में निकल पड़े थे। वे सबसे पहले - [पूर्णिमा किसकी, गुरू की या शिष्य की?](https://ushakaal.com/guru-purnima/): वैदिक परंपरा में गुरु को वह प्रकाश माना गया है, जो शिष्य के जीवन से अज्ञान के अंधेरे को दूर करता है। चाहे वह आदियोगी शिव हों, ऋषि वशिष्ठ हों, भगवान श्रीकृष्ण हों, आद्यगुरू शंकराचार्य हों, या द्रोणाचार्य, सभी ने अपने शिष्यों को न केवल ज्ञान दिया, बल्कि उन्हें जीवन के उच्च आदर्शों, धर्म, और कर्तव्य के प्रति जागरूक किया। गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह दिन गुरु के प्रति कृतज्ञता, सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने का अवसर है। अच्छी बात यह है कि - [अद्भुत अवतार, जय श्री जगन्नाथ!](https://ushakaal.com/jaishree-jagannath/): भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा तो हर साल होती है। पर उनका नवकलेवर तभी होता है, जब हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास में अधिक मास (दो आषाढ़ मास) पड़ता है, जो आमतौर पर 8, 12, या 19 वर्षों के अंतराल पर होता है। उदाहरण के लिए, सन् 2015 में नवकलेवर हुआ था, तो यह संयोग सन् 2034 में बनने की संभावना है। फिर भी समस्त जड़ और चेतन के स्वामी, जगत के नाथ श्री जगन्नाथ का नवकलेवर चर्चा में है। इसकी वजह बनी है नवकलेवर पर निर्मित फिल्म। वैसे तो भगवान जगन्नाथ की महिमा पर आधारित कई फिल्में बन चुकी हैं। इनमें कोई पंद्रह भाषाओं - [आसन, प्राणायाम से आगे की बात](https://ushakaal.com/yoga-achievements/): प्राचीनकाल में जिस योग और वैदिक ज्ञान की अखंड धारा ने भारत को ‘विश्वगुरु’ का गौरव प्रदान किया था, आज उसी अमर परंपरा को पुनर्जीवन मिलता दिख रहा है। 11वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर इसकी झलक दिखी, जब भारत ने योग को केवल आसन-प्राणायाम तक सीमित न रखकर, एक समग्र जीवनदर्शन के रूप में विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया। काल के प्रवाह में क्षीण हुई ज्ञान-गंगा, जो मानवता को सत्य, शांति और सामंजस्य की ओर ले जाती थी, योग के माध्यम से पुनः प्रवाहित होती दिखी। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के अनुरुप है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रारंभ - [जो वश में नहीं, उसके लिए प्रार्थना ही संबल  ](https://ushakaal.com/gujarat-planecrash/): उन्नीसवीं सदी में भक्ति परंपरा के महान संत स्वामी रामानंद में भक्तिभाव रखने वाले व्यापारी पिपा समुद्री मार्ग से यात्रा पर थे। अचानक, आसमान काला पड़ गया। बादल गरजने लगे, और समुद्र में भयंकर तूफान उठ खड़ा हुआ। लहरें ऐसी उछल रही थीं, मानो जहाज को निगल लेना चाहती हों। तभी पिपा जी का ध्यान गुरू और अराध्य श्रीराम पर गया। उनकी आर्त पुकार का असर हुआ कि वो तूफान, जो अभी-अभी सब कुछ उजाड़ने को तैयार था, धीरे-धीरे शांत हो गया। लहरें थम गईं और बादल छट गए। जहाज सुरक्षित किनारे पर पहुँच गया। भक्तमाल की टीका में प्रियादास - [अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस : उपलब्धियां और संकल्प](https://ushakaal.com/idy2025/): जब दुनिया भर में अशांति है और एक दूसरे पर गोला-बारूद बरसाए जा रहे हैं, वैसे में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीमें अक्सर चौंकाती हैं। कभी ‘वसुधैव कुटुम्बकम के लिए योग‘ थीम होती है तो कभी “एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग।” विदेशी आक्रमणकारियों ने सदैव भारत को क्षति पहुंचाने की कोशिश की। बावजूद, “वसुधैव कुटुंबकम” की भारतीय अवधारणा की जड़ें कमजोर होने के बजाय गहरी ही होती गईं। स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद, स्वामी रामतीर्थ, परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती, महर्षि महेश योगी जैसे आत्मज्ञानी संतों कभी अपने को दायरे में नहीं रखा, बल्कि योग और अध्यात्म की शक्ति से - [कौन ठगवा नगरिया लूटल हो...](https://ushakaal.com/sant-kabir-2/): कौन ठगवा नगरिया लूटल हो… चंदन काठ के बनल खटोला, ता पर दुलहिन सूतल हो… कौन ठगवा नगरिया लूटल हो… भक्तिकाल के अनूठे संत कबीर दास का यह निर्गुण भजन सुनते ही मन की गहराइयों में उतर जाता है। इसकी हर पंक्ति आत्मा को झकझोरती है और जीवन की नश्वरता का सत्य सामने लाती है। पद्मश्री प्रह्लाद सिंह टिप्पनिया और भारती बंधु जैसे लोक गायकों से लेकर शास्त्रीय संगीत के महान गायक कुमार गंधर्व तक, सभी ने इस भजन को अपनी आवाज में अमर किया। लेकिन जब सन् 1984 में अमोल पालेकर की फिल्म “अनकही” के लिए आशा भोसले ने - [योगनिद्रा : इस संक्षिप्त वीडियो में छिपा है बेहतर स्वास्थ्य का खजाना](https://ushakaal.com/yoganidra-3/): सन् 1918 की बात है। उस समय के लिहाज से लंदन में एक अनूठी घटना घटी थी। एक चार वर्षीय बालक जॉन हक्सले अन्य बच्चों के साथ खेलते-खेलते अचानक चिल्लाने लगा – “मेरे पिता का दम घुटा जा रहा है, उन्हें बचाओ। वे एक कोठरी में बंद हैं और उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है।“ इतना कहते-कहते जॉन हक्सले बेहोश हो गया। पर होश आते ही वह बोल पड़ा – “अब पिता जी ठीक हो जाएंगे।“ जब यह घटना घटी थी, तब जॉन हक्सले के पिता द्वितीय महायुद्ध में फ्रांस के मोर्चे पर लड़ रहे थे। युद्ध समाप्त - [संत कबीर :  मन मस्त हुआ तब क्यूँ बोले!](https://ushakaal.com/sant-kabir/): भक्तिकाल के महान और अनूठे संत कबीर दास भारतीय योग परंपरा के एक अनमोल रत्न हैं। उनका जीवन एक ऐसी रोशनी की तरह था, जो लोगों को सच्ची भक्ति का मार्ग दिखाता था। वे स्वयं भक्ति में लीन रहते थे और दूसरों को भी प्रभु के प्रति प्रेम और समर्पण का रास्ता सिखाते थे। उन्होंने साबित किया कि बिना भक्ति के कोई भी धार्मिक कार्य, जैसे योग, यज्ञ, व्रत या दान निष्फल है। उन्होंने ब्रह्म को नाद (दिव्य ध्वनि) का स्वरूप माना और आत्मानुभूति के आधार पर घोषणा की कि नादयोग साधना ब्रह्म की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग है। संत - [गर्भावस्था में योगाभ्यास : वैज्ञानिक दृष्टिकोण](https://ushakaal.com/prenatal-yoga/): मातृत्व की कोमल भावभूमि में जीवन का अंकुर प्रस्फुरित होना प्रकृति की चिरंतन लीला का एक दिव्य अनुष्ठान है। यह सृष्टि का सनातन विधान है, जहाँ प्रेम, त्याग और संरक्षण की छाया में नया जीवन आकार लेता है। जब मातृत्व की यह भावभूमि योग के प्रकाश से आलोकित होती है, तो ब्रह्मी चेतना का विकास होता है, जो आनंदमय जीवन और संतुलित समाज का आधार बनता है। भारतीय दर्शन में गर्भसंस्कार का विशेष महत्व है। मान्यता है कि गर्भकाल में माता के विचार, भावनाएँ और कर्म गर्भस्थ शिशु की मानसिकता, संस्कार और भविष्य के व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करते - [कोरोना : फिर योग बनेगा संकटमोचक](https://ushakaal.com/covid19-and-yoga/): भारत में कोविड-19 के मामले एक बार फिर तेजी से बढ़ रहे हैं। चार साल पहले इस अनजान बीमारी ने लाखों लोगों की जान ली थी, और आज भी इसके दंश को लोग झेल रहे हैं। एक तरफ फेफड़े की बीमारियां तेजी से बढ़ गई तो दूसरी ओर हृदयाघात आम बात हो गई है। ऐसे में, फिर से कोरोना ने दस्तक दी है तो चिंता की लकीरें खिंच जाना वाजिब ही है। इसके साथ ही योग को फिर से एक प्रभावी हथियार के रूप में देखा जाने लगा है। इसलिए कि कोरोनाकाल में षट्कर्मों में विशेष तौर से नेति व - [प्राणायाम नहीं है अनुलोम-विलोम](https://ushakaal.com/pranayama/): https://ushakaal.com/wp-content/uploads/2025/05/भ्रामरी-और-नाड़ी-शोधन-प्राणायाम.mp4 - [त्रिकालदर्शी संत श्री उड़िया बाबा की भविष्यवाणी](https://ushakaal.com/paramhams-udiya-baba/): वैदिक साक्ष्य इस बात के प्रमाण हैं कि महाभारत में संजय ने दूर बैठकर अपनी दिव्य-दृष्टि से कुरुक्षेत्र के युद्ध की सजीव व्याख्या की थी। सनातन काल से अनेक संत-महात्मा अपनी अंतर्दृष्टि के बल पर भविष्य की झलक पाते रहे हैं। परमहंस श्री उड़िया बाबा ने 1940 के दशक में भविष्यवाणी की थी कि पाकिस्तान का पतन होगा, यानी इसके निर्माण से पूर्व ही इसके भविष्य की झलक पा ली थी। ज्योतिषियों ने भी ऐसी ही भविष्यवाणियाँ की। आज जैसे हालात उभर रहे हैं, लोगों का यह विचार बलवती होता जा रहा है कि क्या यही वह कालखंड है, जिसका - [Yoga, Tantra & Spirituality - Explained!!](https://ushakaal.com/yoga-tantra-spirituality-explained/): In this powerful and eye-opening episode of the Discovery of an Author podcast, host Raghav Sharma is joined by renowned scholar, author, and spiritual teacher Dr. Raj Balkaran, as they dive deep into the mythological, philosophical, and spiritual origins of yoga asanas—drawing from Dr. Balkaran’s latest book “The Stories Behind the Poses.” Dr. Balkaran, with his rare combination of academic rigor and traditional spiritual training, shares insights from the ancient Puranic stories and reveals the fascinating mythic roots of the postures practiced in modern yoga studios today. Together, we explore how yoga is far more than just physical movement—it is - [Undestanding Rigveda's And It's Secrets](https://ushakaal.com/understanding-rigveda-and-its-secret/): In this insightful episode of Discovery of an Author, host Raghav Sharma is joined by ISRO scientist Mr.Jijith Nadumuri Ravi. The Rigveda is one of the oldest known scriptures of humanity—but how much do we really understand about its origins, geography, mantras, and deeper meaning? In this episode of Discovery of an Author, we sit down with Jijith Nadumuri Ravi, a former ISRO space scientist and now a dedicated researcher of the Rigveda, Rāmāyaṇa, and Mahābhārata, to explore it all. Jijith brings a fresh, scientific lens to this ancient Vedic text, helping us decode the Rigveda in modern context—from who - [Masterclass on Yoga Sutra's teaching](https://ushakaal.com/masterclass-on-yoga-sutras-teaching/): इस प्रेरणादायी एपिसोड में, डिस्कवरी ऑफ एन ऑथर के मेजबान राघव शर्मा के साथ स्वामी नीलकंठ महादेव शामिल हैं। क्या आप पतंजलि के योग सूत्रों के सच्चे अर्थ की खोज में हैं? यह वीडियो योग सूत्रों, उनके दर्शन, सिद्धांतों और आधुनिक योग अभ्यास पर उनके प्रभाव को समझने के लिए आपका पूर्ण मार्गदर्शक है। चाहे आप नौसिखिया हों या उन्नत योगी, यह गहन अध्ययन आपको पतंजलि की शिक्षाओं को एक-एक सूत्र के माध्यम से समझने में मदद करेगा। - [बिहार योग और मेरी यौगिक साधना](https://ushakaal.com/yoga-sadhna/): विदुषी तोमर // ग्यारह मई मेरे जीवन की उन दुर्लभ स्मृतियों में से एक बन गया है, जिसे मैं शब्दों में समेटने की कोशिश तो कर रही हूँ, पर शायद ये अनुभव शब्दों से कहीं आगे की बात हैं। हमने दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में बिहार स्कूल ऑफ योग द्वारा आयोजित साधना सत्र में भाग लिया। जैसे ही उस पावन परिसर में कदम रखा, लगा जैसे किसी और ही लोक में प्रवेश कर लिया हो—वहाँ की शांति, वहाँ के लोग, वहाँ का वातावरण… सब कुछ भीतर तक छू गया। हर चेहरा एक अलग तरह की शांति बिखेर रहा था। वहाँ - [शक्तिशाली है योग विद्या का नया अवतार](https://ushakaal.com/the-second-chapter-of-yoga/): मनुष्य की अनूठी क्षमता है कि वह अपने विचारों के अनुरूप परिवर्तित हो सकता है। जीवन में दो प्रक्रियाएँ हैं, बनना यानी साधना के माध्यम से नए गुण अपनाना और होना यानी उन गुणों की अभिव्यक्ति। व्यक्तित्व का निर्माण समाज, संस्कृति, शिक्षा और प्रकृति की छह शक्तियों यथा, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मात्सर्य से होता है। ये शक्तियां शुरू में मित्र के रूप में व्यक्तित्व को आकार देती हैं, लेकिन अनियंत्रित होने पर शत्रु बन जाती हैं। जब मन और आत्मा का संबंध जुड़ता है, तो ये शक्तियाँ विकास में बाधक लगने लगती हैं। संयम के माध्यम से इन्हें नियंत्रित, संशोधित और उत्कृष्ट किया जा सकता है। कैसे? क्या घंटों - [योग और स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती](https://ushakaal.com/swami-chinmayananda-saraswati-2/): अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस अगले महीने ही है। उसे व्यापक स्तर पर मनाने की तैयारियां जोर-शोर से की जा रही हैं। जोर इस बात पर है कि शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए योगाभ्यास किया जाना चाहिए। योग के जरिए ईश्वरानुभूति की बात आम आदमी के संदर्भ में बेमानी प्रतीत होती है, इसलिए यह मुद्दा गौण प्राय: ही है। पर बीसवीं सदी के महान संत स्वामी शिवानंद सरस्वती और योग की कुछ अन्य परंपराओं के साधक सदैव योग का अंतिम लक्ष्य ईश्वर-दर्शन मानते रहे हैं। आज भी स्वामी सत्यानंद सरस्वती, स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती, स्वामी नित्यानंद आदि योग परंपराओं में योग का - [योग : अथ द्वितीयोऽध्यायः](https://ushakaal.com/yoha-the-2nd-chapter/): हर महान यात्रा में एक नया मोड़ आता है। योग के द्वितीय अध्याय के रुप में वह मोड़ आ चुका है, जो अभी-अभी अपने प्रारंभिक कदमों के साथ विश्व के सामने उभर रहा है। जब भगवान राम को वनवास का आदेश मिला था, तो वह एक मोड़ था, नया अध्याय था, जो उन्हें राजसुख छोड़कर सत्य, धर्म और सेवा के पथ पर ले गया। उनकी यह यात्रा केवल व्यक्तिगत त्याग की नहीं, बल्कि समाज के कल्याण और अधर्म पर धर्म की विजय की थी। इसी तरह योग के मामले में भी एक नया मोड़ आया तो नए अध्याय की शुरुआत - [The Final Farewell: Understanding the Last Rites and Rituals of India’s Major Faiths](https://ushakaal.com/the-final-farewell/): In this episode of Discovery of an Author, host Raghav Sharma is joined by author Dr Minakshi Dewan. Together, they journey through the diverse and deeply rooted traditions surrounding death in India’s major religions. On the way, the duo explore the symbolism and stories behind these rituals, the evolving roles of women in these practices, and the slow yet significant reforms shaping this sacred space. The author also discusses the loss that led her to research and write on this profound subject. We discuss the caste-based roles entrenched in these rituals, highlighting how the most menial and challenging tasks often - [आतंकवाद : आत्मा से विमुख मन की त्रासदी](https://ushakaal.com/pahalgam-terror-attack/): जब मनुष्य अपने आत्मस्वरूप — सत्य, करुणा और विवेक से विमुख हो जाता है, तब वह हिंसा और विनाश के पथ पर बढ़ता है। आतंकवाद इसी आत्म-विमुखता का चरम रूप है। यह केवल एक राजनीतिक षड्यंत्र या सामाजिक विद्रोह नहीं, बल्कि उस सनकी मनोभाव का विस्फोट है, जिससे घृणा, क्रोध और वैचारिक कट्टरता मनुष्य की चेतना पर पूरी तरह हावी हो जाते हैं। आतंकवाद केवल एक सामाजिक या राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक विकृति है। यह घृणा, क्रोध, और वैचारिक कट्टरता से उपजा वह सनकी मनोभाव है, जो संज्ञानात्मक पक्षपात और भावनात्मक असंतुलन का शिकार होकर - [पृथ्वी : अध्यात्म की धरा, जीवन की जननी](https://ushakaal.com/earthday-and-spirituality/): अब यह कोई रहस्य नहीं रहा कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं में ध्यान यानी मेडिटेशन मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक संतुलन का सरल, प्रभावी उपाय है। चाहे मानसिक तनाव कम करना हो, एकाग्रता बढ़ानी हो, भावनात्मक संतुलन बनाना हो, स्वास्थ्य जीवन जीना हो या आत्म-खोज के मार्ग पर आगे बढ़ना हो, ध्यान ही इन सबकी कारगर और आजमायी हुई दवा है। जीवन में ध्यान घटित हो, इसके लिए हमारे संतों और योगियों ने अनेक मार्ग सुझाए, अनेक विधियां बतलाई, जो उनके अनुभवों पर आधारित हैं और आधुनिक विज्ञान भी उन विधियों की पुष्टि करता है। पर, आज पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) - [भारतीय आध्यात्मिक धरोहर को वैश्विक मान्यता](https://ushakaal.com/unesco/): भारतीय वैदिक ग्रंथों के संदेश पूरी प्रामाणिकता के साथ धरोहर के रूप में संरक्षित रहे, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है? भारत कभी विश्व गुरू अपनी बौद्धिक धरोहर की बदौलत ही था। आधुनिक युग में भी हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी धरोहर को न केवल संरक्षित करें, बल्कि उसे गर्व के साथ विश्व पटल पर स्थापित करें। इस लिहाज से विश्व धरोहर दिवस (18 अप्रैल) के मौके पर श्रीमद्भागवत गीता और भरत मुनि के नाट्यशास्त्र का यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में शामिल किया जाना वाकई गौरव की बात है। वैसे, यह पहला मौका - [वेदान्त के प्रकाशपुंज: जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य](https://ushakaal.com/aadi-shankaracharya/): आद्य गुरू शंकराचार्य द्वारा शुरू की गई दशनामी संन्यास परंपरा – भारत की वैदिक विरासत का आध्यात्मिक स्तम्भ है। इस गौरवशाली परंपरा ने न केवल भारतवर्ष की वैदिक संस्कृति को जीवित रखा, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग भी दिखाया। उनके द्वारा शुरू की गई दशनामी संन्यास परंपरा – भारत की वैदिक विरासत का आध्यात्मिक स्तम्भ है। इस गौरवशाली परंपरा ने न केवल भारतवर्ष की वैदिक संस्कृति को जीवित रखा, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग भी दिखाया। आधुनिक युग में इस परंपरा के अमर दीपक स्वामी विवेकानंद और स्वामी शिवानंद सरस्वती जैसे अनेक ऐसे महापुरुषों - [आसन और प्राणायाम तो योग के अंग हैं, समग्र योग नहीं](https://ushakaal.com/gyan-yoga/): हम अक्सर सोचते हैं कि योग मतलब सिर्फ आसन और प्राणायाम। लेकिन योग इससे कहीं ज्यादा है। योग का असली मतलब है—शरीर, मन और भावनाओं में तालमेल। यानी, सामंजस्य। अगर शरीर बीमार है, तो उसे ठीक करना होगा। अगर मन अशांत है, तो उसे शांत करना होगा। बिना सामंजस्य के जीवन अधूरा है। हम योग शुरू करते हैं शरीर से। क्यों? क्योंकि शरीर को हम सबसे बेहतर समझते हैं। दर्द हो, जकड़न हो, या बीमारी—हमें तुरंत पता चलता है। इसलिए, आसन, प्राणायाम और हठ योग के अभ्यास से हम शरीर को संतुलित करते हैं। जब शरीर ठीक होता है, तो - [खुशी संयोग नहीं, हमारे हर दिन, हर क्षण का चुनाव है](https://ushakaal.com/happiness/): बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती खुशी पर सर्वाधिक जोर देते हुए कहते हैं कि योग-मार्ग पर आगे बढ़ने से पहले खुश रहने की कला अनिवार्य रूप से विकसित कर लेनी चाहिए। इस बात को चुनौती के रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। वे खुशी की महत्ता बताने के लिए पौराणिक कथा हवाला देते हैं – “बहुत हज़ारों वर्ष पहले, देवी पार्वती ने अपने प्रिय और गुरु भगवान शिव से पूछा, इस सृष्टि में, इस प्रकट जगत में, इस संसार और प्रकृति में, सब कुछ क्षणिक है, कुछ भी स्थायी नहीं है। यहाँ तो इतना दुःख, पीड़ा, - [परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती](https://ushakaal.com/swami-satyananda-saraswati/): बीसवीं सदी के महानतम संत और विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती पंद्रह साल पूरे होने को हैं। उन्होंने पांच दिसंबर की मध्यरात्रि में महासमाधि ली थी। शिष्यों से वादा करके गए थे – “आऊंगा जरूर, रिटर्न टिकट लेकर जा रहा हूं।“ उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती तो सदैव उनकी दिव्य उपस्थिति महसूस करते हैं। पर, दुनिया भर में फैले शिष्यों की आंखें अपने गुरु को बाल रूप में सर्वत्र तलाशती रहती हैं। किसी भूखे-नंगे बच्चे की आंखें या मुख परमहंस जी से मिलती-जुलती दिख जाए तो भावनाएं हिलोरे लेने लगती हैं कि - [योग का ऑक्सफोर्ड है बिहार योग विद्यालय](https://ushakaal.com/bihar-school-of-yoga/): बिहार योग विद्यालय उस सुगंधित पुष्प की तरह है, जिसकी खुशबू सर्वत्र फैल रही है। उसकी विलक्षणताओं की वजह से इंग्लैंड सहित यूरोप और अमेरिका के कई शहरों से प्रकाशित होने वाले अखबार “द गार्जियन” ने इसे पूर्व की तरह पहले स्थान पर रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर देश में योग के प्रचार-प्रसार के लिए चयनित चार योग संस्थानों में बिहार योग विद्यालय भी है। प्रधानमंत्री पुरस्कार से पहले ही सम्मानित किया जा चुका है। इस संस्थान के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती को पद्मविभूषण सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है, जो भारत सरकार द्वारा दिया - [भ्रांतियां दूर हुईं तो बढ़ी श्री चित्रगुप्त भगवान की स्वीकार्यता, भारत-नेपाल में अवतरण दिवस की धूम](https://ushakaal.com/shri-chitragupta-avataran-diwas/): भारत और नेपाल में श्री चित्रगुप्त अवतरण दिवस (12 अप्रैल 2025) पर अनुष्ठान और अन्य आध्यात्मिक गतिविधियों का इतिहास बन गया। आधुनिक युग में संभवत: पहली बार श्री चित्रगुप्त भगवान कायस्थों ही नहीं, बल्कि अन्य जातियों के लिए भी सहज स्वीकार्य बनें और अनेक स्थानों पर सभी ने मिलकर व्यापक रूप से उनकी पूजा-अर्चना की। भारत-नेपाल में जिस उत्साह के साथ अवतरण दिवस मनाया गया, वह इस बात का जीवंत उदाहरण है कि नई पीढ़ी में श्री चित्रगुप्त भगवान को लेकर बनी भ्रांतियां दूर हो रही हैं। वजहें तो कई हो सकती हैं। पर, प्रमुख वजह श्री चित्रगुप्त भगवान के - [“नाथ संप्रदाय”: हजारी प्रसाद द्विवेदी की कालजयी कृति](https://ushakaal.com/nath-sampradaya/): “नाथ संप्रदाय” नामक पुस्तक हजारी प्रसाद द्विवेदी की एक ऐसी कालजयी कृति है, जिसमें उन्होंने गोरखनाथ और उनके संप्रदाय को न केवल धार्मिक या आध्यात्मिक संदर्भ में, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, और साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में भी प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपनी विद्वता और संवेदनशीलता के साथ इस संप्रदाय की ऐसी गहन पड़ताल की, जिससे यह पुस्तक भारतीय दर्शन और साहित्य के अध्येताओं के लिए अमूल्य बन गई। गोरखनाथ को एक योगी, समाज सुधारक, और सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में चित्रित करते हुए द्विवेदी जी ने दिखाया कि नाथ संप्रदाय ने मध्यकालीन भारत में योग, तंत्र, और भक्ति के क्षेत्र में क्रांतिकारी - [सेवा, विनय, धर्म और निष्ठा का सन्मार्ग दिखाते श्री हनुमान](https://ushakaal.com/hanuman-jayanti/): श्री हनुमान जी बोले तो ऐसे, मानो हम सबको सन्मार्ग दिखा रहे हों श्री हनुमान जी बोले तो ऐसे, मानो हम सबको सन्मार्ग दिखा रहे हों श्री हनुमान जी बोले तो ऐसे, मानो हम सबको सन्मार्ग दिखा रहे हों हनुमान जयंती की शुभकामनाएं। हम सब जानते हैं कि श्रीराम जी के साथ श्री हनुमान जी का पावन, अनुपम और अद्वितीय संबंध है। तभी उनके श्रीमुख से निकला, “शारीरिक रूप से मैं प्रभु का सेवक हूँ, मानसिक रूप से वह मेरे मित्र हैं और आध्यात्मिक रूप से वह और मैं एक ही हैं।” आइए, इस खास मौके पर इस कथन का - [श्री चित्रगुप्त भगवान : अवतरण दिवस के व्यापक संदेश](https://ushakaal.com/shri-chitragupta-bhagwan/): श्री चित्रगुप्त भगवान के अवतरण की कथा श्री चित्रगुप्त भगवान का पृथ्वी पर उज्जैन के क़रीब शिप्रा नदी के तट पर उतरने से पहले घटित हुई। स्मरण रहे कि श्री चित्रगुप्त भगवान का अवतरण देवलोक में भगवान ब्रह्मा के समक्ष उनकी वर्षों की तपस्या के फलस्वरूप चैत्र पूर्णिमा के दिन हुआ। श्याम वर्ण के चार भुजाओं वाले श्री चित्रगुप्त भगवान की अवतरित छवि नीचे कल्पित है। उनके एक हाथ में तलवार है, दूसरे में वेद है, तीसरे में कलम तूलिका है, और चौथा हाथ कल्याण हेतु आशीष देता हुआ है। इसी रूप में भगवान ब्रह्मा से श्री चित्रगुप्त जी ने - [कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में अतिमानसी चेतना](https://ushakaal.com/supramental-consciousness/): विलियम आर्थर की बर्बरता से तो हम सब परिचित हैं ही। ये वही अंग्रेज अधिकारी हैं, जो 1942 में पटना में जिला मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे और उनकी बर्बरता के कारण भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अहिंसक आंदोलन कर रहे सात छात्रों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी थी। इस लेख का विषय बेशक यह नहीं है, बल्कि महान योगी श्री अरविंदों के वैदिक ज्ञान के आलोक में वैदिक ज्ञान की महत्ता और सुपरमाइंड की संभावना बतलाना है। ताकि युवापीढ़ी में भारत के प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान की समझ बने और उसके पुनर्जनन में उसका योगदान हो। पर ## Pages - [Spiritual Gurus](https://ushakaal.com/spiritual-gurus/): photo story Paramahansa Yogananda Kishore Kumar20 June 2024 photo story Swami Chinmayananda Saraswati Kishore Kumar20 June 2024 photo story Swami Satyananda Saraswati Kishore Kumar20 June 2024 BROWSING: Spiritual Gurus Paramahansa Yogananda 1 Min Read15 Views Paramahansa Yogananda (born Mukunda Lal Ghosh; January 5, 1893 – March 7, 1952) was an Indian-American Hindu monk, yogi and guru who introduced millions to meditation and Kriya… Swami Chinmayananda Saraswati 1 Min Read11 Views Swami Chinmayananda Saraswati (IAST: Svāmī Cinmayānanda Sarasvatī), born Balakrishna Menon; 8 May 1916 – 3 August 1993, was… Swami Satyananda Saraswati 1 Min Read4 Views Satyananda Saraswati was born in 1923 at Almora, Uttaranchal,[2] into a family of farmers and kshatriyas, the warrior… Swami Sivananda Saraswati 1 Min Read10 - [Opportunities](https://ushakaal.com/opportunities/): Opportunities गुरु रविदास आयुर्वेद विश्वविद्यालय : योग शिक्षा के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 17 अगस्त Kishore Kumar8 August 2024 BROWSING: Yoga गुरु रविदास आयुर्वेद विश्वविद्यालय : योग शिक्षा के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 17 अगस्त 1 Min Read26 Views गुरु रविदास आयुर्वेद विश्वविद्यालय, होशियारपुर के प्रमुख कार्यक्रम के तहत बारहवीं पास के लिए एक… सहज योग विधियों के अद्भुत नतीजे 6 August 20244 Views अब कोरोनाकाल के लिए अनुशंसित ढेर सारी योग विधियों में उलझे रहने के बदले ऐसी… Uncategorised 9 Views इस मर्ज की दवा है योग yoga 13 Views नववर्ष : नई आशाओं और नए संकल्पों - [Events](https://ushakaal.com/events/) - [Divine Words](https://ushakaal.com/divine-words/): Divine Words आध्यात्मिक राष्ट्रवाद Kishore Kumar15 August 2024 Divine Words महर्षि महेश योगी Kishore Kumar13 August 2024 Divine Words Divine Word Kishore Kumar13 August 2024 BROWSING: Divine Words कम हियर, माई डीयर कृष्ण कन्हाई. 25 June 202421 Views किशोर कुमार “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की….. गोकुल के भगवान की, जय कन्हैया लाल… photo story 9 Views Guru Nanak Dev photo story 8 Views Osho photo story 8 Views Ramana Maharshi - 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[Unani](https://ushakaal.com/unani/): yoga एक उत्सव स्वयं को जानने का Kishore Kumar29 July 2024 Yoga and Naturopathy Yoga and Naturopathy Kishore Kumar8 July 2024 Uncategorised इस मर्ज की दवा है योग Kishore Kumar4 July 2024 BROWSING: Unani खेल बिगाड़ते योग के नीम हकीम 6 Mins Read19 Views आसनो में भुजंगासन को सर्वरोग विनाशनम् कहा गया है। दुनिया के अनेक भागों में इस… सामाजिक-आर्थिक विकास को गति देता योग 6 Mins Read60 Views किशोर कुमार // योग इतना प्रभावी क्यों है? दरअसल, भौतिक शरीर में दो महान शक्तियां… शाम्भवी क्रिया करने वालों में तनाव को कम करने वाला हार्मोन नियंत्रण में रहता है : - [Yoga & Naturopathy](https://ushakaal.com/yoga-naturopathy/): Yoga and Naturopathy Yoga and Naturopathy Kishore Kumar8 July 2024 Unani Unani Kishore Kumar8 July 2024 Homeopathy Homeopathy Kishore Kumar8 July 2024 BROWSING: Yoga & Naturopathy खेल बिगाड़ते योग के नीम हकीम 6 Mins Read19 Views आसनो में भुजंगासन को सर्वरोग विनाशनम् कहा गया है। दुनिया के अनेक भागों में इस… सामाजिक-आर्थिक विकास को गति देता योग 6 Mins Read60 Views किशोर कुमार // योग इतना प्रभावी क्यों है? दरअसल, भौतिक शरीर में दो महान शक्तियां… शाम्भवी क्रिया करने वालों में तनाव को कम करने वाला हार्मोन नियंत्रण में रहता है : सद्गुरू जग्गी वासुदेव 6 Mins Read7 Views शांभवी - 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Recognising the transformative power of yoga, we strive to provide our readers with in-depth insights and practical guidance, empowering them to - [media](https://ushakaal.com/media-2/) - [new button](https://ushakaal.com/new-button/): Click here - [Upcoming Events](https://ushakaal.com/upcoming-events/): Upcoming Events Event 1 अंतर्राष्ट्रीय आयुष शिखर सम्मेलन 2023 कन्याकुमारी में आगामी 27-29 जनवरी को होगा। योगियों, चिकित्सा विज्ञानियों और अनुंसधानकर्त्ताओं के इस महाकुंभ में चिकित्सा की पारंपरिक भारतीय प्रणालियों के संवर्द्धन और प्रसार के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शंखनाद होगा। इसमें देश-विदेश के 1500 से ज्यादा डेलीगेट भाग लेने वाले हैं। Event 2 उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कैसे? पढ़िए विस्तार से। उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कैसे? पढ़िए विस्तार से। उसके बाद अंतरिक्ष में। - [Photos News](https://ushakaal.com/photos-news/) - [Print News](https://ushakaal.com/print-news/): News & Archives आईआईटी कानपुर की गीता सुपरसाइट की धूम 22 June 20242 Mins Read5 Views गीता सुपरसाइट यानी इंटरनेट पर भारतीय दार्शनिक ग्रंथों का भंडार। इस तरह के कार्य टुकड़ों… मध्य प्रदेश के हर स्कूल में होगा एक योग प्रशिक्षक 22 June 20241 Min Read2 Views मध्यप्रदेश के स्कूली पाठ्यक्रम में एक विषय के तौर पर योग भी होगा। कोविड-19 से… अदालत का फैसला सही, योग के मामले में सरकार अपना काम करे 22 June 20242 Mins Read5 Views इसमें दो मत नहीं कि केंद्र की मोदी सरकार योग के मामले में उल्लेखनीय काम… 100 योगासन तीन मिनट में - [Elementor #8212](https://ushakaal.com/elementor-8212/): ज्ञान के मार्ग में अहंकार सबसे बड़ी बाधा आत्मज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञानों का पिता है। ब्रह्म को जाने बिना चाहे जितना ज्ञान संपादन कर लिया जाय, सब मिथ्या है। उससे तनिक भी सुख और शान्ति उपलब्ध न होगी। महर्षि उद्दालक आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु चौबीस वर्ष तक गुरु-गृह में रह कर चारों वेदों का पूर्ण अध्ययन करके घर लौटा, तो उसने मन ही मन विचार किया कि मैं वेद का पूर्ण ज्ञाता हूँ, मेरे समान कोई पंडित नहीं है, मैं सर्वोपरि विद्वान और बुद्धिमान हूँ। इस प्रकार के विचारों से उसके मन में गर्व उत्पन्न हो गया और वह उद्धत - [Editor's Desk](https://ushakaal.com/editors-desk/) - [TV NEWS](https://ushakaal.com/tv-news/) - [TEAM](https://ushakaal.com/team/): Patrons Swami Shivadhyanam Saraswati, M.Tech President, Bihar Yoga Bharti Swami Nirmalananda Saraswati, MBBS, MD Sanyasi, Bihar School of Yoga Advisers Prof. Rita Verma Former Minister of State for Health & Family Welfare, Govt. of India Manjari Jaruhar IPS (Retd) , Advisor to Tata Consultancy Services (TCS) & author of “Madam Sir” Uday Sahay A voluntarily retired IPS officer and author of books including Kayasth Encyclopedia, Kumbh, and Gaya among others. 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